हरियाणा स्वास्थ्य संकट: 35% SMO पद खाली, टीकाकरण व आयुष्मान योजना ठप

हरियाणा स्वास्थ्य संकट: 35% SMO पद खाली, टीकाकरण व आयुष्मान योजना ठप

हरियाणा की स्वास्थ्य प्रणाली इन दिनों अधिकारियों और विशेषज्ञ डॉक्टरों की भारी किल्लत के कारण एक बेहद गंभीर संकट से गुजर रही है। प्रदेश भर के सरकारी अस्पतालों, सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों (CHC) और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों (PHC) में वरिष्ठ चिकित्सा अधिकारियों (SMO) के कुल स्वीकृत पदों में से लगभग 35 फीसदी पद खाली पड़े हुए हैं। मुख्य रूप से प्रशासनिक और विशेषज्ञ पदों पर डॉक्टरों की इस कमी ने राज्य की पूरी स्वास्थ्य सेवा संरचना को पंगु बना दिया है। इसका सीधा और घातक असर प्रदेश के नियमित राष्ट्रीय टीकाकरण अभियानों, मातृत्व सुरक्षा कार्यक्रमों, आपातकालीन सेवाओं और प्रधानमंत्री आयुष्मान भारत योजना के प्रभावी क्रियान्वयन पर पड़ रहा है। हरियाणा के ग्रामीण और दूरदराज के इलाकों में स्थित अस्पतालों की हालत और भी चिंताजनक है, जहां एक-एक एसएमओ को दो से तीन केंद्रों का प्रभार संभालना पड़ रहा है, जिससे स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।

#1. हरियाणा के अस्पतालों में SMO के 35 फीसदी पद खाली और प्रशासनिक व्यवस्था पर असर

हरियाणा स्वास्थ्य विभाग के आधिकारिक आंकड़ों और हालिया विभागीय समीक्षा रिपोर्ट के अनुसार, राज्य भर में सीनियर मेडिकल ऑफिसर (SMO) के स्वीकृत कुल कैडर में से एक तिहाई से ज्यादा पद खाली पड़े हैं। एसएमओ का पद केवल एक प्रशासनिक पद नहीं होता, बल्कि यह किसी भी अस्पताल या स्वास्थ्य केंद्र में चिकित्सा प्रबंधन, बजट आवंटन, डॉक्टरों की ड्यूटी रोस्टर और दवाओं की आपूर्ति श्रृंखला को नियंत्रित करने वाली मुख्य कड़ी होता है। जब अस्पतालों में एसएमओ ही तैनात नहीं होंगे, तो रोजमर्रा का प्रशासनिक काम पूरी तरह से ठप हो जाता है। कई जिलों में कनिष्ठ चिकित्सा अधिकारियों (MO) को एसएमओ का अतिरिक्त प्रभार सौंप दिया गया है। इसके चलते वे न तो ओपीडी (OPD) में मरीजों को सही ढंग से समय दे पा रहे हैं और न ही प्रशासनिक जिम्मेदारियों को पूरी निष्ठा से संभाल पा रहे हैं।

#1. राष्ट्रीय टीकाकरण अभियान और मातृ-शिशु सुरक्षा योजनाएं बुरी तरह प्रभावित

वरिष्ठ चिकित्सा अधिकारियों की भारी कमी का सबसे बड़ा और प्रत्यक्ष खामियाजा राज्य के नवजात शिशुओं, बच्चों और गर्भवती महिलाओं को भुगतना पड़ रहा है। नियमित राष्ट्रीय टीकाकरण कार्यक्रम (Universal Immunization Programme) को ब्लॉक और ग्राम स्तर पर सुचारू रूप से चलाने की जिम्मेदारी एसएमओ की देखरेख में ही होती है। पदों के खाली होने के कारण वैक्सीन की कोल्ड चेन सप्लाई, समय पर टीकाकरण सत्रों का आयोजन और आशा वर्करों के कामकाज की निगरानी बुरी तरह प्रभावित हुई है। इसके अलावा, संस्थागत प्रसव (Institutional Delivery) और मातृ-शिशु मृत्यु दर को कम करने के उद्देश्य से चलाई जा रही जननी सुरक्षा योजनाओं की जमीनी रिपोर्टिंग और क्रियान्वयन में भारी देरी देखने को मिल रही है, जिससे ग्रामीण इलाकों में स्वास्थ्य संकेतकों में गिरावट दर्ज की जा रही है।

