बिना पेनिट्रेशन के स्खलन रेप नहीं छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने पलटा निचली अदालत का फैसला ,दुष्कर्म की सजा को बदला

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News India Live, Digital Desk: छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय की एकल पीठ ने एक आपराधिक अपील पर सुनवाई करते हुए भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 375 और धारा 376 (बलात्कार) की व्याख्या पर एक महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। कोर्ट ने दोषी की सजा को कम करते हुए उसे बलात्कार के बजाय 'छेड़छाड़' का दोषी माना है।

1. कोर्ट का मुख्य तर्क (The Legal Ruling)

जस्टिस दीपक कुमार तिवारी की पीठ ने मामले के तथ्यों और मेडिकल रिपोर्ट का विश्लेषण करने के बाद निम्नलिखित बातें कहीं:

धारा 375 की व्याख्या: कोर्ट ने कहा कि बलात्कार के अपराध को स्थापित करने के लिए 'पेनिट्रेशन' (लिंग का प्रवेश) एक अनिवार्य शर्त है। भले ही यह प्रवेश मामूली ही क्यों न हो, कानूनन इसका होना जरूरी है।

मेडिकल साक्ष्य: इस मामले में पीड़िता की मेडिकल जांच में जबरन यौन संबंध या किसी भी तरह के 'पेनिट्रेशन' के निशान नहीं पाए गए थे। हालांकि, शरीर पर वीर्य (Semen) के अंश मिले थे।

निष्कर्ष: कोर्ट ने माना कि बिना प्रवेश के शरीर पर स्खलन होना धारा 375 के तहत बलात्कार नहीं है, बल्कि यह धारा 354 (महिला की लज्जा भंग करना) के तहत एक गंभीर अपराध है।

2. मामले की पृष्ठभूमि (Case Background)

यह मामला वर्ष 2017 का है, जिसमें एक आरोपी को निचली अदालत ने बलात्कार का दोषी ठहराते हुए 10 साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई थी। आरोपी ने इस फैसले को हाई कोर्ट में चुनौती दी थी।

आरोपी के वकील ने तर्क दिया था कि पीड़िता के बयानों और मेडिकल साक्ष्यों में विरोधाभास है, क्योंकि बलात्कार की पुष्टि के लिए आवश्यक शारीरिक लक्षण मौजूद नहीं थे।

3. सजा में बदलाव (Altered Conviction)

हाई कोर्ट ने आरोपी की बलात्कार (धारा 376) की सजा को रद्द कर दिया। हालांकि, आरोपी को पूरी तरह बरी नहीं किया गया:

धारा 354 (छेड़छाड़): कोर्ट ने आरोपी को धारा 354 के तहत दोषी माना।

सजा: चूंकि आरोपी पहले ही लगभग 6 साल जेल में काट चुका था, कोर्ट ने उसकी अब तक की जेल अवधि को ही पर्याप्त सजा मानते हुए उसे रिहा करने का आदेश दिया।

कानूनी महत्व:

यह फैसला भविष्य के उन मामलों के लिए एक नजीर (Precedent) बनेगा जहाँ साक्ष्यों के अभाव में बलात्कार की धाराएं लगाई जाती हैं। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि “आपराधिक कानून में सजा केवल अनुमान के आधार पर नहीं, बल्कि कानून की स्पष्ट परिभाषा के आधार पर दी जानी चाहिए।”

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