PhD कर ली लेकिन ऑनलाइन नाम नहीं? बिहार के विश्वविद्यालयों की लापरवाही से दांव पर छात्रों का भविष्य
News India Live, Digital Desk: शिक्षा के क्षेत्र में बिहार का इतिहास गौरवशाली रहा है, लेकिन आज की प्रशासनिक सुस्ती ने शोधार्थियों (Scholars) के लिए मुश्किलें खड़ी कर दी हैं। यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन (UGC) का एक साफ़ नियम है कि किसी भी छात्र को पीएचडी की डिग्री देने के बाद, उसकी थीसिस को 'शोधगंगा' पोर्टल पर डिजिटल रूप में अपलोड करना अनिवार्य है। लेकिन बिहार के विश्वविद्यालयों का रिकॉर्ड इस मामले में काफी खराब नजर आ रहा है।
क्या है यह 'शोधगंगा' और यह क्यों ज़रूरी है?
आसान शब्दों में कहें तो 'शोधगंगा' पीएचडी थीसिस का एक ऐसा ऑनलाइन डेटाबेस है, जहाँ से कोई भी यह चेक कर सकता है कि आपने क्या शोध किया है। इसका मुख्य उद्देश्य 'प्लगिअरिज्म' (साहित्यिक चोरी) को रोकना है। अगर आपकी थीसिस ऑनलाइन नहीं है, तो कोई भी आपकी रिसर्च कॉपी कर सकता है या आप पर फर्जी डिग्री का आरोप भी लग सकता है।
यूजीसी (UGC) के सख्त नियम
यूजीसी ने 2009 और बाद में 2016 के रेगुलेशंस में स्पष्ट किया था कि डिग्री अवार्ड होने के 30 दिनों के भीतर सॉफ्ट कॉपी अपलोड होनी चाहिए। इससे न केवल रिसर्च में पारदर्शिता आती है, बल्कि देश भर के दूसरे छात्रों को भी नया आइडिया मिलता है। बिहार की बात करें तो कई बड़ी यूनिवर्सिटीज़ के डेटा सालों पुराने पड़े हैं, जिससे वहां के पीएचडी होल्डर्स की 'ग्लोबल विजिबिलिटी' जीरो हो गई है।
पिछड़ने के पीछे असली कारण क्या हैं?
ज़मीनी हकीकत पर नज़र डालें तो बिहार की यूनिवर्सिटीज़ में डिजिटल इन्फ्रास्ट्रक्चर की भारी कमी है। इसके अलावा, एडमिनिस्ट्रेशन लेवल पर तकनीकी समझ का अभाव और तालमेल की कमी ने इस समस्या को और गंभीर बना दिया है। कई बार छात्र अपनी मेहनत यूनिवर्सिटी में जमा कर देते हैं, लेकिन फाइलों के बोझ तले दबकर वह थीसिस कभी कंप्यूटर तक नहीं पहुंच पाती।
टॉप 10 विश्वविद्यालय जो कर रहे हैं कमाल
जहाँ बिहार इस दौड़ में पीछे है, वहीं कुछ संस्थान मिसाल पेश कर रहे हैं। इस लिस्ट में जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी (JNU), सावित्रीबाई फुले पुणे यूनिवर्सिटी, मद्रास यूनिवर्सिटी और जामिया मिलिया इस्लामिया जैसे नाम टॉप पर बने हुए हैं। इन संस्थानों ने हज़ारों की संख्या में अपनी थीसिस अपलोड कर शोध की गरिमा को बरकरार रखा है।