#1. आयुष्मान भारत योजना के क्लेम अटके और गरीब मरीजों की बढ़ीं मुश्किलें

केंद्र और राज्य सरकार की सबसे महत्वाकांक्षी 'आयुष्मान भारत-चिरायु हरियाणा' योजना भी इस प्रशासनिक संकट की चपेट में आ गई है। आयुष्मान योजना के तहत मरीजों के इलाज के बाद अस्पतालों द्वारा भेजे जाने वाले वित्तीय क्लेम और आवेदनों को मंजूरी देने की प्राथमिक प्रक्रिया एसएमओ के सत्यापन पर निर्भर करती है। अस्पतालों में एसएमओ के पद खाली होने या अतिरिक्त कार्यभार के कारण हजारों मरीजों के इलाज से जुड़े दस्तावेज और क्लेम फाइलें हफ्तों तक लंबित पड़ी रहती हैं। इस देरी के कारण निजी पैनलबद्ध अस्पतालों में गरीब मरीजों को दाखिला मिलने में परेशानी आ रही है, वहीं सरकारी अस्पतालों में भी आवश्यक दवाओं और मेडिकल सामग्री की आपूर्ति के फंड समय पर जारी नहीं हो पा रहे हैं।

#1. ग्रामीण स्वास्थ्य केंद्रों (PHC/CHC) की बदहाली और रेफरल अस्पतालों पर बढ़ा दबाव

हरियाणा के ग्रामीण क्षेत्रों में स्थित प्राथमिक एवं सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों की स्थिति सबसे अधिक दयनीय हो चुकी है। मेवात, जींद, सिरसा, फतेहाबाद, हिसार और अंबाला के दूरदराज के क्षेत्रों में कई स्वास्थ्य केंद्र बिना किसी स्थायी एसएमओ या विशेषज्ञ डॉक्टर के ही संचालित हो रहे हैं। ग्रामीण इलाकों में प्राथमिक स्तर पर सही इलाज न मिलने के कारण मामूली बीमारियों के लिए भी मरीजों को जिला सिविल अस्पतालों या फिर रोहतक पीजीआईएमएस (PGIMS) और मेडिकल कॉलेजों की तरफ रुख करना पड़ रहा है। इसके परिणामस्वरूप, राज्य के बड़े रेफरल अस्पतालों में मरीजों की भारी भीड़ उमड़ रही है, वहां की आपातकालीन सेवाएं चरमरा रही हैं और पहले से ही दबाव झेल रहे रेजिडेंट डॉक्टरों पर काम का बोझ कई गुना बढ़ गया है।

#1. डॉक्टर संघ की मांगें, सरकारी नीतियां और भविष्य का स्थायी समाधान

हरियाणा सिविल मेडिकल सर्विसेज एसोसिएशन (HCMS) लंबे समय से एसएमओ पदों पर सीधी भर्ती (Direct Recruitment) और पदोन्नति (Promotions) की लंबित प्रक्रियाओं को जल्द से जल्द पूरा करने की मांग उठाती रही है। डॉक्टर संघ का कहना है कि काम के अत्यधिक दबाव, वेतन विसंगतियों और पदोन्नति में हो रही देरी के कारण राज्य के कई योग्य डॉक्टर सरकारी सेवा छोड़कर निजी अस्पतालों में जा रहे हैं। यद्यपि स्वास्थ्य विभाग का दावा है कि लोक सेवा आयोग और विभागीय पदोन्नति समिति के माध्यम से खाली पड़े पदों को भरने की प्रक्रिया गतिमान है, लेकिन जब तक धरातल पर नई नियुक्तियां नहीं हो जातीं, तब तक हरियाणा की स्वास्थ्य व्यवस्था पर मंडरा रहा यह गंभीर संकट टलता नहीं दिख रहा है।