CG High Court Verdict : फैमिली कोर्ट में अब ब्रह्मास्त्र बनेंगे व्हाट्सएप चैट और कॉल रिकॉर्डिंग, हाईकोर्ट ने प्राइवेसी पर फेयर ट्रायल को दी तरजीह

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News India Live, Digital Desk : छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट (Bilaspur High Court) ने वैवाहिक विवादों और तलाक के मामलों में डिजिटल सबूतों की अहमियत पर मुहर लगा दी है। जस्टिस सचिन सिंह राजपूत की बेंच ने एक महिला की याचिका को खारिज करते हुए कहा कि सच्चाई का पता लगाने के लिए फैमिली कोर्ट इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों को स्वीकार कर सकते हैं, भले ही वे भारतीय साक्ष्य अधिनियम के सामान्य नियमों के तहत न आते हों।

1. क्या था पूरा विवाद? (The Legal Battle)

यह मामला एक पति-पत्नी के बीच चल रहे तलाक के मुकदमे से जुड़ा है।

पति का कदम: पति ने फैमिली कोर्ट में अपनी पत्नी के साथ हुई व्हाट्सएप चैट और कुछ कॉल रिकॉर्डिंग्स को सबूत के तौर पर पेश करने की अनुमति मांगी थी।

पत्नी का विरोध: पत्नी ने इसे निजता के अधिकार (Right to Privacy) का उल्लंघन बताते हुए हाईकोर्ट में चुनौती दी। उसका तर्क था कि पति ने धोखे से या फोन हैक करके ये जानकारियां हासिल की हैं।

हाईकोर्ट का रुख: अदालत ने कहा कि निजता का अधिकार मौलिक है, लेकिन यह निरपेक्ष (Absolute) नहीं है। जब मामला न्याय प्रशासन और निष्पक्ष सुनवाई का हो, तो प्राइवेसी को न्याय के हित के अधीन रखा जा सकता है।

2. फैसले की 3 बड़ी बातें (Key Highlights of the Order)

अदालत ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि फैमिली कोर्ट के पास व्यापक शक्तियां हैं:

सच्चाई सर्वोपरि: फैमिली कोर्ट का उद्देश्य विवाद का समाधान करना है। यदि कोई सामग्री (चैट या रिकॉर्डिंग) विवाद को सुलझाने में सहायक है, तो उसे स्वीकार किया जाना चाहिए।

प्राइवेसी बनाम न्याय: हाईकोर्ट ने कहा कि "फेयर ट्रायल" का अधिकार भी अनुच्छेद 21 का हिस्सा है। निजता के नाम पर प्रासंगिक सबूतों को रोकना न्याय प्रक्रिया के उद्देश्य को विफल कर सकता है।

सेक्शन 14 (Family Courts Act): फैमिली कोर्ट एक्ट की धारा 14 अदालत को यह शक्ति देती है कि वह किसी भी साक्ष्य को स्वीकार कर ले जो उसे मामले के निपटारे के लिए आवश्यक लगे।

3. सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसले का असर

यह फैसला सुप्रीम कोर्ट के 'विभोर गर्ग बनाम नेहा' मामले में दिए गए हालिया आदेश के अनुरूप है, जिसमें शीर्ष अदालत ने भी कहा था कि पति-पत्नी के बीच की गुप्त रिकॉर्डिंग को तलाक के मामलों में साक्ष्य माना जा सकता है।

डिजिटल सबूतों की स्वीकार्यता के नियम:

भले ही कोर्ट ने अनुमति दे दी है, लेकिन इन सबूतों को पेश करने के लिए कुछ शर्तें पूरी करनी होती हैं:

सत्यता (Authenticity): सबूतों के साथ छेड़छाड़ (Tampering) नहीं होनी चाहिए।

प्रमाण पत्र: भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 65B के तहत इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड का सर्टिफिकेट अनिवार्य है।

प्रासंगिकता (Relevance): चैट या रिकॉर्डिंग का सीधा संबंध विवाद के बिंदुओं से होना चाहिए।