Bihar Politics : भाई जैसे हैं तेजस्वी, फिर भी दही-चूड़ा खाने लालू के घर क्यों नहीं गए चिराग पासवान?

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News India Live, Digital Desk : बिहार की राजनीति और मकर संक्रांति का दही-चूड़ा भोज... ये दोनों चीजें एक-दूसरे के बिना अधूरी लगती हैं। पटना में जब भी 'चूड़ा-दही' का भोज होता है, तो सिर्फ तिलकुट नहीं टूटते, बल्कि नए सियासी समीकरण भी बनते और बिगड़ते हैं।

इस बार मकर संक्रांति पर सबकी निगाहें राबड़ी देवी के आवास पर टिकी थीं, जहां लालू प्रसाद यादव के बड़े बेटे तेज प्रताप यादव ने एक भव्य भोज का आयोजन किया था। सबको उम्मीद थी कि चिराग पासवान वहां जरूर पहुंचेंगे, क्योंकि तेजस्वी यादव और चिराग के बीच की "दोस्ती" और "भाईचारे" के किस्से जगजाहिर हैं। लेकिन, ऐसा हुआ नहीं। चिराग नदारद रहे।

अब सवाल उठा आखिर क्यों? क्या दोस्तों में अनबन है? या मामला कुछ और है? खुद चिराग पासवान ने अब इन अटकलों पर विराम लगा दिया है।

तेज प्रताप के न्योते पर क्या बोले चिराग?

चिराग पासवान ने खुलकर और बेबाक अंदाज में अपनी बात रखी। उन्होंने साफ किया कि तेज प्रताप यादव ने उन्हें बहुत प्यार और सम्मान से बुलाया था। लेकिन उनका वहां न जाना किसी पर्सनल दुश्मनी की वजह से नहीं, बल्कि एक सोची-समझी रणनीति है।

चिराग का कहना था, "मेरे और लालू जी के परिवार के रिश्ते बहुत पुराने और गहरे हैं। तेजस्वी मेरे छोटे भाई जैसे हैं। लेकिन, अभी जो सियासी हालात हैं, उसमें अगर मैं वहां जाता तो गलत मतलब निकाले जाते।"

आसान शब्दों में समझें तो चिराग यह नहीं चाहते कि उनके वोटर्स और समर्थकों (खासकर एनडीए या उनके अपने कोर वोटर्स) के बीच कोई कन्फ्यूजन पैदा हो। वो यह संदेश नहीं देना चाहते कि वो 'महागठबंधन' के करीब जा रहे हैं।

"मिक्स नहीं करना चाहते रिश्ते और राजनीति"

चिराग ने बहुत ही परिपक्वता (Maturity) के साथ कहा कि व्यक्तिगत संबंध और राजनीतिक विचारधारा दो अलग पटरियां हैं। वो नहीं चाहते कि लोग उनके दही-चूड़ा खाने को "सियासी खिचड़ी" पकना समझ लें। उनका मानना है कि जब तक चुनाव और गठबंधन की स्थिति पूरी तरह साफ नहीं होती, तब तक ऐसी मेल-मुलाकातों से बचना ही बेहतर है, ताकि जनता में कोई गलत मैसेज न जाए।

बिहार की राजनीति में अटकलों का बाज़ार

बिहार में वैसे भी चर्चाओं का बाजार गर्म रहता है। कभी कहा जाता है कि चिराग आरजेडी के साथ जा सकते हैं, तो कभी एनडीए के साथ उनकी 'हनुमान' वाली छवि सामने आती है। ऐसे में तेज प्रताप के भोज से दूरी बनाकर चिराग ने एक तरह से यह संकेत दे दिया है कि वो फ़िलहाल अपने पत्ते नहीं खोलने वाले। वो दोस्ती निभाएंगे, लेकिन राजनीति अपनी शर्तों पर करेंगे।

कुल मिलाकर बात यह है कि चिराग ने भोज में न जाकर यह साबित कर दिया है कि वो अब एक मजे हुए राजनेता की तरह सोच रहे हैं जहां भावनाओं से ज्यादा सियासी नफा-नुकसान मायने रखता है।

आप चिराग के इस फैसले को कैसे देखते हैं? सही किया या जाना चाहिए था?