करियर शानदार और नौकरियां भी पक्की, फिर क्यों खाली रह जाती हैं D.Pharma आयुर्वेद की सीटें? जानिये असल वजह
News India Live, Digital Desk : आज के दौर में जब हर कोई सरकारी नौकरी या अच्छे पैकेज के पीछे भाग रहा है, ऐसे में एक हैरान कर देने वाली बात सामने आ रही है। दुनिया भर में जहाँ आयुर्वेद और नैचुरोपैथी का डंका बज रहा है, वहीं भारत में 'डी.फार्मा आयुर्वेद' (D.Pharma Ayurveda) जैसे कोर्सेज की सीटें कई राज्यों में खाली पड़ी रह जाती हैं। कई कॉलेजों में तो हाल ऐसा है कि आधी सीटें भरना भी मुश्किल हो जाता है।
अब बड़ा सवाल ये उठता है कि जब आयुर्वेद सेक्टर इतना फल-फूल रहा है, तो आखिर नौजवान इस कोर्स से दूर क्यों भाग रहे हैं? क्या इसमें वाकई स्कोप कम है या फिर हम किसी बड़ी जानकारी से महरूम हैं?
कहाँ फंस रहा है पेच?
विशेषज्ञों की मानें तो इस समस्या की सबसे बड़ी वजह 'जानकारी की कमी' (Lack of Awareness) है। ज़्यादातर छात्र और पेरेंट्स केवल एलोपैथी यानी अंग्रेजी दवाओं वाले डी.फार्मा को ही जानते हैं। उन्हें लगता है कि करियर सिर्फ मेडिकल स्टोर खोलने या अस्पताल में दवा देने तक सीमित है। वहीं, आयुर्वेद फार्मेसी को लेकर समाज में आज भी यह धारणा बनी हुई है कि इसमें नौकरी के अवसर सीमित हैं।
सिर्फ चूर्ण-चटनी तक सीमित नहीं है ये करियर
सच तो ये है कि पतंजलि, डाबर, हिमालय, और हमदर्द जैसी बड़ी कंपनियां आज ग्लोबली काम कर रही हैं। यहाँ फार्मासिस्ट, प्रोडक्शन मैनेजर और रिसर्च असिस्टेंट जैसे पदों पर अच्छी खासी सैलरी मिलती है। सिर्फ इतना ही नहीं, सरकार अब हर पीएचसी (PHC) और वेलनेस सेंटर्स पर आयुर्वेद दवाओं की उपलब्धता बढ़ा रही है, जिसका मतलब है कि सरकारी क्षेत्र में भी डी.फार्मा आयुर्वेद वालों के लिए काफी पद सृजित हो रहे हैं।
छात्रों का मोहभंग क्यों?
- काउंसलिंग और प्रक्रिया में देरी: अक्सर आयुर्वेद कोर्सेज की काउंसलिंग रेगुलर कोर्सेज के बहुत बाद शुरू होती है। तब तक छात्र या तो कहीं और एडमिशन ले चुके होते हैं या साल बचाने के चक्कर में दूसरा कोर्स चुन लेते हैं।
- गलतफहमियाँ: बहुत से लोगों को लगता है कि आयुर्वेदिक दवा बनाने के लिए कोई पढ़ाई नहीं चाहिए, जबकि ये भी उतना ही वैज्ञानिक और टेक्निकल कोर्स है जितना कोई और फार्मेसी कोर्स।
- कम मार्केटिंग: मेडिकल कोर्सेज के विज्ञापन अक्सर एलोपैथी पर फोकस रहते हैं, जिसके कारण ग्रामीण इलाकों के बच्चों तक आयुर्वेद फार्मेसी की पहुंच कम हो जाती है।
आगे की राह क्या है?
अगर आप कम भीड़ वाले ऐसे कोर्स की तलाश में हैं जहाँ भविष्य सुरक्षित हो और अपना खुद का बिज़नेस शुरू करने की संभावना भी हो, तो डी.फार्मा आयुर्वेद एक बढ़िया विकल्प हो सकता है। सरकार अब इस कोर्स के प्रति छात्रों को जागरूक करने के लिए नई नीतियां बना रही है। अगर वक्त रहते छात्र इसके फायदों को समझें, तो खाली पड़ी ये सीटें उनके लिए एक बेहतरीन करियर का जरिया बन सकती हैं।
तो अगली बार एडमिशन के समय सिर्फ़ भीड़ को मत देखिये, उस जगह को भी देखिये जहाँ स्कोप ज्यादा है लेकिन शोर कम।