Bangladesh Politics : क्या सत्ता ने संवेदनाएं खत्म कर दी हैं? बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों के दर्द पर मरहम के बजाय नेताओं के बेतुके बोल
News India Live, Digital Desk : आज 6 जनवरी 2026 है और जब हम आधुनिक युग की बात करते हैं, तो अक्सर उम्मीद करते हैं कि इंसानियत अब और बेहतर हुई होगी। लेकिन सरहद पार बांग्लादेश से आने वाली खबरों और बयानों ने इस उम्मीद को बुरी तरह तोड़ दिया है। जब वहां सड़कों पर अल्पसंख्यकों की सुरक्षा का सवाल उठता है या किसी निर्दोष की जान जाने की खबर आती है, तो कलेजा मुँह को आ जाता है।
लेकिन उससे भी ज्यादा चौंकाने वाली और दिल दुखाने वाली बात ये है कि वहां के सत्ताधारियों और कुछ बड़े नेताओं का कहना है कि"ये तो छोटी-मोटी घटनाएं हैं, इसे बढ़ा-चढ़ाकर मत पेश कीजिए।"
क्या किसी की जान जाना 'छोटी बात' हो सकती है?
एक बार ठंडे दिमाग से सोचिए, जिस माँ ने अपना बेटा खोया हो या जिस परिवार का सब कुछ आग के हवाले कर दिया गया हो, क्या उनके लिए यह एक 'छोटा वाकया' होगा? नेताओं की जुबान पर ये शब्द भले ही हल्के लगते हों, लेकिन हकीकत में ये उस जलते हुए घर की राख को हवा देने जैसा है।
राजनीतिक गलियारों में तो यह बयान महज़ अपना दामन बचाने की एक कोशिश हो सकता है, लेकिन जमीन पर ये संदेश उन अराजक तत्वों को बढ़ावा देता है जिन्हें लगता है कि अल्पसंख्यकों पर हमला करना कोई बड़ा गुनाह नहीं है।
इंतजार है तो बस 'न्याय' का
दुनिया भर में लोग अब यह सवाल पूछ रहे हैं कि क्या मानवीय अधिकारों की रक्षा सिर्फ चुनिंदा मौकों पर ही की जाएगी? जब अपनों पर बात आती है तो वह बड़ा कांड होता है, और जब 'दूसरों' के साथ ज्यादती होती है तो वो 'साधारण हादसा' बन जाता है?
बांग्लादेश की इन दुखद स्थितियों ने न केवल पड़ोसी देशों बल्कि अंतरराष्ट्रीय समुदायों को भी चिंता में डाल दिया है। ये वक़्त राजनीति चमकाने या अपनी कुर्सी बचाने का नहीं है। ये वक़्त है उन परिवारों का हाथ थामने का जो खौफ के साए में जीने को मजबूर हैं। अगर हम आज भी हत्याओं को 'छोटी घटनाएं' मानकर नज़रअंदाज़ करेंगे, तो कल मानवता हमें कभी माफ़ नहीं करेगी।
जब तक शासन-प्रशासन ऐसे जघन्य कृत्यों को गंभीरता से लेकर कड़े कदम नहीं उठाएगा, तब तक ये ज़ख्म कभी नहीं भरेंगे। क्योंकि अन्याय कहीं भी हो, वह दुनिया के हर कोने के लिए एक बड़ा खतरा होता है।