दिसंबर में RBI फिर बढ़ा सकता है ब्याज दरें: रेपो रेट 6% तक पहुंचने का अनुमान, SBI रिसर्च की रिपोर्ट में बड़ा दावा

दिसंबर में RBI फिर बढ़ा सकता है ब्याज दरें: रेपो रेट 6% तक पहुंचने का अनुमान, SBI रिसर्च की रिपोर्ट में बड़ा दावा

देश में खाद्य वस्तुओं की कीमतों में अस्थिरता और वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताओं के बीच भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की मौद्रिक नीति समिति (MPC) की आगामी बैठकों को लेकर वित्तीय गलियारों में हलचल तेज हो गई है। देश के सबसे बड़े वाणिज्यिक बैंक की शोध इकाई, स्टेट बैंक ऑफ इंडिया रिसर्च (SBI Research) ने अपनी नवीनतम रिपोर्ट 'इकोरैप' (Ecowrap) में एक बड़ा अनुमान जाहिर किया है। रिपोर्ट के मुताबिक, खुदरा मुद्रास्फीति (CPI Inflation) को केंद्रीय बैंक के तय लक्ष्य के दायरे में मजबूती से बनाए रखने और वैश्विक केंद्रीय बैंकों की सख्त नीतियों के साथ तालमेल बैठाने के लिए आरबीआई आगामी दिसंबर 2026 की समीक्षा बैठक में पॉलिसी रेपो रेट में एक बार फिर बढ़ोतरी कर सकता है। अर्थशास्त्रियों का मानना है कि यदि यह वृद्धि लागू होती है, तो नीतिगत रेपो रेट बढ़कर 6.00% के स्तर तक पहुंच सकती है, जिसका सीधा असर देश के बैंकिंग सिस्टम, उधारी लागत और आम जनता की मासिक लोन किस्तों पर पड़ेगा।

वैश्विक परिस्थितियां और खाद्य महंगाई बनी दरों में बढ़ोतरी की मुख्य वजह

एसबीआई इकोरैप की रिपोर्ट में यह स्पष्ट रेखांकित किया गया है कि घरेलू स्तर पर आर्थिक विकास दर (GDP Growth) की रफ्तार मजबूत बनी हुई है, लेकिन मुख्य चुनौती कोर और खाद्य महंगाई के मोर्चे पर है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव, भू-राजनीतिक तनाव और आपूर्ति श्रृंखला में आने वाले व्यवधानों के चलते इनपुट लागत में दबाव बना हुआ है। इसके अलावा, अमेरिकी फेडरल रिजर्व और यूरोपीय सेंट्रल बैंक द्वारा लंबे समय तक ब्याज दरों को उच्च स्तर पर बनाए रखने की नीतियों के कारण विदेशी संस्थागत निवेशकों के पूंजी प्रवाह और भारतीय रुपये की विनिमय दर पर भी असर पड़ता है। एसबीआई रिसर्च के प्रमुख आर्थिक सलाहकारों का तर्क है कि घरेलू मांग को झटका दिए बिना मुद्रास्फीति की उम्मीदों को काबू में रखने के लिए केंद्रीय बैंक के पास दरों में 25 से 35 बेसिस प्वाइंट्स की एक और 'प्री-एम्प्टिव' यानी एहतियाती बढ़ोतरी करने का पर्याप्त आधार मौजूद है।

रेपो रेट 6% होने पर होम लोन, कार लोन और पर्सनल लोन की EMI पर क्या पड़ेगा असर?

