Anti-Israel Forces : लेबनान का छाया युद्ध ,हिज़्बुल्लाह की वापसी से इज़राइल-अमेरिका में बढ़ी बेचैनी, क्या होगा अगला क़दम?
News India Live, Digital Desk: Anti-Israel Forces : आपने मध्य-पूर्व के हालात और ख़ासकर लेबनान (Lebanon) और उसके पड़ोसी देशों के बीच बढ़ते तनाव के बारे में ज़रूर सुना होगा. इन चर्चाओं में अक्सर एक नाम सामने आता है - हिज़्बुल्लाह (Hezbollah). अभी ख़बर आ रही है कि लेबनान के इस "छाया-फ़ौज" (Shadow Army) यानी हिज़्बुल्लाह का दबदबा एक बार फिर बढ़ रहा है, ऐसे में अमेरिका (US) और इज़राइल (Israel) भी इस पर अपना दबाव बढ़ा रहे हैं. आइए, समझते हैं कि ये पूरा मामला क्या है और इसके मायने क्या हो सकते हैं.
कौन है हिज़्बुल्लाह?
लेबनान का हिज़्बुल्लाह महज़ एक राजनीतिक दल नहीं है; यह एक सशस्त्र समूह भी है जिसे ईरान का समर्थन प्राप्त है. कई लोग इसे "लेबनान की छाया-फ़ौज" कहते हैं क्योंकि इसका अपना एक मज़बूत सैन्य ढाँचा है, जो कई बार लेबनान की सरकारी सेना से भी ज़्यादा ताक़तवर दिखता है. यह सालों से इज़राइल के ख़िलाफ़ अपनी गतिविधियों और मध्य-पूर्व की राजनीति में अपनी बड़ी भूमिका के लिए जाना जाता है.
हिज़्बुल्लाह फिर क्यों मज़बूत हो रहा है?
अभी जो रिपोर्ट्स आ रही हैं, उनके मुताबिक़ हिज़्बुल्लाह एक बार फिर से अपनी शक्ति बढ़ा रहा है. इसकी कई वजहें हो सकती हैं. शायद सीरिया (Syria) में हुई हालिया लड़ाइयों का अनुभव, ईरान से लगातार मिल रहा समर्थन और लेबनान के अंदरूनी राजनीतिक और आर्थिक हालात इसे मज़बूती दे रहे हैं. जब देश में कमज़ोरी आती है, तो ऐसे संगठित समूह अक्सर अपना असर बढ़ा लेते हैं. उनकी सैन्य क्षमताएँ बढ़ रही हैं और क्षेत्रीय समीकरणों में उनका प्रभाव भी पहले से ज़्यादा देखा जा रहा है.
अमेरिका और इज़राइल क्यों दबाव बढ़ा रहे हैं?
इज़राइल हमेशा से हिज़्बुल्लाह को अपनी सुरक्षा के लिए एक बड़ा ख़तरा मानता रहा है. हिज़्बुल्लाह के पास रॉकेट और मिसाइलों का जखीरा है जो इज़राइल पर हमला करने की क्षमता रखता है. वहीं, अमेरिका हिज़्बुल्लाह को एक आतंकवादी संगठन मानता है और उसे ईरान की क्षेत्रीय अस्थिरता फैलाने की रणनीति का एक मोहरा मानता है.
ऐसे में, जब हिज़्बुल्लाह फिर से मज़बूत हो रहा है, तो अमेरिका और इज़राइल के लिए चिंता बढ़ना स्वाभाविक है. दोनों ही देश इसे अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए ख़तरा मानते हैं और इसी वजह से उस पर सैन्य और कूटनीतिक दबाव बढ़ा रहे हैं. इज़राइल की तरफ़ से चेतावनी और संभावित सैन्य कार्रवाइयों की बात हो सकती है, वहीं अमेरिका उस पर प्रतिबंध लगाकर और कूटनीतिक तरीक़े से उसे कमज़ोर करने की कोशिश कर सकता है.
कुल मिलाकर, ये हालात मध्य-पूर्व को एक बार फिर तनाव की तरफ़ ले जा सकते हैं. इस स्थिति पर दुनिया भर की नज़र है, क्योंकि किसी भी तरफ़ से ज़रा-सी चूक इस इलाक़े को बड़े संघर्ष की आग में धकेल सकती है.