Bihar Political : क्या RJD से अलग होने वाली है कांग्रेस? बिहार के नेताओं ने लालू और तेजस्वी के गठबंधन पर खड़े किए कड़वे सवाल

Post

News India Live, Digital Desk : बिहार की राजनीति और ‘खिचड़ी’दोनों कभी ठंडी नहीं होतीं। यहाँ कब कौन दोस्त दुश्मन बन जाए और कब दुश्मन गले मिल ले, कहना मुश्किल है। लेकिन इस बार जो खबर आ रही है, वो महागठबंधन   की नींव हिला सकती है।

चर्चा जोरों पर है कि बिहार में कांग्रेस (Congress) और आरजेडी (RJD) की सालों पुरानी दोस्ती में दरार पड़ती दिख रही है। जो कांग्रेसी नेता कल तक लालू प्रसाद यादव और तेजस्वी यादव के कसीदे पढ़ते नहीं थकते थे, आज वही दबी जुबान में (और कुछ तो खुलकर) पूछ रहे हैं"आखिर कब तक हम आरजेडी की पिछलग्गू बनकर रहेंगे?"

आखिर क्यों उठ रहे हैं अलग होने के सुर?

इस सियासी अनबन की वजह समझने के लिए हमें थोड़ा पीछे जाना होगा। दरअसल, बिहार कांग्रेस के कई स्थानीय नेताओं और कार्यकर्ताओं का मानना है कि आरजेडी के साथ गठबंधन करने से कांग्रेस को फायदा कम और नुकसान ज्यादा हो रहा है।

इन नेताओं का तर्क है:

  1. RJD का 'बड़ा भाई' वाला रवैया: गठबंधन में हमेशा आरजेडी की मनमानी चलती है। चाहे वो लोकसभा चुनाव हो या विधानसभा, कांग्रेस को हमेशा कम सीटें मिलती हैं और वो भी ऐसी, जहाँ जीतना मुश्किल होता है।
  2. पार्टी का जनाधार खत्म होना: नेताओं को लगता है कि लालू और तेजस्वी की छत्रछाया में रहने से कांग्रेस अपना खुद का वजूद खो रही है। बिहार में पार्टी सिर्फ़ 'बैसाखी' बनकर रह गई है। कार्यकर्ता चाहते हैं कि पार्टी अपने दम पर खड़ी हो, भले ही शुरुआत में संघर्ष करना पड़े।

बैठक में निकला गुस्सा

खबर है कि हाल ही में हुई कुछ बैठकों में बिहार कांग्रेस के नेताओं ने अपनी पीड़ा आलाकमान तक पहुंचाई है। उनका कहना है कि अगर हम इसी तरह आरजेडी के भरोसे बैठे रहे, तो एक दिन बिहार से कांग्रेस का नामोनिशान मिट जाएगा। कई नेता तो यह तक कह रहे हैं कि "अकेले चुनाव लड़ना सम्मानजनक हार है, बजाय इसके कि गठबंधन में रहकर अपमानित होकर जीतें।"

तेजस्वी यादव का असर और भाजपा की नजर

एक तरफ तेजस्वी यादव (Tejashwi Yadav) अपनी 'ए टू जेड' (A to Z) की राजनीति कर रहे हैं और अपना कद बढ़ा रहे हैं, वहीं कांग्रेस को लगता है कि उसे साइडलाइन किया जा रहा है।
उधर, बीजेपी (BJP) इस पूरे तमशे को दूर बैठकर देख रही है और मज़े ले रही है। अगर ये गठबंधन टूटता है, तो सीधा फायदा एनडीए (NDA) को होगा, क्योंकि विपक्ष के वोट बंट जाएंगे।

अब आगे क्या होगा?

फ़िलहाल, यह सिर्फ़ बिहार इकाई की मांग है। दिल्ली में बैठा कांग्रेस का केंद्रीय नेतृत्व (High Command) गांधी परिवार और लालू परिवार के पुराने रिश्तों को देखते हुए क्या फैसला लेता है, यह देखना दिलचस्प होगा।

लेकिन एक बात तो साफ़ है बिहार कांग्रेस के अंदर एक ज्वालामुखी धधक रहा है। अगर इसे समय रहते शांत नहीं किया गया, तो आने वाले चुनावों में महागठबंधन की तस्वीर कुछ और ही हो सकती है। क्या हाथ, लालटेन का साथ छोड़ देगा? यह तो वक्त ही बताएगा।