राजस्थान में एथिक्स की परीक्षा जब जनता की सड़कों और पानी के बजट से मलाई काटी गई, तो मचा बवाल

Post

News India Live, Digital Desk : आज 6 जनवरी 2026 है और राजस्थान की गुलाबी नगरी जयपुर में चुनावी चर्चाओं से ज्यादा चर्चा एक बंद कमरे के भीतर हो रही सुनवाई की है। बात किसी सामान्य विवाद की नहीं, बल्कि उस 'विधायक निधि' (MLA-LAD Fund) की है जिससे हमारे आपके मोहल्ले में विकास होना था। आरोप बहुत संगीन है कहा जा रहा है कि काम के बदले 20 प्रतिशत कमीशन माँगा गया। इसी मामले को लेकर अब विधानसभा की एथिक्स कमेटी यानी 'आचार समिति' पूरी तरह से सख्त एक्शन के मूड में नजर आ रही है।

मामला क्या है? थोड़ा सा पीछे चलते हैं...
सच तो यह है कि सरकारी कामों में 'कमीशन' की बातें नई नहीं हैं, लेकिन इस बार ये मामला सीधा विधानसभा की दहलीज तक पहुँच गया। एक प्राइवेट फर्म के कर्मचारी ने जो हिम्मत दिखाई है, वह काबिले-तारीफ़ है। उस शख्स ने खुलकर बताया कि किस तरह सरकारी फंड को पास कराने और काम के बदले अधिकारियों या बिचौलियों ने खुलेआम 'हिस्सा' माँगा। सोचिए, अगर किसी काम में 20 फीसदी पैसा कमीशन में ही चला जाएगा, तो वो सड़क या नाली कितनी टिकाऊ बनेगी?

एथिक्स कमेटी की आज की हलचल
समिति ने आज इस मामले के हर पहलू को गहराई से समझने के लिए गवाहों और शिकायतकर्ता को आमने-सामने बिठाया। यहाँ सिर्फ गवाही नहीं हो रही, बल्कि उन 'सबूतों' को भी खंगाला जा रहा है जो दावों को पुख्ता करते हैं। एथिक्स कमेटी का काम ये तय करना है कि हमारे लोकतांत्रिक मंदिर यानी विधानसभा के मान-सम्मान को कुछ चंद लोगों की लालच ने कितनी चोट पहुँचाई है।

अंदरूनी सूत्रों की मानें तो कमेटी के सदस्यों का रुख इस बार समझौतावादी नहीं बल्कि बेहद सख्त है। सवाल केवल पैसों का नहीं, बल्कि जवाबदेही (Accountability) का भी है। आखिर क्यों आम जनता के टैक्स के पैसे पर बिचौलियों की गिद्ध दृष्टि टिकी रहती है?

आम जनता को क्या उम्मीद रखनी चाहिए?
देखिये, राजस्थान में अक्सर ऐसी जाँचें समय के साथ फाइलों में दब जाती हैं, लेकिन इस बार मामला 'नैतिकता' यानी एथिक्स से जुड़ा है। विधानसभा अध्यक्ष और पूरी कमेटी ये जानती है कि लोगों का भरोसा अब कम हो रहा है। ऐसे में ये सुनवाई केवल एक औपचारिकता नहीं, बल्कि सिस्टम की साख बचाने की कोशिश है।

आने वाले कुछ दिनों में साफ हो जाएगा कि इस मामले की गाज किन-किन लोगों पर गिरती है। पर एक बात तय है—अब 'कमीशनखोरों' को समझ जाना चाहिए कि ज्यों-ज्यों जागरूकता बढ़ रही है, उनके लिए बंद कमरे के ये खेल खेलना और मुश्किल होता जाएगा।