यदि दिसंबर की मौद्रिक समीक्षा में आरबीआई रेपो दर को बढ़ाकर 6.00% करता है, तो इसका सबसे त्वरित और सीधा असर खुदरा कर्जदारों पर देखने को मिलेगा। भारतीय रिजर्व बैंक के अनिवार्य नियमों के तहत 1 अक्टूबर 2019 के बाद जारी किए गए सभी फ्लोटिंग रेट वाले रिटेल लोन्स एक्सटर्नल बेंचमार्क लेंडिंग रेट (EBLR/RLLR) से जुड़े होते हैं। रेपो रेट में 25 बेसिस प्वाइंट्स की वृद्धि होते ही वाणिज्यिक बैंकों का लेंडिंग रेट भी स्वतः 0.25% बढ़ जाएगा। उदाहरण के तौर पर, यदि किसी ग्राहक का 20 वर्ष की अवधि के लिए ₹30 लाख का होम लोन वर्तमान में 8.50% की दर पर चल रहा है और उसकी ईएमआई लगभग ₹26,035 है, तो दर बढ़कर 8.75% होने पर मासिक ईएमआई बढ़कर करीब ₹26,511 हो जाएगी। यानी हर महीने लगभग ₹476 का अतिरिक्त भुगतान करना होगा, जो पूरे 20 साल के कार्यकाल में लाखों रुपये के अतिरिक्त कुल ब्याज के रूप में जुड़ेगा।

बैंकों की मार्जिनल कॉस्ट (MCLR) बढ़ेगी और फिक्स्ड डिपॉजिट निवेशकों को होगा फायदा

रेपो रेट में संभावित वृद्धि का केवल कर्जदारों पर ही असर नहीं होगा, बल्कि यह बैंकों की देनदारियों और परिसंपत्तियों दोनों के ढांचे को प्रभावित करेगा। जब नीतिगत दरें बढ़ती हैं, तो बैंकों की मार्जिनल कॉस्ट ऑफ फंड्स बेस्ड लेंडिंग रेट (MCLR) भी बढ़ जाती है, जिससे पुराने एमसीएलआर से जुड़े कॉरपोरेट और ऑटो लोन महंगे हो जाते हैं। दूसरी ओर, इस फैसले का एक सकारात्मक पहलू आम बचतकर्ताओं और विशेष रूप से वरिष्ठ नागरिकों के लिए सामने आता है। कर्ज महंगा होने के साथ-साथ कमर्शियल बैंकों को अपनी ऋण वृद्धि की जरूरतों को पूरा करने के लिए बाजार से डिपॉजिट जुटाना पड़ता है। इसके चलते बैंक अपनी सावधि जमा योजनाओं यानी फिक्स्ड डिपॉजिट (FD) की ब्याज दरों में भी बढ़ोतरी करेंगे, जिससे 1 से 3 वर्ष की एफडी पर 7.5% से लेकर 8.25% तक का आकर्षक सुरक्षित रिटर्न मिलने का रास्ता साफ होगा।

कर्जदारों को अभी से क्या वित्तीय रणनीति अपनानी चाहिए?

ब्याज दरों में संभावित वृद्धि के इस माहौल में वित्तीय सलाहकारों का कहना है कि मौजूदा कर्जदारों को पहले से ही अपनी व्यक्तिगत वित्तीय योजना की समीक्षा शुरू कर देनी चाहिए। यदि आपके पास कोई सरप्लस फंड, बचत या वार्षिक बोनस उपलब्ध है, तो अपने लोन खाते में आंशिक प्रीपेमेंट (Partial Prepayment) करने पर विचार करें, क्योंकि मूलधन में थोड़ी सी भी कमी होने से बढ़ी हुई ब्याज दर का प्रभाव आपकी मासिक ईएमआई या लोन की अवधि पर कम हो जाता है। इसके अलावा, जिन ग्राहकों के लोन अभी भी पुरानी बेस रेट या एमसीएलआर व्यवस्था में चल रहे हैं, उन्हें अपने बैंक से संपर्क करके न्यूनतम शुल्क पर अपने लोन को मौजूदा एक्सटर्नल बेंचमार्क (EBLR) में स्विच करा लेना चाहिए ताकि पारदर्शिता बनी रहे। आगामी दिसंबर बैठक के फैसलों पर नजर रखते हुए गैर-जरूरी पर्सनल लोन या अनसिक्योर्ड क्रेडिट कार्ड लोन लेने से बचना ही समझदारी होगी।