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March 26 2026 07:58 am

समंदर में महाशक्तियों का महामिलन भारत की मदद के लिए एक ही बंदरगाह पर पहुंचे रूस और अमेरिका के युद्धपोत, क्या टल गया बड़ा संकट

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News India Live, Digital Desk :  वैश्विक राजनीति के दो धुर विरोध रूस और अमेरिका भारत की पुकार पर एक साथ खड़े नजर आ रहे हैं। हिंद महासागर में गहराते सुरक्षा संकट और समुद्री चुनौतियों से निपटने के लिए भारत की मदद करने हेतु रूसी और अमेरिकी युद्धपोत एक ही बंदरगाह पर लंगर डाले हुए हैं। इतिहास में ऐसे मौके कम ही आते हैं जब वाशिंगटन और मॉस्को के घातक जंगी जहाज किसी तीसरे देश की मदद के लिए एक ही छत (बंदरगाह) के नीचे मौजूद हों। इस घटनाक्रम ने न केवल भारत के बढ़ते वैश्विक कद को दर्शाया है, बल्कि चीन जैसे विरोधियों को भी कड़ा संदेश दिया है।

दुश्मनी किनारे, दोस्ती पहले: रूस-अमेरिका की जुगलबंदी

यूक्रेन युद्ध और वैश्विक प्रतिबंधों के बीच रूस और अमेरिका के संबंध अपने सबसे निचले स्तर पर हैं, लेकिन भारत के साथ दोनों देशों की रणनीतिक साझेदारी इस तनाव पर भारी पड़ती दिख रही है। भारतीय नौसेना के साथ समन्वय स्थापित करने और समुद्री डकैती व अन्य सुरक्षा खतरों से निपटने के लिए दोनों महाशक्तियों के बेड़े तैनात हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यह भारत की 'सॉफ्ट पावर' और सफल विदेश नीति का परिणाम है, जहाँ वह रूस और अमेरिका दोनों को एक ही मंच पर लाने में सफल रहा है।

भारत का समुद्री संकट और 'दोस्त' देशों का साथ

हाल के दिनों में लाल सागर और हिंद महासागर क्षेत्र में व्यापारिक जहाजों पर बढ़ते हमलों ने भारत की चिंताएं बढ़ा दी थीं। भारत की ऊर्जा सुरक्षा और समुद्री व्यापार को सुचारू रखने के लिए नौसैनिक बैकअप की सख्त जरूरत थी। ऐसे में रूस का साथ मिलना और अमेरिका का हिंद-प्रशांत क्षेत्र में सहयोग करना भारत के लिए किसी सुरक्षा कवच से कम नहीं है। इस साझा मौजूदगी से समुद्री लुटेरों और संदिग्ध गतिविधियों में शामिल गुटों में खौफ पैदा हो गया है। बंदरगाह पर इन युद्धपोतों की मौजूदगी केवल सैन्य अभ्यास नहीं, बल्कि एक बड़े संकट को टालने की कोशिश है।

चीन की बढ़ती बेचैनी और भारत का मास्टरस्ट्रोक

हिंद महासागर में अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश में जुटे चीन के लिए यह तस्वीरें किसी झटके से कम नहीं हैं। रूस और अमेरिका का भारत के प्रति यह झुकाव साफ करता है कि इस क्षेत्र में सुरक्षा की कमान किसके हाथों में है। रक्षा विशेषज्ञों के अनुसार, भारत ने अपनी कूटनीति से यह साबित कर दिया है कि वह किसी एक खेमे में बंधने के बजाय अपनी जरूरतों के हिसाब से वैश्विक समीकरण साध सकता है। इस साझा अभियान से न केवल भारत की समुद्री सीमाएं सुरक्षित हुई हैं, बल्कि वैश्विक स्तर पर भारत की 'विश्व मित्र' की छवि और मजबूत हुई है।