Crop Insurance in Punjab : फसल बीमा योजना, सरकार की सबसे बड़ी स्कीम, फिर भी क्यों मुसीबत में है किसान?

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News India Live, Digital Desk: Crop Insurance in Punjab : केंद्र सरकार ने किसानों को बेमौसम बारिश, सूखा, ओलावृष्टि और कीड़ों के हमले से होने वाले नुकसान से बचाने के लिए 'प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना' (PMFBY) जैसी बड़ी स्कीम चलाई है। इस योजना का मकसद है कि अगर किसी भी प्राकृतिक आपदा से किसान की फसल बर्बाद होती है तो उसकी मेहनत और पैसा डूबे नहीं, बल्कि बीमा कंपनी उसे मुआवजा देकर घाटे से उबारे। सरकार दावा करती है कि यह दुनिया की सबसे बड़ी किसान बीमा योजना है, लेकिन जमीन पर हकीकत कुछ और ही तस्वीर बयां कर रही है। पंजाब समेत कई राज्यों में किसान परेशान हैं और उन्हें इस योजना का उतना लाभ नहीं मिल पा रहा है, जितना मिलना चाहिए।

क्यों फायदेमंद नहीं हो रही योजना?

किसानों के लिए बनाई गई यह महत्वाकांक्षी योजना कई बड़ी चुनौतियों से जूझ रही है, जिसके कारण अन्नदाता खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहा है।

  1. जागरूकता की भारी कमी: सबसे बड़ी समस्या यह है कि गांवों में रहने वाले छोटे और सीमांत किसानों को इस योजना के बारे में पूरी जानकारी ही नहीं है। एक सर्वे के मुताबिक, करीब 37% किसानों को ही इस स्कीम के बारे में पता था। उन्हें यह नहीं मालूम कि बीमा कैसे कराएं, नुकसान होने पर किसे और कब सूचना दें, और मुआवजा पाने की प्रक्रिया क्या है।
  2. पंजाब ने बनाई दूरी: हैरानी की बात है कि कृषि प्रधान राज्य होने के बावजूद पंजाब ने कभी भी प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना को पूरी तरह से लागू ही नहीं किया। राज्य सरकार का तर्क था कि इस योजना में प्रीमियम का बोझ ज्यादा है और क्लेम सेटलमेंट (मुआवजा देने की प्रक्रिया) पारदर्शी नहीं है। पंजाब का मानना था कि राज्य में 99% सिंचाई की सुविधा है, इसलिए यहां फसल खराब होने का खतरा दूसरे राज्यों के मुकाबले कम है, तो ज्यादा प्रीमियम क्यों भरा जाए? इसी वजह से आज जब बाढ़ या बेमौसम बारिश से फसल बर्बाद होती है, तो यहां के किसान मुआवजे के लिए सरकार के राहत पैकेज का इंतजार करते रह जाते हैं।
  3. मुआवजे में अंतहीन देरी: जिन राज्यों में यह योजना लागू है, वहां भी सबसे बड़ी शिकायत मुआवजे में होने वाली देरी को लेकर है। फसल बर्बाद होने के कई-कई महीनों बाद तक किसानों को पैसा नहीं मिलता। इसके पीछे कई कारण हैं, जैसे- राज्य सरकारों द्वारा अपना प्रीमियम हिस्सा देर से जमा करना, नुकसान का आकलन करने में लगने वाला लंबा समय और बीमा कंपनियों और राज्यों के बीच विवाद।
  4. बीमा कंपनियों की मनमानी: कई किसान आरोप लगाते हैं कि बीमा कंपनियां मुनाफा कमाने पर ज्यादा ध्यान देती हैं। वे अक्सर नुकसान का आकलन कम करके आंकती हैं ताकि मुआवजा कम देना पड़े। कई जिलों में तो बीमा कंपनियों के दफ्तर तक नहीं हैं, जिससे किसान अपनी शिकायत लेकर कहीं जा भी नहीं पाता।

क्या है आगे का रास्ता?

ऐसा नहीं है कि सरकार इन समस्याओं से अनजान है। सरकार ने 2020 में इस योजना में कुछ बड़े बदलाव भी किए, जैसे- अब कर्ज लेने वाले किसानों के लिए भी बीमा कराना अनिवार्य नहीं है, इसे स्वैच्छिक बना दिया गया है। साथ ही, राज्यों को भी कुछ छूट दी गई है। हाल ही में बाढ़ से हुए भारी नुकसान के बाद अब पंजाब सरकार भी इस योजना में फिर से शामिल होने पर विचार कर रही है।

जरूरत इस बात की है कि योजना को और ज्यादा किसान-हितैषी बनाया जाए। मुआवजे की प्रक्रिया को टेक्नोलॉजी की मदद से तेज और पारदर्शी बनाया जाए और सबसे जरूरी, गांव-गांव जाकर किसानों को इस योजना के बारे में जागरूक किया जाए, ताकि जब आसमान से आफत बरसे तो किसान अकेला और लाचार महसूस न करे।