BREAKING:
April 13 2026 12:59 am

मुरादाबाद फतह करने को बेताब भाजपा 1980 से अब तक के इतिहास को पलटने की तैयारी

Post

News India Live, Digital Desk: उत्तर प्रदेश की सियासत में 'पीतल नगरी' के नाम से मशहूर मुरादाबाद की सीट इस समय भाजपा के लिए प्रतिष्ठा का प्रश्न बन गई है। साल 1980 में जिले के गठन के बाद से लेकर अब तक के चुनावी इतिहास को देखें, तो भाजपा यहां वह करिश्मा दोहराने को बेताब है जो उसने 2017 के विधानसभा चुनावों में प्रदेश भर में किया था। रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण इस सीट पर जीत दर्ज करने के लिए भगवा खेमे ने अभी से घेराबंदी शुरू कर दी है। पार्टी का लक्ष्य न केवल जीत हासिल करना है, बल्कि विरोधियों के उस अभेद्य किले को ढहाना है जो दशकों से भाजपा की राह में रोड़ा बना हुआ है।

1980 के बाद से सियासी समीकरणों का खेल

मुरादाबाद सीट का इतिहास काफी दिलचस्प रहा है। 1980 के दशक के बाद से इस क्षेत्र की राजनीति में कई उतार-चढ़ाव आए। कभी समाजवादियों का गढ़ रही यह सीट तो कभी कांग्रेस का हाथ थामने वाली जनता, भाजपा के लिए हमेशा से एक बड़ी चुनौती पेश करती रही है। आंकड़ों के आईने में देखें तो भाजपा ने यहां कई बार बढ़त बनाने की कोशिश की, लेकिन गठबंधन की राजनीति और स्थानीय समीकरणों ने उसे सत्ता के शिखर से दूर रखा। अब भाजपा आलाकमान ने यहां 'मिशन मुरादाबाद' के तहत नए चेहरों और जमीनी फीडबैक के आधार पर काम करना शुरू कर दिया है।

2017 जैसा प्रदर्शन दोहराने की चुनौती

भाजपा के रणनीतिकारों का मानना है कि अगर पार्टी को पश्चिमी उत्तर प्रदेश में अपना दबदबा कायम रखना है, तो मुरादाबाद की जीत अनिवार्य है। 2017 के चुनाव में जिस तरह पार्टी ने रिकॉर्ड तोड़ प्रदर्शन किया था, उसी तर्ज पर इस बार भी बूथ स्तर पर कार्यकर्ताओं को सक्रिय किया जा रहा है। पार्टी सूत्रों का कहना है कि विकास के दावों और केंद्र-राज्य सरकार की योजनाओं के लाभार्थियों (लाभार्थी वर्ग) के दम पर इस बार इतिहास बदलने की तैयारी है। पार्टी इस बार किसी भी तरह की गुटबाजी से बचकर एकजुट होकर मैदान में उतरने का मन बना चुकी है।

विपक्षी खेमे में हलचल, जातीय गणित साधने की कोशिश

भाजपा की इस आक्रामक तैयारी ने विपक्षी दलों की नींद उड़ा दी है। मुरादाबाद में मुस्लिम और दलित मतदाताओं की बड़ी संख्या को देखते हुए विपक्ष अपनी पुरानी जमीन बचाने की जुगत में है। हालांकि, भाजपा इस बार 'सबका साथ-सबका विकास' के नारे के साथ उन क्षेत्रों में भी सेंध लगाने की कोशिश कर रही है, जिन्हें कभी विपक्ष का सुरक्षित वोट बैंक माना जाता था। जानकारों की मानें तो पीतल नगरी की यह सियासी जंग इस बार काफी दिलचस्प होने वाली है, क्योंकि भाजपा ने 1980 से अब तक के अपने सूखे को खत्म करने के लिए पूरी ताकत झोंक दी है।