भगवंत मान के बिना भी हुआ शपथ ग्रहण: केंद्र-पंजाब तनातनी के बीच जस्टिस शील नागू ने संभाली पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट की कमान

भगवंत मान के बिना भी हुआ शपथ ग्रहण: केंद्र-पंजाब तनातनी के बीच जस्टिस शील नागू ने संभाली पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट की कमान

पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस के शपथ ग्रहण समारोह से मुख्यमंत्री भगवंत मान के किनारा करने और केंद्र-पंजाब के बीच चल रहे सियासी टकराव के माहौल में जस्टिस शील नागू या संबंधित नवनियुक्त चीफ जस्टिस (जस्टिस गुरमीत सिंह संधवा/जस्टिस मिश्रा) द्वारा कमान संभालने का यह पूरा वाकया इन दिनों राजनीतिक और प्रशासनिक गलियारों में सबसे बड़ी चर्चा का विषय बन गया है। देश के संघीय ढांचे, न्यायपालिका और राज्य सरकार के बीच उपजे इस ताजा गतिरोध ने एक बार फिर से इस बात को साबित कर दिया है कि पंजाब की राजनीति में केंद्र और राज्य के रिश्ते कितने नाजुक दौर से गुजर रहे हैं। शपथ ग्रहण जैसे महत्वपूर्ण और गरिमामयी संवैधानिक कार्यक्रम से राज्य के मुखिया का यूं दूरी बना लेना कोई सामान्य घटना नहीं है, बल्कि इसके पीछे लंबे समय से सुलग रहे प्रशासनिक मतभेद और वैधानिक अधिकार क्षेत्र की खींचतान साफ तौर पर देखी जा रही है। देश भर के राजनीतिक विश्लेषक और कानूनी विशेषज्ञ इस घटना के दूरगामी परिणामों का आकलन करने में जुट गए हैं, क्योंकि इससे आने वाले दिनों में केंद्र शासित प्रदेश चंडीगढ़ और पंजाब सरकार के बीच प्रशासनिक समन्वय पर सीधा असर पड़ना तय माना जा रहा है।

मुख्यमंत्री भगवंत मान के शपथ ग्रहण समारोह से दूरी बनाने के पीछे के राजनीतिक मायने

पंजाब की राजनीति में अपनी बेबाक शैली और केंद्र सरकार के खिलाफ मुखर तेवरों के लिए जाने जाने वाले मुख्यमंत्री भगवंत मान का इस बड़े न्यायिक कार्यक्रम में शामिल न होना इस बात का स्पष्ट संकेत है कि राज्य सरकार और केंद्र के नियुक्त किए गए संवैधानिक पदाधिकारियों के बीच सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है। जब भी देश के किसी भी राज्य में हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश का शपथ ग्रहण समारोह होता है, तो राज्य के राज्यपाल और मुख्यमंत्री की उपस्थिति को एक अनिवार्य संवैधानिक और पारंपरिक शिष्टाचार माना जाता है, ताकि कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच बेहतरीन तालमेल का संदेश जनता तक जाए। लेकिन मुख्यमंत्री कार्यालय द्वारा इस कार्यक्रम से बनाई गई दूरी ने यह जाहिर कर दिया है कि केंद्र सरकार द्वारा लिए जाने वाले फैसलों और पंजाब के प्रशासनिक मामलों में लगातार हो रहे कथित हस्तक्षेप को लेकर राज्य सरकार के भीतर गहरा असंतोष व्याप्त है। विपक्षी दलों ने मुख्यमंत्री के इस कदम को लेकर राज्य सरकार पर निशाना साधना शुरू कर दिया है, उनका कहना है कि संवैधानिक पदों का सम्मान करना हर मुख्यमंत्री का कर्तव्य होता है, जबकि आप (AAP) सरकार के समर्थकों का यह मानना है कि यह विरोध केंद्र के उन अन्यायपूर्ण रवैये के खिलाफ है जो पंजाब के अधिकारों पर लगातार डाका डाल रहे हैं।

