हरियाणा : अब करेंगे मॉक संसद, इस दिन करेंगे मुख्यमंत्री कार्यालय का घेराव

हरियाणा : अब करेंगे मॉक संसद, इस दिन करेंगे मुख्यमंत्री कार्यालय का घेराव

हरियाणा में अतिथि अध्यापकों का 135 दिनों से जारी धरना प्रदर्शन अब एक अत्यंत उग्र और निर्णायक मोड़ पर पहुंच चुका है। अपनी नौकरियों के नियमितीकरण और समान काम के लिए समान वेतन की वर्षों पुरानी मांग को लेकर आंदोलनरत हजारों गेस्ट टीचर्स ने सरकार के ढुलमुल रवैये के खिलाफ निर्णायक आर-पार की लड़ाई का ऐलान कर दिया है। लगातार 135 दिनों से कड़ाके की धूप, बारिश और विपरीत मौसम की परवाह किए बिना सड़कों पर डटे अतिथि अध्यापकों ने प्रशासनिक उदासीनता के विरोध में अब एक अनूठा और लोकतांत्रिक विरोध प्रदर्शन आयोजित करने का फैसला किया है। इसके तहत आंदोलनकारी शिक्षक सबसे पहले एक 'मॉक संसद' (Mock Parliament) का आयोजन करेंगे, जिसमें वे शिक्षा प्रणाली की जमीनी हकीकत और सरकार के वादों की पोल खोलेंगे। इसके बाद, मांगों की सुनवाई न होने की स्थिति में शिक्षकों द्वारा मुख्यमंत्री कार्यालय (CMO) का घेराव करने की चेतावनी दी गई है, जिससे राज्य के राजनीतिक और प्रशासनिक हलकों में हड़कंप मच गया है।

#1. 135 दिनों से जारी अनिश्चितकालीन धरना और अतिथि अध्यापकों का दर्द

हरियाणा के सरकारी स्कूलों में वर्षों से अपनी सेवाएं दे रहे अतिथि अध्यापक (Guest Teachers) लंबे समय से अपने भविष्य की सुरक्षा की गुहार लगा रहे हैं। राज्य के विभिन्न जिलों से आए शिक्षक कुरुक्षेत्र और पंचकूला के धरना स्थलों पर पिछले 135 दिनों से लगातार अनिश्चितकालीन धरने पर बैठे हुए हैं। शिक्षकों का कहना है कि वे पिछले 15 से 18 वर्षों से न्यूनतम मानदेय पर दिन-रात मेहनत करके सरकारी स्कूलों का शैक्षणिक स्तर सुधारने में जुटे हुए हैं। इसके बावजूद हर चुनाव में राजनीतिक दलों द्वारा उन्हें पक्का करने के जो लुभावने वादे किए जाते हैं, वे सत्ता में आने के बाद ठंडे बस्ते में डाल दिए जाते हैं। आर्थिक तंगी, मानसिक तनाव और भविष्य की अनिश्चितता से जूझ रहे अध्यापकों का सब्र का बांध अब पूरी तरह से टूट चुका है, जिसके कारण उन्हें उग्र आंदोलन का रास्ता चुनने पर मजबूर होना पड़ा है।

#1. लोकतांत्रिक विरोध का नया तरीका: 'मॉक संसद' के जरिए खोलेंगे सरकार की पोल

प्रशासन का ध्यान खींचने और आम जनता को अपनी मांगों से अवगत कराने के लिए अतिथि अध्यापक संघ ने विरोध का एक अनोखा और लोकतांत्रिक तरीका अपनाया है। संघ के पदाधिकारियों ने घोषणा की है कि मुख्यमंत्री कार्यालय के घेराव से ठीक पहले राज्यस्तरीय धरना स्थल पर एक भव्य 'मॉक संसद' का आयोजन किया जाएगा। इस मॉक संसद में अतिथि अध्यापक ही मंत्रियों, विधायकों और विपक्ष के नेताओं की भूमिका निभाएंगे। इसके माध्यम से विधानसभा में पास किए गए अतिथि अध्यापक सेवा सुरक्षा अधिनियम की कमियों, मानदेय वृद्धि के अधूरे वादों और नियमितीकरण की राह में आ रही प्रशासनिक अड़चनों को नाटकीय रूप से जनता के सामने प्रस्तुत किया जाएगा। संघ के नेताओं का मानना है कि इस मॉक संसद के जरिए वे यह संदेश देना चाहते हैं कि कानून बनाने वाले जनप्रतिनिधि किस तरह उनके न्यायसंगत अधिकारों की अनदेखी कर रहे हैं।

