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March 14 2026 11:40 pm

CEC Impeachment: क्या ज्ञानेश कुमार को हटा पाएगा विपक्ष? जानें मुख्य चुनाव आयुक्त को पद से हटाने की कठिन प्रक्रिया

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News India Live, Digital Desk: भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की शक्ति केवल संसद के पास है। संविधान के अनुच्छेद 324(5) के अनुसार, CEC को उसी रीति और उन्हीं आधारों पर हटाया जा सकता है, जैसे सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश को। इसे सामान्य बोलचाल में 'महाभियोग' (Impeachment) कहा जाता है, हालांकि संविधान में यह शब्द केवल राष्ट्रपति के लिए उपयोग हुआ है।

हटाने की स्टेप-बाय-स्टेप प्रक्रिया (Constitutional Process)

चरण 1: प्रस्ताव की शुरुआत (Initiation of Motion)

लोकसभा: कम से कम 100 सांसदों के हस्ताक्षर जरूरी।

राज्यसभा: कम से कम 50 सांसदों के हस्ताक्षर जरूरी।

विपक्ष ने 13 मार्च 2026 को लोकसभा में 130 और राज्यसभा में 63 सांसदों के हस्ताक्षरित नोटिस सचिवों को सौंप दिए हैं।

चरण 2: पीठासीन अधिकारी का निर्णय

लोकसभा अध्यक्ष (Speaker) या राज्यसभा सभापति प्रस्ताव को स्वीकार या अस्वीकार कर सकते हैं। वर्तमान में विपक्ष ने स्पीकर ओम बिरला के खिलाफ भी अविश्वास प्रस्ताव की तैयारी की है।

चरण 3: जांच समिति का गठन

प्रस्ताव स्वीकार होने पर 3 सदस्यीय समिति बनती है, जिसमें:

सुप्रीम कोर्ट के एक न्यायाधीश।

किसी हाई कोर्ट के एक मुख्य न्यायाधीश।

एक प्रतिष्ठित कानूनविद् (Jurist) शामिल होते हैं।

चरण 4: संसद में मतदान (Special Majority)

यदि समिति दोषी पाती है, तो संसद के दोनों सदनों में विशेष बहुमत से मतदान होता है:

सदन की कुल सदस्यता का बहुमत।

उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों का दो-तिहाई (2/3) बहुमत

चरण 5: राष्ट्रपति की मंजूरी

दोनों सदनों से पास होने के बाद, फाइल राष्ट्रपति के पास जाती है और उनके हस्ताक्षर के बाद ही CEC को पद से हटाया जाता है।

विपक्ष की तैयारी और 7 बड़े आरोप (Opposition's Preparation)

TMC (तृणमूल कांग्रेस) के नेतृत्व में INDIA गठबंधन ने ज्ञानेश कुमार के खिलाफ 7 मुख्य आरोप लगाए हैं:

पक्षपातपूर्ण आचरण: आयोग पर सरकार के इशारे पर काम करने का आरोप।

वोटर लिस्ट में धांधली: बंगाल और बिहार में 'स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन' के दौरान लाखों वैध वोटर्स के नाम हटाने का दावा।

भेदभावपूर्ण व्यवहार: विपक्षी दलों की शिकायतों पर कार्रवाई न करना।

संवैधानिक मर्यादा का उल्लंघन: चुनाव आयोग की निष्पक्षता को नुकसान पहुँचाना।

डेटा पारदर्शिता की कमी: चुनावी डेटा साझा करने में देरी या अनियमितता।

माइक्रो-ऑब्जर्वर्स की तैनाती: चुनिंदा क्षेत्रों में पक्षपातपूर्ण तरीके से पर्यवेक्षकों की नियुक्ति।

नियुक्ति प्रक्रिया पर सवाल: चयन समिति में CJI को शामिल न करने का विरोध।

इतिहास में पहली बार (A Historical Move)

भारत के संसदीय इतिहास में यह पहली बार है जब किसी सेवारत मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने के लिए औपचारिक रूप से संसद में नोटिस दिया गया है। इससे पहले टी.एन. शेषन (1991) और नवीन चावला (2006) के खिलाफ राजनीतिक विरोध हुआ था, लेकिन मामला औपचारिक नोटिस तक नहीं पहुँचा था।