Bihar Politics : जब नीतीश कुमार सिर्फ 7 दिन के लिए बने थे मुख्यमंत्री, जानिए 24 साल पुराना वो मशहूर सियासी किस्सा
News India Live, Digital Desk: आज की तारीख में नीतीश कुमार का बार-बार मुख्यमंत्री पद की शपथ लेना एक आम राजनीतिक चर्चा का विषय है, लेकिन क्या आप जानते हैं कि एक वक्त ऐसा भी था जब वह मुख्यमंत्री तो बने, पर उनकी सरकार सिर्फ 7 दिन ही चल पाई थी? यह किस्सा है साल 2000 का, जब बिहार की राजनीति एक ऐसे रोमांचक मोड़ पर खड़ी थी, जहां कुर्सी का खेल हर घंटे बदल रहा था।
यह वो दौर था जब बिहार, झारखंड से अलग नहीं हुआ था और लालू प्रसाद यादव की पार्टी आरजेडी का दबदबा था।
जब चुनाव नतीजों ने उलझा दिया पूरा खेल
साल 2000 में बिहार विधानसभा के चुनाव हुए। नतीजे आए तो किसी भी पार्टी या गठबंधन को सरकार बनाने के लिए ज़रूरी 163 सीटों का जादुई आंकड़ा नहीं मिला। लालू यादव की आरजेडी 124 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनकर तो उभरी, लेकिन बहुमत से दूर रह गई। दूसरी तरफ, नीतीश कुमार की समता पार्टी और बीजेपी के एनडीए गठबंधन के पास भी सरकार बनाने लायक विधायक नहीं थे।
ऐसे में सबकी नजरें राजभवन पर टिक गईं कि आखिर तत्कालीन राज्यपाल विनोद चंद्र पांडे सरकार बनाने के लिए किसे बुलाते हैं।
नीतीश ने चला दांव, पर खेल हो गया उल्टा
तमाम अटकलों के बीच, राज्यपाल ने सबसे बड़ी पार्टी आरजेडी को नजरअंदाज करते हुए एनडीए के नेता नीतीश कुमार को सरकार बनाने का न्योता दे दिया। 3 मार्च, 2000 को नीतीश कुमार ने अपनी जिंदगी में पहली बार बिहार के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। लेकिन यह ताज कांटों भरा था। राज्यपाल ने उन्हें 7 दिनों के अंदर विधानसभा में अपना बहुमत साबित करने को कहा।
यहीं से शुरू हुआ असली सियासी ड्रामा। नीतीश कुमार और एनडीए के बड़े नेता बहुमत के लिए जरूरी विधायकों को अपने पाले में लाने के लिए दिन-रात एक किए हुए थे, लेकिन लालू प्रसाद यादव का राजनीतिक मैनेजमेंट उन पर भारी पड़ रहा था। एक-एक विधायक कीमती था और हर कोई अपनी तरफ खींचने में लगा था।
जैसे-जैसे 7 दिन की मियाद खत्म होने को आई, नीतीश कुमार को यह अहसास हो गया कि वे जादुई आंकड़े तक नहीं पहुंच पाएंगे। अंत में, फ्लोर टेस्ट का सामना करने और वहां हारने की किरकिरी से बचने के लिए, नीतीश कुमार ने 10 मार्च, 2000 को, यानी शपथ लेने के ठीक सातवें दिन, अपने पद से इस्तीफा दे दिया।
उनकी पहली सरकार बिना कोई काम किए, बिना बहुमत साबित किए ही गिर गई। इसके बाद राज्यपाल ने सबसे बड़ी पार्टी की नेता राबड़ी देवी को सरकार बनाने के लिए बुलाया और उन्होंने सफलतापूर्वक अपना बहुमत साबित कर दिया। यह 7 दिन का किस्सा आज भी बिहार की राजनीति के सबसे यादगार अध्यायों में से एक है।