#1. मुख्यमंत्री कार्यालय घेराव का ऐलान: इस दिन पंचकूला/चंडीगढ़ कूच की तैयारी

मॉक संसद के तुरंत बाद आंदोलनरत शिक्षकों ने पंचकूला/चंडीगढ़ स्थित मुख्यमंत्री कार्यालय (CMO) के घेराव का बिगुल फूंक दिया है। राज्य भर के प्राथमिक, माध्यमिक और उच्च विद्यालयों के अतिथि अध्यापकों को इस महारैली और घेराव कार्यक्रम में शामिल होने का आह्वान किया गया है। संघ के प्रांतीय अध्यक्ष और वरिष्ठ नेताओं ने बताया कि 135 दिनों के धैर्यपूर्ण इंतजार के बाद अब वे किसी भी प्रकार के आश्वासन से मानने वाले नहीं हैं। यदि मुख्यमंत्री या राज्य सरकार के उच्चाधिकारी वार्ता के लिए ठोस और लिखित समय-सीमा के साथ आगे नहीं आते हैं, तो हजारों की संख्या में शिक्षक पुलिस बैरिकेड्स तोड़कर मुख्यमंत्री निवास और कार्यालय की तरफ पैदल मार्च करेंगे। इस चेतावनी के बाद हरियाणा पुलिस और खुफिया एजेंसियों ने पंचकूला तथा चंडीगढ़ की सीमाओं पर सुरक्षा व्यवस्था पुख्ता करने की कवायद शुरू कर दी है।

#1. क्या हैं अतिथि अध्यापकों की मुख्य मांगें और नीतिगत अड़चनें

हरियाणा के अतिथि अध्यापक संघ की मुख्य मांगों की बात करें तो वे लंबे समय से नियमित सेवा (Permanent Jobs), समान काम के लिए समान वेतन (Equal Pay for Equal Work) और सेवा के दौरान मृत्यु होने पर आश्रितों को अनुकंपा के आधार पर नौकरी देने की मांग कर रहे हैं। यद्यपि सरकार ने 58 वर्ष की आयु तक सेवा सुरक्षा का कानून बनाया है, लेकिन नियमित कर्मचारियों की तर्ज पर उन्हें ग्रेच्युटी, मेडिकल भत्ते और नियमित पे-स्केल का लाभ नहीं मिल रहा है। इसके अतिरिक्त, समान योग्यता और वर्षों के अनुभव के बावजूद नियमितीकरण की नीति न बनने से शिक्षकों में भारी असंतोष व्याप्त है। शिक्षा विभाग के अधिकारियों का तर्क है कि मामला कई कानूनी अड़चनों और पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय के फैसलों से जुड़ा हुआ है, जिस पर नीतिगत निर्णय लेना केवल राज्य मंत्रिमंडल (Cabinet) के अधिकार क्षेत्र में है।

#1. शिक्षा व्यवस्था पर पड़ता बुरा असर और सरकार के सामने बड़ी चुनौती

135 दिनों से जारी इस लंबे आंदोलन और धरने का सीधा और विपरीत प्रभाव हरियाणा के सरकारी स्कूलों की पढ़ाई पर पड़ रहा है। राज्य के सैकड़ों प्राथमिक और माध्यमिक विद्यालयों में अध्यापकों की गैरहाजिरी के कारण कक्षाओं का संचालन प्रभावित हो रहा है, जिससे गरीब और ग्रामीण पृष्ठभूमि से आने वाले विद्यार्थियों की वार्षिक परीक्षाओं की तैयारियां बाधित हो रही हैं। अभिभावक भी इस स्थिति से परेशान हैं और सरकार से इस मसले का जल्द से जल्द स्थायी समाधान निकालने की अपील कर रहे हैं। अब देखना यह होगा कि मॉक संसद और मुख्यमंत्री कार्यालय के प्रस्तावित घेराव के बाद राज्य सरकार इस संवेदनशील मुद्दे पर क्या रुख अपनाती है और क्या अतिथि अध्यापकों को उनके 135 दिनों के लंबे संघर्ष का फल मिल पाता है या नहीं।