त्योहारों में भी ठंडा पड़ा प्रॉपर्टी बाजार: सस्ते घरों का अकाल और महंगे फ्लैट्स की भरमार ने कैसे बिगाड़ा मिडिल क्लास का सेंटिमेंट?

त्योहारों में भी ठंडा पड़ा प्रॉपर्टी बाजार: सस्ते घरों का अकाल और महंगे फ्लैट्स की भरमार ने कैसे बिगाड़ा मिडिल क्लास का सेंटिमेंट?

नवरात्रि, दशहरा और दीपावली का यह दौर भारतीय संस्कृति में शुभ खरीदारी और गृह प्रवेश के लिए सबसे पवित्र माना जाता है। अमूमन इस फेस्टिव सीजन में रियल एस्टेट सेक्टर में बूम देखने को मिलता था, जहां बिल्डर्स आकर्षक डिस्काउंट, मुफ्त पार्किंग, मॉड्यूलर किचन या सोने के सिक्कों जैसे ऑफर्स की झड़ी लगाकर नए प्रोजेक्ट्स बेचते थे। लेकिन इस बार का त्योहारी सीजन डेवलपर्स के चेहरे पर वह पुरानी मुस्कान नहीं ला सका है। लखनऊ, दिल्ली-एनसीआर, मुंबई, पुणे और बेंगलुरु जैसे प्रमुख शहरों के प्रॉपर्टी बाजारों में साइट विजिट्स की संख्या तो दिख रही है, लेकिन वे वास्तविक सौदों (Bookings) में तब्दील नहीं हो पा रही हैं। आम मध्यवर्गीय खरीदार बाजार से नदारद नजर आ रहा है, जिससे त्योहारी माहौल में भी हाउसिंग सेक्टर का ओवरऑल सेंटिमेंट ठंडा पड़ा हुआ है।

इस सुस्ती की सबसे बड़ी जड़ मांग और आपूर्ति के बीच बना गंभीर असंतुलन है। पिछले कुछ वर्षों में देश के बड़े शहरों में जमीनों के दाम आसमान छू गए हैं और निर्माण सामग्री (सीमेंट, सरिया, लेबर) की लागत में भारी वृद्धि हुई है। इसके चलते अधिकांश बिल्डर्स और कॉरपोरेट डेवलपर्स ने 40 से 60 लाख रुपये के किफायती सेगमेंट (Affordable & Mid-Income Housing) से पूरी तरह किनारा कर लिया है। डेवलपर्स का पूरा फोकस अब डेढ़ करोड़ से पांच करोड़ रुपये के प्रीमियम, 3BHK-4BHK और अल्ट्रा-लक्जरी फ्लैट्स पर शिफ्ट हो चुका है। नतीजा यह हुआ कि 60 से 70 प्रतिशत मध्यमवर्गीय परिवार, जो अपनी बचत और होम लोन के सहारे एक अदद आशियाने का सपना देख रहे थे, वे बाजार की इस बेतहाशा महंगाई के आगे खुद को पूरी तरह असहाय महसूस कर रहे हैं।

अफोर्डेबल हाउसिंग का गायब होना: बजट से बाहर हुए आम आदमी के घर

भारतीय रियल एस्टेट बाजार की रीढ़ हमेशा से मिडिल क्लास और पहली बार घर खरीदने वाले (First-Time Home Buyers) रहे हैं। पहले 40 से 50 लाख रुपये के दायरे में लखनऊ के शहीद पथ, किसान पथ, गोमती नगर विस्तार अथवा दिल्ली-एनसीआर के ग्रेटर नोएडा और राज नगर एक्सटेंशन में अच्छे 2BHK फ्लैट्स आसानी से मिल जाते थे। लेकिन पिछले दो-तीन सालों में जिस आक्रामक गति से जमीन की कीमतें बढ़ी हैं, उसने इस बजट को पूरी तरह ध्वस्त कर दिया है।

प्रॉपर्टी कंसल्टेंट्स के अनुसार, आज प्रमुख शहरों में 60 लाख से नीचे कोई नया और गुणवत्तापूर्ण प्रोजेक्ट लॉन्च ही नहीं हो रहा है। डेवलपर्स का कहना है कि उच्च भूमि लागत, विकास प्राधिकरणों के कड़े शुल्क और इनपुट कॉस्ट के चलते 3,500 से 4,500 रुपये प्रति वर्ग फीट की दर पर प्रोजेक्ट बनाना अब आर्थिक रूप से व्यावहारिक (Financially Viable) नहीं रहा। जब बाजार में उस बजट के घर ही उपलब्ध नहीं हैं जो आम नौकरीपेशा परिवार की पहुंच में हों, तो स्वाभाविक रूप से त्योहारी सीजन की लिवाली ठंडी पड़नी ही थी।

लक्जरी और प्रीमियम की ओवर-सप्लाई: क्या सिर्फ अमीर ही खरीदेंगे फ्लैट?

