डॉलर का दबदबा खत्म? BRICS में भारत और चीन का डिजिटल दांव, क्या है ये डी-डॉलराइजेशन की पूरी कहानी?
News India Live, Digital Desk: लंबे समय से दुनिया भर के व्यापार और अर्थव्यवस्था पर अमेरिकी डॉलर का एकछत्र राज रहा है। लेकिन अब कुछ बदल रहा है। दुनिया के कुछ सबसे शक्तिशाली देश, जिनमें भारत और चीन भी शामिल हैं, इस 'डॉलर राज' को चुनौती दे रहे हैं। इसी चर्चा के केंद्र में दो शब्द बार-बार सुनाई दे रहे हैं - 'ब्रिक्स' (BRICS) और 'डी-डॉलराइजेशन'। आइए, इसे आसान भाषा में समझते हैं कि आखिर ये हो क्या रहा है और इससे हम पर क्या असर पड़ सकता है।
सबसे पहले, ये डी-डॉलराइजेशन आखिर है क्या?
डी-डॉलराइजेशन का सीधा सा मतलब है वैश्विक व्यापार और वित्तीय लेनदेन में अमेरिकी डॉलर पर निर्भरता को कम करना।अभी तक, दुनिया के ज्यादातर देश एक-दूसरे से व्यापार करने के लिए डॉलर का ही इस्तेमाल करते हैं। तेल खरीदना हो या कोई दूसरा सामान, कीमत डॉलर में ही चुकाई जाती है। इस वजह से अमेरिका का दुनिया की अर्थव्यवस्था पर काफी नियंत्रण रहता है। कई देश, खासकर रूस और चीन, अमेरिका की इस ताकत से खुश नहीं हैं। उनका मानना है कि अमेरिका अपनी इस ताकत का इस्तेमाल दूसरे देशों पर प्रतिबंध लगाने और अपनी नीतियां थोपने के लिए करता है।
तो BRICS इसमें क्या कर रहा है?
ब्रिक्स (ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका) दुनिया की उभरती हुई अर्थव्यवस्थाओं का एक शक्तिशाली समूह है। ये देश मिलकर दुनिया की आबादी का लगभग 45% हिस्सा हैं और वैश्विक जीडीपी में भी इनकी बड़ी हिस्सेदारी है। ये देश अब आपसी व्यापार को अपनी ही मुद्राओं में बढ़ावा देने पर जोर दे रहे हैं।
सोचिए, अगर भारत रूस से तेल रुपये में खरीद सके और चीन, ब्राजील के साथ अपने युआन में व्यापार कर सके, तो डॉलर की जरूरत अपने आप कम हो जाएगी। इसके लिए ब्रिक्स देश 'ब्रिक्स पे' जैसे अपने खुद के पेमेंट सिस्टम पर भी काम कर रहे हैं, जो अमेरिकी नियंत्रण वाले स्विफ्ट (SWIFT) सिस्टम का विकल्प बन सकता है।
चीन का डिजिटल युआन: एक बड़ा गेम-चेंजर?
इस पूरी कहानी में चीन का डिजिटल युआन (जिसे ई-सीएनवाई भी कहते हैं) एक तुरुप का इक्का साबित हो सकता है। चीन दुनिया के पहले बड़े देशों में से है जिसने अपनी आधिकारिक डिजिटल करेंसी लॉन्च की है।यह कोई क्रिप्टोकरेंसी नहीं, बल्कि चीन के सेंट्रल बैंक द्वारा जारी की गई डिजिटल मुद्रा है।
इसका सबसे बड़ा फायदा यह है कि डिजिटल युआन के जरिए होने वाले लेनदेन पर अमेरिका की नजर नहीं होगी। यह तेज, सस्ता और सीधे दो देशों के बीच हो सकता है, जिससे स्विफ्ट सिस्टम को बायपास किया जा सकता है चीन इसे अपने व्यापारिक भागीदार देशों में बढ़ावा दे रहा है, जिससे डॉलर के वर्चस्व को सीधी चुनौती मिल रही है
इस सब में भारत कहाँ खड़ा है?
भारत का रुख इस मामले में बहुत सधा हुआ और रणनीतिक है। भारत भी डी-डॉलराइजेशन का समर्थक है और अपनी राष्ट्रीय मुद्रा में व्यापार को बढ़ावा देना चाहता है। रूस के साथ रुपये में तेल का व्यापार इसका एक बड़ा उदाहरण है।
हालांकि, भारत किसी एक मुद्रा, जैसे चीनी युआन, पर पूरी तरह निर्भर होने के पक्ष में नहीं हैभारत एक ऐसी व्यवस्था चाहता है जहाँ कई मुद्राएं एक साथ काम कर सकें, जिससे किसी एक देश का दबदबा न रहे हाल ही में, भारत की तेल रिफाइनरियों द्वारा रूसी तेल के लिए चीनी युआन में भुगतान करने की खबरें आईं, जो दिखाता है कि भारत अपने राष्ट्रीय हितों को देखते हुए व्यावहारिक कदम उठा रहा है।
तो क्या डॉलर का राज सच में खत्म हो जाएगा?
इतनी जल्दी नहीं। डॉलर अभी भी दुनिया की सबसे बड़ी रिजर्व करेंसी है और इसका स्थान लेना आसान नहीं है।लेकिन यह सच है कि बदलाव की शुरुआत हो चुकी है।ब्रिक्स देशों के प्रयास और चीन के डिजिटल युआन जैसी पहल यह साफ संकेत दे रही है कि दुनिया अब एकध्रुवीय वित्तीय व्यवस्था से बहुध्रुवीय व्यवस्था की ओर बढ़ रही है। डॉलर का सिंहासन अब उतना मजबूत नहीं रहा, जितना पहले हुआ करता था और आने वाला समय वैश्विक अर्थव्यवस्था में बड़े बदलावों का गवाह बन सकता है।