20 साल का इंतजार! निजी कॉलेजों में OBC, SC, ST आरक्षण का वादा अधूरा, जानें क्यों नहीं मिल पा रहा छात्रों को पूरा हक
नई दिल्ली: देश में हर साल करोड़ों छात्र JEE और NEET जैसी कठिन परीक्षाओं में सरकारी सीट पाने के लिए दिन-रात एक कर देते हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि आज से लगभग 20 साल पहले, जनवरी 2006 में भारतीय संविधान में एक ऐसा ऐतिहासिक बदलाव किया गया था, जो अगर पूरी तरह से लागू हो जाता, तो आज तस्वीर कुछ और होती? यह बदलाव था संविधान के अनुच्छेद 15(5) का, जिसने निजी इंजीनियरिंग, मेडिकल और मैनेजमेंट कॉलेजों में भी आरक्षित वर्ग (OBC, SC, ST) के लिए कोटा लागू करने का रास्ता खोला था। पर दो दशक बीत जाने के बाद भी यह वादा अधूरा है और लाखों छात्र अपने संवैधानिक हक का इंतजार कर रहे हैं।
क्या है संविधान का भूला दिया गया अनुच्छेद 15(5)?
जनवरी 2006 में, भारतीय संसद ने 93वां संविधान संशोधन पारित किया था। इसके तहत संविधान के अनुच्छेद 15 में एक नया खंड (5) जोड़ा गया। इस खंड ने केंद्र और राज्य सरकारों को यह शक्ति दी कि वे सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों (OBC), अनुसूचित जातियों (SC) और अनुसूचित जनजातियों (ST) के लिए निजी शिक्षण संस्थानों (अल्पसंख्यक संस्थानों को छोड़कर) में भी आरक्षण का विशेष प्रावधान कर सकती हैं। इसका सीधा मतलब था- निजी कॉलेजों में OBC के लिए 27%, SC के लिए 15% और ST के लिए 7.5% आरक्षण अनिवार्य करना।
कहां अटक गया आरक्षण का पहिया?
यह कानून केंद्रीय शिक्षण संस्थानों जैसे IIT, IIM और AIIMS में तो लागू हो गया। मेडिकल के क्षेत्र में NEET के माध्यम से छात्रों को कुछ हद तक इसका लाभ भी मिला। लेकिन असली क्रांति जहां आनी थी, यानी देश के निजी क्षेत्र में, वहां यह कभी पहुंची ही नहीं। आज भारत में 70% से अधिक छात्र निजी कॉलेजों में पढ़ रहे हैं, लेकिन वहां आरक्षण का यह संवैधानिक प्रावधान व्यावहारिक रूप से शून्य है। साल 2014 में सुप्रीम कोर्ट ने भी इस कानून को वैध ठहराया, लेकिन इसके बावजूद जमीनी हकीकत नहीं बदली।
इसकी मुख्य वजहें साफ हैं:
- कानूनी ढांचे की कमी: संविधान संशोधन केवल सरकारों को कानून बनाने की शक्ति देता है, इसे लागू नहीं करता। आरक्षण को अनिवार्य करने के लिए संसद या राज्य विधानसभाओं द्वारा एक स्पष्ट विधेयक पारित करना जरूरी था। केंद्र सरकार ने पिछले 20 सालों में ऐसा कोई व्यापक कानून नहीं बनाया जो सभी निजी संस्थानों पर इसे लागू करता हो।
- राज्यों की आधी-अधूरी कोशिश: कुछ राज्यों जैसे तमिलनाडु और महाराष्ट्र ने अपने स्तर पर इसे लागू करने का प्रयास किया, लेकिन एक राष्ट्रीय कानून के अभाव में इसका असर सीमित रहा।
- राजनीतिक इच्छाशक्ति का अभाव: आरक्षण का मुद्दा हमेशा से ही एक संवेदनशील राजनीतिक बहस का विषय रहा है, जिसके चलते इसे पूरी तरह से लागू करने में हिचकिचाहट दिखाई गई।
लागू होने से क्या होगा फायदा?
आज JEE और NEET में करोड़ों छात्र कुछ हजार सरकारी सीटों के लिए प्रतिस्पर्धा करते हैं क्योंकि निजी कॉलेजों की फीस बहुत महंगी है। अगर अनुच्छेद 15(5) सही मायने में लागू हो जाए तो:
- निजी कॉलेजों में लाखों आरक्षित सीटें उपलब्ध होंगी, जिससे छात्रों को ज्यादा विकल्प मिलेंगे।
- सरकारी कॉलेजों पर दबाव कम होगा और कट-ऑफ नीचे आएगी।
- आरक्षित वर्ग के योग्य छात्रों को भी अच्छी शिक्षा के समान अवसर मिलेंगे, भले ही उनकी रैंक थोड़ी कम हो।
- शिक्षा के क्षेत्र में सामाजिक समानता का लक्ष्य हासिल करने में मदद मिलेगी।
आज भी सवाल यही है कि 20 साल से अपने हक का इंतज़ार कर रहे इन छात्रों का भविष्य क्या होगा? शिक्षा के ज़रिए बराबरी लाने का यह संवैधानिक हथियार बिना किसी ठोस कानूनी ढांचे के सिर्फ़ कागज़ों तक ही सीमित रह गया है। अब समय आ गया है कि सरकार इस पर कोई मज़बूत कदम उठाए।