पति ने बेवफाई को बनाया तलाक का 'हथियार', हाईकोर्ट ने सिखाया ऐसा सबक कि पलट गई बाजी! जानिए ऐतिहासिक फैसला
Divorce new rules India : बिलासपुर हाईकोर्ट ने पति-पत्नी के रिश्तों पर एक ऐसा क्रांतिकारी फैसला सुनाया है, जो आने वाले समय में लाखों वैवाहिक विवादों की दिशा बदल सकता है। कोर्ट ने साफ कर दिया है कि अगर कोई पति अपनी पत्नी की कथित गलतियों या चारित्रिक दोषों को जानने के बाद भी स्वेच्छा से उसके साथ सालों तक वैवाहिक संबंध बनाता है, तो यह कानूनी रूप से 'माफी' मानी जाएगी। इसके बाद उन्हीं पुरानी बातों को हथियार बनाकर तलाक की मांग नहीं की जा सकती।
दहेज केस से लेकर साथ रहने तक की कहानी
यह मामला 2003 में हुई एक शादी से शुरू हुआ था। शादी के कुछ साल बाद पत्नी ने पति और ससुराल वालों पर दहेज के लिए प्रताड़ित करने का आरोप लगाते हुए केस दर्ज करा दिया। लंबी कानूनी लड़ाई के बाद, साल 2009 में पति और उसके परिवार को अदालत ने सभी आरोपों से बरी कर दिया। हैरानी की बात यह थी कि इस बड़ी कानूनी जीत के बाद भी पति ने पत्नी से रिश्ता खत्म नहीं किया, बल्कि दोनों 2010 से 2017 तक, यानी पूरे सात साल एक छत के नीचे पति-पत्नी की तरह रहे।
अवैध संबंध का आरोप और तलाक का दांव
कहानी में मोड़ तब आया जब 2020 में पति ने अचानक पत्नी पर क्रूरता और अवैध संबंध का आरोप लगाते हुए तलाक का केस दायर कर दिया। पति ने दलील दी कि उसने पत्नी को किसी दूसरे व्यक्ति के साथ आपत्तिजनक हालत में देखा था, जिसे लेकर समाज में काफी विवाद भी हुआ था। निचली अदालत ने पति के तर्कों को सही माना और तलाक की डिक्री पारित कर दी। लेकिन पत्नी ने हार नहीं मानी और इस फैसले को बिलासपुर हाईकोर्ट में चुनौती दी, जहां से पूरा केस पलट गया।
हाईकोर्ट का ब्रह्मास्त्र- 'माफी का सिद्धांत'
हाईकोर्ट ने मामले की गहराई से जांच की और पाया कि पति के आरोप विरोधाभासी हैं। कोर्ट ने कहा कि पति को 2 अक्टूबर 2017 को ही पत्नी के कथित अवैध संबंधों के बारे में पता चल गया था। इसके बावजूद वह 17 दिसंबर 2017 तक जानबूझकर पत्नी के साथ रहा। जजों की बेंच ने इसे कानूनी तौर पर माफी (Condonation) माना। कोर्ट ने टिप्पणी की, "जब किसी गलती की जानकारी होने के बाद भी पति स्वेच्छा से पत्नी के साथ वैवाहिक जीवन जारी रखता है, तो यह माना जाएगा कि उसने उस गलती को माफ कर दिया है। अब उसी पुरानी घटना को आधार बनाकर तलाक नहीं मांगा जा सकता।"
हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13(1) का हवाला देते हुए हाईकोर्ट ने पति के आरोपों को अविश्वसनीय करार दिया और निचली अदालत के फैसले को रद्द करते हुए पत्नी की अपील स्वीकार कर ली।
क्यों मील का पत्थर है यह फैसला?
यह फैसला उन हजारों तलाक के मामलों पर सीधा असर डालेगा, जहां सालों पुरानी और माफ की जा चुकी बातों को कुरेदकर रिश्तों को खत्म करने की कोशिश की जाती है।
- क्षमा को कानूनी मान्यता: यह फैसला विवाह में 'क्षमा' के महत्व को स्थापित करता है।
- झूठे आरोपों पर लगाम: इससे उन लोगों पर लगाम लगेगी जो माफ करने के बाद भी पुरानी घटनाओं का इस्तेमाल ब्लैकमेल या तलाक के लिए करते हैं।
- महिलाओं को सुरक्षा: यह महिलाओं को ऐसे झूठे और विलंबित आरोपों से बचाएगा।
- रिश्तों में विश्वास बहाली: यह फैसला जोड़ों को अपने विवादों को समझदारी और माफी के साथ सुलझाने के लिए प्रेरित करेगा।