भारतीय ट्रेनों में अब भी ज़िंदा है जातिवाद? संसदीय समिति की रेलवे को कड़ी फटकार, उजागर की चौंकाने वाली हकीकत

Post

News India Live, Digital Desk: क्या 21वीं सदी के भारत में भी ट्रेनों के भीतर जाति के आधार पर भेदभाव हो रहा है? एक संसदीय समिति की हालिया रिपोर्ट ने इस कड़वे सच को सामने रखकर रेल मंत्रालय में हड़कंप मचा दिया है। समिति ने रेलवे के कामकाज और कर्मचारियों के बीच व्याप्त 'जातिवादी मानसिकता' की तीखी आलोचना की है।

संसदीय समिति ने क्यों उठाए सवाल?

संसदीय समिति (Parliamentary Committee) ने अपनी रिपोर्ट में स्पष्ट किया कि रेलवे में अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) के कर्मचारियों के साथ पदोन्नति, पोस्टिंग और दैनिक व्यवहार में भेदभाव के मामले सामने आए हैं। समिति की नाराजगी के मुख्य बिंदु निम्नलिखित हैं:

पदोन्नति में बाधा: रिपोर्ट के अनुसार, सुरक्षित श्रेणियों (Reserved Categories) के कई योग्य कर्मचारियों को जानबूझकर उच्च पदों से वंचित रखा जा रहा है।

शिकायत निवारण में देरी: एससी/एसटी कर्मचारियों द्वारा दर्ज की गई शिकायतों का निपटारा तय समय सीमा के भीतर नहीं किया जा रहा है, जिससे उनमें असुरक्षा की भावना बढ़ रही है।

जातिगत भेदभाव का व्यवहार: समिति ने पाया कि कुछ कार्यस्थलों और ट्रेनों के संचालन से जुड़े विभागों में कर्मचारियों के बीच जातिगत आधार पर दूरियां देखी गई हैं।

रेलवे की तीखी आलोचना और निर्देश

समिति ने रेलवे बोर्ड को चेतावनी देते हुए कहा है कि "जातिवाद" जैसे सामाजिक अभिशाप के लिए आधुनिक भारतीय रेलवे में कोई जगह नहीं होनी चाहिए। समिति ने रेलवे को निम्नलिखित कड़े निर्देश दिए हैं:

बैकलॉग पदों को भरना: एससी/एसटी कोटे के खाली पड़े पदों को प्राथमिकता के आधार पर जल्द से जल्द भरा जाए।

सेंसिटाइजेशन प्रोग्राम: रेलवे अधिकारियों और कर्मचारियों के लिए विशेष कार्यशालाएं आयोजित की जाएं ताकि उनकी मानसिकता में बदलाव लाया जा सके।

जवाबदेही तय करना: भेदभाव के दोषी पाए जाने वाले अधिकारियों के खिलाफ सख्त अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाए।

आम यात्रियों और सिस्टम पर असर

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि कर्मचारियों के बीच इस तरह का भेदभाव बना रहा, तो इसका सीधा असर रेलवे की कार्यक्षमता और यात्री सेवाओं पर भी पड़ सकता है। एक समावेशी संगठन ही बेहतर सेवा प्रदान कर सकता है।