मोदी और ट्रंप की गहरी दोस्ती, फिर भी क्यों नहीं हो पाई बड़ी ट्रेड डील? सामने आ गई असली वजह
News India Live, Digital Desk: पिछले कुछ सालों में हमने देखा है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और डोनाल्ड ट्रंप के बीच कितनी शानदार बॉन्डिंग रही है। चाहे वो 'हाउडी मोदी' कार्यक्रम हो या अहमदाबाद का 'नमस्ते ट्रंप', दोनों नेताओं की केमिस्ट्री ने पूरी दुनिया का ध्यान खींचा। लेकिन, एक सवाल अक्सर लोगों के मन में रहता है जब दोस्ती इतनी गहरी थी, तो भारत और अमेरिका के बीच वो बड़ा व्यापारिक समझौता (Trade Deal) क्यों नहीं हो पाया, जिसकी हर तरफ चर्चा थी?
अब इस राज से पर्दा उठा है और किसी और ने नहीं, बल्कि ट्रंप के बेहद खास और उनके अगले वाणिज्य मंत्री (Commerce Secretary) के तौर पर चुने गए हॉवर्ड लुटनिक ने इस पर खुलकर बात की है।
बात कहाँ आकर अटकी थी?
हॉवर्ड लुटनिक ने हाल ही में बताया कि बात सिर्फ दोस्ती की नहीं थी, बात थी सिद्धांतों और 'फेयर ट्रेड' की। लुटनिक के अनुसार, डोनाल्ड ट्रंप का एक सीधा सा फंडा है "अगर हम आपसे सामान मंगाने पर जीरो टैक्स ले रहे हैं, तो आप भी हमसे वही उम्मीद रखिए।"
मामला अटकने की सबसे बड़ी वजह बनी 'रेसिप्रोकल टैरिफ' (Reciprocal Tariffs)। ट्रंप चाहते थे कि अगर अमेरिका भारतीय उत्पादों के लिए अपने दरवाजे खोल रहा है, तो भारत को भी अमेरिकी सामानों पर लगने वाली अपनी हाई ड्यूटी (Tax) को कम करना होगा।
वो मशहूर हार्वे डेविडसन का किस्सा
आपको याद होगा, ट्रंप अक्सर अपने भाषणों में 'हार्वे डेविडसन' मोटरसाइकिल का जिक्र करते थे। उन्होंने कहा था कि जब अमेरिका से यह बाइक भारत जाती है, तो उस पर भारी टैक्स लगाया जाता है, जिससे वो वहां बहुत महंगी हो जाती है। लुटनिक ने खुलासा किया कि पीएम मोदी ने बातचीत के दौरान इन टैक्सों को कम करने का भरोसा भी दिया था। यहाँ तक कि मोदी जी ने ट्रंप से कहा था कि वो इस पर काम करेंगे, लेकिन ट्रंप सिर्फ कटौती से खुश नहीं थे। वो चाहते थे कि टैरिफ का ढांचा दोनों तरफ से बराबरी का हो।
मोदी जी की अपनी मजबूरी और ट्रंप की अपनी जिद
भारत जैसे विकासशील देश के लिए अचानक से टैक्स हटाना आसान नहीं होता क्योंकि यहाँ के घरेलू उद्योगों को भी बचाना जरूरी है। वहीं, ट्रंप की 'अमेरिका फर्स्ट' नीति कहती थी कि अगर कोई देश हमारे ऊपर ज्यादा टैक्स लगाएगा, तो हम भी चुप नहीं बैठेंगे। यही वो रस्साकशी थी जिसके कारण दुनिया की दो सबसे बड़ी डेमोक्रेसी एक साइन की हुई डील तक नहीं पहुँच पाईं।
आगे क्या होगा?
अब जबकि डोनाल्ड ट्रंप एक बार फिर अमेरिका की कमान संभालने की तैयारी में हैं, तो सबकी नजरें इस बात पर टिकी हैं कि क्या इस बार यह ट्रेड डील पूरी होगी? हॉवर्ड लुटनिक की बातों से साफ है कि ट्रंप प्रशासन इस बार और ज्यादा तैयारी के साथ आएगा। भारत के लिए यह एक बड़ी चुनौती भी है और मौका भी, क्योंकि अमेरिका अब चीन पर अपनी निर्भरता कम करना चाहता है।
लब्बोलुआब यह है कि इंटरनेशनल रिलेशन सिर्फ गले मिलने या साथ फोटो खिंचवाने से नहीं चलते, वहां व्यापारिक हितों को सबसे ऊपर रखा जाता है। अब देखना दिलचस्प होगा कि मोदी और ट्रंप की ये 'सेकंड पारी' दोनों देशों के कारोबार के लिए क्या नया लेकर आती है।