पसीने की कमाई और खाली जेब आखिर झारखंड के किसान अपनी ही फसल के पैसे के लिए कब तक तरसेंगे?
News India Live, Digital Desk : खेती-किसानी के बारे में कहा जाता है कि जब फसल लहलहाती है, तो किसान का दिल झूम उठता है। लेकिन झारखंड में इन दिनों कहानी थोड़ी बदली हुई है। फसल तैयार है, खलिहानों में धान का अंबार लगा है, और सरकारी क्रय केंद्रों (PACS/LAMPS) पर धान की तौल भी शुरू हो गई है। पर अफसोस की बात ये है कि जिस किसान ने अपने पसीने से मिट्टी सींची, आज वही किसान अपने ही पैसे के लिए सरकारी दफ्तरों के चक्कर काट रहा है।
अमूमन कागज़ों पर ये व्यवस्था बहुत बढ़िया लगती है कि किसान न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) पर अपनी उपज बेचे और पैसा सीधे उसके बैंक खाते में आ जाए। पर हकीकत ये है कि धान बिकने के हफ्तों बाद भी किसानों के हाथ खाली हैं।
इंतज़ार का वो कड़ाके भरा वक्त
दिसंबर की इस कड़ाके की सर्दी में झारखंड के किसानों के सामने दोहरी चुनौती है। एक तरफ अगली फसल की तैयारी के लिए बीज और खाद के पैसे चाहिए, तो दूसरी तरफ घर के वो खर्चे जो धान की फसल पर ही टिके होते हैं। जब किसान सरकार को अपनी फसल दे देता है, तो उसे उम्मीद होती है कि कुछ ही दिनों में 'सफ़ेद एसएमएस' (Payment Alert) उसके फोन की घंटी बजाएगा। पर पोर्टल की गड़बड़ी हो या फंड की किल्लत, ये पैसा रास्ते में ही कहीं अटक जाता है।
बिचौलियों की बढ़ती पकड़: मज़बूरी का फायदा
जब सरकारी सिस्टम सुस्त होता है, तो सबसे ज़्यादा फायदा बिचौलियों (Middle-men) का होता है। छोटा किसान, जिसे बेटी की शादी करनी है या साहूकार का कर्ज चुकाना है, वह सरकार के लंबी प्रक्रिया और 'अगले हफ़्ते' वाले वादे पर भरोसा नहीं कर पाता। थक-हारकर उसे कम कीमत पर बिचौलियों को धान बेचना पड़ता है। कागज़ों में सरकार करोड़ों रुपये का भुगतान दिखाती है, पर सच तो ये है कि किसानों तक उसका एक बड़ा हिस्सा नहीं पहुँच पा रहा।
नियमों की अपनी उलझन
नमी का बहाना हो या तौल में हेरफेर की बात, सरकारी केंद्रों पर किसानों को कई तरह की परेशानियों से जूझना पड़ता है। अक्सर देखा गया है कि जो किसान मिल मालिकों से सीधे जुड़ा है, उसका काम पहले हो जाता है, पर आम ग्रामीण किसान अपनी बारी का इंतज़ार करता ही रह जाता है। सवाल ये है कि अगर सरकार समय पर पैसा नहीं दे सकती, तो फिर उसे मज़बूत किसान की बात करने का हक कैसे है?
व्यवस्था में बदलाव की ज़रूरत
ये स़िर्फ एक सरकारी आंकड़ा नहीं है, बल्कि उन हज़ारों परिवारों की रोजी-रोटी का सवाल है। प्रशासन को ये समझना होगा कि किसान के लिए 'पेमेंट में देरी' स़िर्फ बैंक स्टेटमेंट का मामला नहीं है, बल्कि उसकी अगली रोटी और अगली फसल का भविष्य है। क्या हम एक ऐसा सिस्टम नहीं बना सकते जहाँ तौल के 48 घंटों के भीतर पैसा किसान के खाते में पहुँच जाए?
आज झारखंड का किसान उम्मीद भरी नज़रों से राजधानी की ओर देख रहा है। उसे स़िर्फ आश्वासन नहीं, अपनी मेहनत का सही वक्त पर दाम चाहिए।