अरुणा शानबाग से हरीश राणा तक, भारत में कैसे कानूनी बना सम्मान से मरने का अधिकार जानें पूरी कहानी
News India Live, Digital Desk: मुंबई के केईएम (KEM) अस्पताल की नर्स अरुणा शानबाग 1973 में एक नृशंस हमले का शिकार हुई थीं, जिसके बाद वे 42 वर्षों तक 'परसिस्टेंट वेजिटेटिव स्टेट' (PVS) में रहीं। वे न तो बोल सकती थीं, न देख सकती थीं और न ही हिल सकती थीं।
2011 का ऐतिहासिक फैसला:
उनकी सहेली पिंकी विरानी ने सुप्रीम कोर्ट में अरुणा को 'इच्छा मृत्यु' देने की याचिका दायर की थी। हालांकि अदालत ने अरुणा को मृत्यु देने से मना कर दिया था, लेकिन इसी केस के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने भारत में पैसिव यूथनेशिया को पहली बार सैद्धांतिक मंजूरी दी थी।
पैसिव vs एक्टिव यूथनेशिया: अंतर समझें
| श्रेणी | अर्थ | भारत में स्थिति |
|---|---|---|
| पैसिव यूथनेशिया | जीवन रक्षक प्रणाली (वेंटिलेटर, फीडिंग ट्यूब) को हटा लेना ताकि प्राकृतिक मृत्यु हो सके। | वैध (सुप्रीम कोर्ट की शर्तों के अधीन) |
| एक्टिव यूथनेशिया | घातक इंजेक्शन या दवा देकर सीधे तौर पर जीवन समाप्त करना। | अवैध (इसे हत्या माना जाता है) |
2018 का 'लिविंग विल' (Living Will) फैसला
2018 में सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक पीठ ने इसे और विस्तार दिया। अब भारत में:
प्रत्येक व्यक्ति को यह अधिकार है कि वह स्वस्थ रहते हुए एक 'लिविंग विल' लिख सके।
इसमें वह यह निर्देश दे सकता है कि यदि भविष्य में वह ऐसी स्थिति में पहुँच जाए जहाँ ठीक होने की उम्मीद न हो, तो उसे लाइफ सपोर्ट पर न रखा जाए।
2023-24 में कोर्ट ने इन नियमों को और सरल बनाया है ताकि डॉक्टरों और परिजनों को कानूनी पेचीदगियों का सामना न करना पड़े।
ताजा मामला: 32 वर्षीय व्यक्ति को राहत
ताजा मामले में सुप्रीम कोर्ट ने 32 वर्षीय मरीज (जो लंबे समय से दिमागी तौर पर मृतप्राय स्थिति में था) के माता-पिता की याचिका पर सुनवाई करते हुए लाइफ सपोर्ट हटाने की अनुमति दी। कोर्ट ने माना कि जब जीवन केवल मशीनों पर आधारित हो और मरीज केवल पीड़ा सह रहा हो, तो उसे कृत्रिम रूप से खींचना उसके मानवीय अधिकारों का उल्लंघन है।