लोहड़ी के हर गाने में जिस दुल्ला भट्टी का जिक्र होता है, क्या आपको पता है पाकिस्तान में कहाँ है उनकी मज़ार?
News India Live, Digital Desk : लोहड़ी की शाम जब आग जलती है, तो फिजाओं में 'सुंदर मुंदरिए' के बोल गूंजने लगते हैं। इस गाने में जिस दुल्ला भट्टी (Dulla Bhatti) का ज़िक्र है, वे कोई काल्पनिक पात्र नहीं बल्कि 16वीं शताब्दी के एक असली महानायक थे।
गरीबों का मसीहा: पंजाब का 'रॉबिन हुड'
मुगल काल (अकबर के समय) में दुल्ला भट्टी का नाम पूरे पंजाब में गूंजता था। उनके पिता और दादा ने लगान के खिलाफ विद्रोह किया था, जिसकी विरासत को उन्होंने आगे बढ़ाया। उन्हें पंजाब का रॉबिन हुड इसलिए कहा जाता था क्योंकि वह अमीरों और ज़ालिमों से धन लूटकर गरीबों में बांट देते थे।
वो किस्सा जिसने उन्हें अमर कर दिया (सुंदर और मुंदर)
कहा जाता है कि एक गरीब ब्राह्मण की दो बेटियां थीं—सुंदर और मुंदर। उनके इलाके का ज़मींदार उन लड़कियों की खूबसूरती पर फिदा था और उन्हें अगवा कर अपने पास ले जाना चाहता था। जब दुल्ला भट्टी को यह पता चला, तो उन्होंने भाई और पिता की भूमिका निभाते हुए बीच जंगल में दोनों बेटियों की शादी करवाई। चूंकि वे जंगल में थे और उनके पास देने के लिए कोई जेवर या कीमती चीज़ नहीं थी, तो उन्होंने शक्कर (चीनी) ही फेरों के वक्त शगुन के तौर पर लड़कियों की झोली में डाल दी। लोहड़ी के गाने की आखिरी लाइन "सेर शक्कर पाई हो" उसी वाकये की याद दिलाती है।
पाकिस्तान में आज भी है उनकी गूँज
दुल्ला भट्टी का जन्म आज के पाकिस्तान वाले पंजाब (पिंडी भट्टियां) में हुआ था। उन्हें उनके विद्रोह की वजह से फांसी की सज़ा दी गई थी। हैरानी की बात यह है कि आज भी उनकी मज़ार पाकिस्तान के लाहौर स्थित 'मियानी साहिब कब्रिस्तान' (Miani Sahib Graveyard) में मौजूद है। साल दर साल लोग वहाँ उनकी बहादुरी और मानवता के लिए मत्था टेकने आते हैं।
त्योहारों से जुड़ा इंसानियत का रिश्ता
आज लोहड़ी भले ही हम भारत में बड़े शौक से मनाते हैं, लेकिन इसकी जड़ें उस साझा इतिहास से जुड़ी हैं जो भारत और पाकिस्तान दोनों को जोड़ता है। दुल्ला भट्टी सिर्फ सिखों या हिंदुओं के नायक नहीं थे, बल्कि वह हर उस इंसान के लिए मिसाल थे जो अन्याय के खिलाफ खड़ा हुआ।
अगली बार जब आप आग के चक्कर लगाएँ और यह गीत गाएं, तो एक पल के लिए उस निडर योद्धा को ज़रूर याद कीजियेगा जिसने अपनी जान की परवाह किए बिना बेटियों की इज़्ज़त बचाई थी। लोहड़ी की यही भावना—सबका साथ देना और बुराई को जला देना आज भी इसे सबसे खूबसूरत त्योहार बनाती है।