बाजार का दूसरा बड़ा विरोधाभास यह है कि डेवलपर्स ने लक्जरी और प्रीमियम सेगमेंट में भारी पूंजी झोंक दी है। क्लब हाउस, इन्फिनिटी पूल, प्राइवेट लिफ्ट, स्मार्ट होम ऑटोमेशन और गोल्फ व्यू जैसी अत्याधुनिक सुविधाओं के नाम पर 1.5 करोड़ से 4 करोड़ रुपये तक के प्रोजेक्ट्स की झड़ी लगा दी गई है। हालांकि, देश में हाई-नेट-वर्थ इंडिविजुअल्स (HNIs) और अपर-मिडिल क्लास की एक निश्चित संख्या है, लेकिन वह पूरा बाजार नहीं चला सकती।

शुरुआती दौर में लक्जरी प्रोजेक्ट्स में निवेशकों ने तेजी से पैसा लगाया, लेकिन अब इन महंगे फ्लैट्स का बाजार भी धीरे-धीरे 'सैचुरेशन' (संतृप्ति) की तरफ बढ़ रहा है। अमीर तबके के पास पहले से कई संपत्तियां मौजूद हैं और वे केवल रेंटल यील्ड या कैपिटल एप्रिसिएशन के लिए सीमित निवेश कर रहे हैं। वास्तविक एंड-यूजर (End-User) जो खुद रहने के लिए घर तलाश रहा है, वह इतनी बड़ी रकम चुकाने में असमर्थ है। इस वजह से प्रीमियम सेगमेंट में भी नई बुकिंग्स की गति धीमी पड़ गई है।

महंगी ईएमआई और आय वृद्धि की सुस्त रफ्तार ने रोके हाथ

प्रॉपर्टी की बढ़ी हुई कीमतों के साथ-साथ होम लोन की ब्याज दरें भी खरीदारों के उत्साह पर पानी फेर रही हैं। पिछले कुछ तिमाहियों से रेपो रेट और बैंकों की उधारी दरें ऊंचे स्तर पर बनी हुई हैं। एक औसत खरीदार जो 40 लाख रुपये का होम लोन 8.5% से 9% की दर पर 20 साल के लिए लेता है, उसकी मासिक ईएमआई सीधे तौर पर 35,000 से 40,000 रुपये के आसपास पहुंच जाती है।

इसके विपरीत, निजी क्षेत्र में काम करने वाले कर्मचारियों की वेतन वृद्धि (Salary Increments) महंगाई की तुलना में उस अनुपात में नहीं बढ़ी है। जब परिवार के कुल घरेलू बजट का 40 से 50 प्रतिशत हिस्सा केवल लोन की ईएमआई में जाने का जोखिम हो, तो लोग जीवन की सबसे बड़ी पूंजी लगाने से पहले कई बार सोचने लगते हैं। किराए के मकान में रहना आज कई लोगों को 1 करोड़ रुपये का फ्लैट खरीदकर भारी ईएमआई और मेंटेनेंस चार्ज भरने की तुलना में आर्थिक रूप से अधिक व्यावहारिक और सुरक्षित विकल्प नजर आ रहा है।

हिडन चार्ज और अंडर-कंस्ट्रक्शन प्रोजेक्ट्स पर कम होता भरोसा

त्योहारी सीजन में खरीदारों के ठिठकने का एक और कारण प्रॉपर्टी की अंतिम कीमत (Total Cost of Ownership) में छुपे हुए खर्चे हैं। बिल्डर्स विज्ञापन में जिस बेसिक सेलिंग प्राइस (BSP) का प्रचार करते हैं, अंतिम पजेशन तक पहुंचते-पहुंचते उसमें जीएसटी (GST), स्टाम्प ड्यूटी, रजिस्ट्री शुल्क, एक्सटर्नल डेवलपमेंट चार्ज (EDC), इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट चार्ज (IDC), क्लब मेंबरशिप और एडवांस मेंटेनेंस जुड़कर कुल लागत को 20 से 25 प्रतिशत तक और बढ़ा देते हैं।

इसके अलावा, रेरा (RERA) के कड़े नियमों के बावजूद आम खरीदारों में अभी भी समय पर पजेशन न मिलने का डर बना हुआ है। पिछले कई सालों में प्रोजेक्ट्स में हुई देरी के कड़वे अनुभवों ने लोगों को अंडर-कंस्ट्रक्शन प्रोजेक्ट्स में जोखिम लेने से डरा दिया है। खरीदार रेडी-टू-मूव (Ready-to-Move) संपत्तियां चाहते हैं, लेकिन उनकी कीमतें इतनी अधिक हैं कि आम आदमी का बजट डगमगा जाता है। यह अनिश्चितता त्योहारों में भी लोगों को टोकन मनी जमा करने से रोक रही है।

बाजार को दोबारा गति देने के लिए क्या हैं समाधान?

रियल एस्टेट सेक्टर देश की अर्थव्यवस्था और रोजगार सृजन का एक अत्यंत महत्वपूर्ण स्तंभ है। यदि इस बाजार में लंबे समय तक सुस्ती बनी रही, तो इसका असर सीमेंट, स्टील, पेंट और इंटीरियर जैसे दर्जनों सहायक उद्योगों पर भी पड़ेगा। बाजार के जानकारों का मानना है कि सेक्टर को दोबारा गति देने के लिए डेवलपर्स और नीति निर्माताओं दोनों को मिलकर कदम उठाने होंगे।

सबसे पहले, डेवलपर्स को अपनी स्ट्रेटेजी में बदलाव कर 'वॉल्यूम-बेस्ड' अफोर्डेबल और सब-प्रीमियम मॉडल्स की तरफ लौटना होगा, जहां छोटे आकार के मगर सुव्यवस्थित 2BHK फ्लैट्स 45 से 60 लाख के दायरे में पेश किए जाएं। वहीं, सरकारों को भी स्टांप ड्यूटी में अस्थायी छूट, अफोर्डेबल हाउसिंग पर टैक्स इन्सेंटिव्स और होम लोन ब्याज पर अतिरिक्त आयकर छूट जैसे कदम उठाने चाहिए ताकि त्योहारी सीजन के बाद भी मध्यमवर्गीय खरीदार का भरोसा दोबारा बहाल हो सके।