सस्ता उजाला या सफेद हाथी? जानिए क्यों गांवों के लोग अपनी छतों पर सोलर पैनल लगाने से कतरा रहे हैं
News India Live, Digital Desk: आजकल शहर हो या गांव, हर तरफ बिजली के बिलों की टेंशन रहती है। ऐसे में जब सरकार की ओर से 'पीएम सूर्य घर मुफ्त बिजली योजना' की घोषणा हुई, तो लगा कि अब गांव-गांव की अंधेरी रातें और भारी-भरकम बिल इतिहास बन जाएंगे। लेकिन प्रयागराज के ग्रामीण इलाकों से जो खबरें आ रही हैं, वे कुछ और ही इशारा कर रही हैं। हैरान करने वाली बात यह है कि मुफ्त बिजली की इस स्कीम के प्रति ग्रामीण आबादी में वो जोश नहीं दिख रहा है, जिसकी उम्मीद सरकार ने लगाई थी।
मामला क्या है? क्यों कतरा रहे हैं लोग?
वैसे तो सुनने में यह स्कीम बहुत ही जादुई लगती है—"छत पर पैनल लगाओ और जिंदगी भर बिजली के बिल से आजादी पाओ।" पर ग्रामीण भाई-बहनों के लिए बात इतनी सीधी नहीं है। गाँव की चौपालों पर होने वाली बातों को अगर समझें, तो इसके पीछे कई बड़े पेंच फँसे हुए हैं।
सबसे बड़ी समस्या है 'शुरुआती पैसा'। सरकार सब्सिडी तो दे रही है, लेकिन सोलर पैनल लगवाने के लिए शुरू में जो मोटी रकम जेब से लगानी पड़ती है, वह किसी आम किसान या मज़दूर के लिए पहाड़ तोड़ने जैसा है। उन्हें लगता है कि इतने पैसे में तो वे कई सालों तक पुराना बिजली बिल भर सकते हैं।
भरोसे की कमी और जानकारी का अभाव
गाँव के लोगों का एक बड़ा सवाल है—"अगर पैनल खराब हो गया तो क्या?" रखरखाव (Maintenance) और मरम्मत को लेकर उनके मन में गहरा डर है। गाँव में सोलर एक्सपर्ट्स आसानी से मिलते नहीं हैं और लोगों को लगता है कि अगर कल को सिस्टम बिगड़ गया, तो वे न घर के रहेंगे न घाट के।
इसके अलावा, ग्रामीण घरों की छतें हमेशा इस काबिल नहीं होतीं कि वे भारी सोलर पैनलों का बोझ सह सकें। कई कच्चे मकान हैं या ऐसे पुराने घर, जहाँ सुरक्षा एक बड़ा मुद्दा है।
अवेयरनेस का तरीका पुराना है!
सच तो ये है कि शहरों में इंटरनेट और एड्स के जरिए लोगों को समझाना आसान है, लेकिन प्रयागराज के अंदरूनी गांवों में सिर्फ बैनर लगाने से काम नहीं चलता। वहां लोगों को इस तकनीक पर भरोसा दिलाने के लिए ज़मीनी स्तर पर विशेषज्ञों का होना ज़रूरी है। उन्हें बताना होगा कि यह 'खर्चा' नहीं बल्कि 'निवेश' है। फिलहाल, कागजी कार्यवाही और मुश्किल प्रोसेस की वजह से ग्रामीणों ने इस स्कीम से थोड़ी दूरी बना ली है।
अब आगे क्या?
क्या यह योजना फेल हो जाएगी? शायद नहीं। लेकिन अगर वाकई 'सूर्य घर' का सपना घर-घर तक पहुँचाना है, तो सब्सिडी को थोड़ा और सरल करना होगा और गाँवों में सर्विस सेंटर बनाने होंगे। जब तक लोग अपने पड़ोसी के घर का मीटर धीमा होते नहीं देखेंगे, तब तक उनके मन की यह झिझक नहीं जाएगी।
क्या आपको भी लगता है कि गाँवों में सोलर का भविष्य उज्ज्वल है? या फिर इसमें अभी और बड़े बदलावों की ज़रूरत है? अपनी राय कमेंट में ज़रूर दें।