केंद्र और पंजाब के बीच चल रहे लंबे टकराव की पृष्ठभूमि और प्रशासनिक असहजता

पिछले कुछ वर्षों के दौरान केंद्र की भारतीय जनता पार्टी नीत सरकार और पंजाब की आम आदमी पार्टी सरकार के बीच विभिन्न मुद्दों को लेकर कई बार आमने-सामने की स्थिति बन चुकी है, जिसमें राज्यपाल और सरकार के बीच तकरार से लेकर पुलिस महानिदेशक (DGP) की नियुक्ति और ग्रामीण विकास फंड्स को रोकने जैसे गंभीर मामले शामिल रहे हैं। पंजाब एक सीमावर्ती राज्य है, जिसकी संवेदनशीलता को ध्यान में रखते हुए केंद्र और राज्य के बीच मजबूत प्रशासनिक सहयोग होना बेहद जरूरी माना जाता है, लेकिन राजनीतिक प्राथमिकताओं के चलते यह समन्वय अक्सर चरमराता हुआ नजर आता है। हालिया नियुक्ति से जुड़े घटनाक्रम में भी न्यायपालिका के सर्वोच्च स्तर पर लिए गए फैसलों और स्थानीय प्रशासनिक प्रोटोकॉल के बीच जो असहजता देखने को मिली, उसने इस पुराने जख्म को एक बार फिर से हरा कर दिया है। जानकारों का मानना है कि इस तरह के गतिरोध से अंततः राज्य के सामान्य कामकाज और विकास कार्यों पर विपरीत प्रभाव पड़ता है, क्योंकि जब कार्यपालिका और न्यायपालिका या केंद्र और राज्य के बीच संवादहीनता बढ़ती है, तो प्रशासनिक मशीनरी पशोपेश में पड़ जाती है कि वे किसके निर्देशों का पालन करें।

जस्टिस मिश्रा द्वारा कमान संभालने के बाद न्यायपालिका से जुड़ी उम्मीदें और चुनौतियां

तमाम तरह की राजनीतिक बयानबाजी, प्रोटोकॉल विवाद और केंद्र-राज्य के बीच सुलगते सियासी तनाव के बीच नवनियुक्त चीफ जस्टिस (जस्टिस मिश्रा/संबंधित नवनियुक्त मुख्य न्यायाधीश) ने पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के रूप में औपचारिक रूप से अपनी कमान संभाल ली है। अदालत का यह सर्वोच्च पद संभालने के साथ ही उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती यह होगी कि वे इस क्षेत्र से जुड़े हजारों लंबित मुकदमों का तेजी से निपटारा करें और न्याय व्यवस्था में आम जनता के विश्वास को और अधिक सुदृढ़ बनाएं। हालांकि मुख्यमंत्री के शपथ ग्रहण में शामिल न होने जैसी राजनीतिक हलचलें भले ही मीडिया की सुर्खियां बनी हों, लेकिन भारतीय न्यायपालिका का यह स्वर्णिम इतिहास रहा है कि वह किसी भी बाहरी राजनीतिक दबाव या प्रशासनिक खींचतान से पूरी तरह स्वतंत्र रहकर अपने संवैधानिक कर्तव्यों का निर्वहन करती है। पंजाब और हरियाणा जैसे महत्वपूर्ण उच्च न्यायालय के अधिकार क्षेत्र में आने वाले भू-भाग में कानून-व्यवस्था, कृषि संकट, आपराधिक मामले और मानवाधिकार से जुड़े अनगिनत संवेदनशील मुकदमे विचाराधीन हैं, जिन पर नए चीफ जस्टिस की अगुवाई में आने वाले दिनों में कई ऐतिहासिक और महत्वपूर्ण फैसले आने की पूरी उम्मीद है।