कोमा vs ब्रेन डेथ: हरीश राणा केस के बाद क्यों छिड़ी बहस? जानें कब वेंटिलेटर हटाना 'मर्डर' है और कब कानूनी 'मौत'
नई दिल्ली: 13 साल का लंबा इंतजार और एक अचेत शरीर—हरीश राणा के मामले में सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसले ने पूरे देश को झकझोर दिया है। कोर्ट ने उन्हें 'पैसिव यूथेनेशिया' (इच्छामृत्यु) की अनुमति देते हुए लाइफ सपोर्ट सिस्टम हटाने की इजाजत दे दी है। लेकिन इस भावुक कर देने वाले फैसले ने एक बड़ा कानूनी और मेडिकल सवाल खड़ा कर दिया है: जब 'ब्रेन डेड' घोषित होने पर डॉक्टर खुद वेंटिलेटर हटा सकते हैं, तो 'कोमा' के मरीज के लिए कोर्ट के चक्कर क्यों काटने पड़ते हैं? आइए, दिल्ली के जीबी पंत अस्पताल के न्यूरोसर्जरी विभाग के पूर्व एचओडी डॉ. दलजीत सिंह के इनपुट के साथ समझते हैं इन दोनों स्थितियों के बीच की उस बारीक लकीर को, जो जीवन और मृत्यु का फैसला करती है।
कोमा (Coma): बुझती लौ, जो फिर जल सकती है
कोमा एक ऐसी स्थिति है जिसमें व्यक्ति गहरी बेहोशी में होता है, लेकिन वह 'जीवित' है।
दिमाग की स्थिति: कोमा में मस्तिष्क पूरी तरह मृत नहीं होता। दिमाग का कुछ हिस्सा काम करता रहता है, जिससे दिल धड़कता है और फेफड़े (अक्सर बिना सपोर्ट के भी) सांस ले सकते हैं।
रिकवरी की उम्मीद: मेडिकल साइंस मानता है कि कोमा से बाहर आने की संभावना हमेशा बनी रहती है। मरीज हफ्तों, महीनों या हरीश राणा की तरह सालों बाद भी होश में आ सकता है।
कानूनी स्थिति: कोमा के मरीज को मृत नहीं माना जा सकता। इसलिए, बिना कोर्ट की अनुमति के उसका लाइफ सपोर्ट हटाना कानूनी रूप से 'हत्या' की श्रेणी में आ सकता है।
ब्रेन डेथ (Brain Death): जब इंजन पूरी तरह ठप हो जाए
ब्रेन डेथ वह स्थिति है जिसे मेडिकल और कानूनी रूप से 'पूर्ण मृत्यु' माना जाता है।
दिमाग की स्थिति: इसमें मस्तिष्क और ब्रेन स्टेम (Brain Stem) पूरी तरह और अपरिवर्तनीय (Irreversible) रूप से काम करना बंद कर देते हैं। यानी दिमाग के अंदर कोई भी इलेक्ट्रिकल एक्टिविटी नहीं बची होती।
शरीर का हाल: वेंटिलेटर की मदद से हृदय कुछ समय तक धड़क सकता है और अंगों को ऑक्सीजन मिल सकती है, लेकिन दिमाग मर चुका होता है।
कानूनी स्थिति: डॉक्टरों का एक विशेष बोर्ड कई टेस्ट के बाद व्यक्ति को 'ब्रेन डेड' घोषित करता है। इसके बाद वेंटिलेटर हटाने के लिए कोर्ट की अनुमति की जरूरत नहीं होती, क्योंकि व्यक्ति को पहले ही मृत घोषित किया जा चुका होता है। इसी स्थिति में 'अंगदान' (Organ Donation) संभव होता है।
डॉक्टर कैसे करते हैं पहचान?
डॉ. दलजीत सिंह के अनुसार, डॉक्टर 'एपनिया टेस्ट' और कई न्यूरोलॉजिकल परीक्षणों के जरिए यह तय करते हैं कि मरीज कोमा में है या ब्रेन डेड।
"ब्रेन डेड व्यक्ति कानूनी रूप से मृत है, उसके अंग ट्रांसप्लांट किए जा सकते हैं। लेकिन कोमा का मरीज एक 'जीवित' व्यक्ति है। कोमा में वेंटिलेटर हटाना एक बेहद संवेदनशील मामला है, क्योंकि वहाँ जीवन की संभावना शून्य नहीं हुई है। इसीलिए हरीश राणा जैसे मामलों में कोर्ट को हस्तक्षेप करना पड़ता है ताकि गरिमापूर्ण मृत्यु (Dignified Death) सुनिश्चित की जा सके।"
कानूनी पेंच: क्यों जरूरी है कोर्ट की अनुमति?
भारत में 'पैसिव यूथेनेशिया' को लेकर सख्त गाइडलाइंस हैं। कोमा के मामलों में जब एम्स जैसा मेडिकल बोर्ड यह प्रमाणित कर दे कि अब सुधार की 0% गुंजाइश है, तभी कोर्ट 'लिविंग विल' या परिजनों की प्रार्थना पर लाइफ सपोर्ट हटाने का आदेश देता है। यह प्रक्रिया इसलिए जटिल रखी गई है ताकि इस कानून का दुरुपयोग न हो सके।