Jharkhand Politics : नाम बदलने से क्या नियत बदल जाएगी? मनरेगा पर बाबूलाल मरांडी ने खोला मोर्चा, जानें पूरा विवाद
News India Live, Digital Desk: आज की राजनीति में अगर कोई चीज़ सबसे ज़्यादा मायने रखती है, तो वो है जनता के बीच अपनी 'ब्रांडिंग'। झारखंड में पिछले कुछ दिनों से इस बात को लेकर काफी चर्चा है कि राज्य सरकार केंद्र की योजनाओं को अपने नए नाम और कलेवर के साथ पेश करने की कोशिश कर रही है। ताज़ा विवाद मनरेगा और प्रस्तावित 'जी-राम जी योजना' (G-Ram Ji Yojana) के इर्द-गिर्द घूम रहा है।
मरांडी का तीखा सवाल "सिर्फ नाम बदलकर कब तक बरगलाओगे?"
झारखंड भाजपा के कद्दावर नेता बाबूलाल मरांडी ने इस पर कड़ा एतराज जताया है। उनका कहना है कि जब बजट और फंड पूरी तरह केंद्र की मोदी सरकार भेज रही है, तो झारखंड सरकार को इस पर अपना 'स्टिकर' चिपकाने का कोई हक़ नहीं है। मरांडी के मुताबिक, सरकार राज्य के मेहनती मजदूरों को गुमराह करने की कोशिश कर रही है ताकि वह केंद्र की सफल योजनाओं का श्रेय खुद ले सके।
क्या है असली 'पेंच'?
खबरों की मानें तो झारखंड की गठबंधन सरकार ने मनरेगा के तहत मिलने वाले काम और भुगतान को अपनी ब्रांडिंग के साथ जोड़ने की कोशिश की है। विपक्षी दल इसे 'चोरी और सीनाज़ोरी' का नाम दे रहे हैं। मरांडी का तर्क है कि सरकार ज़मीनी स्तर पर विकास करने के बजाय सिर्फ शब्दों के साथ खेलने में मशगूल है। इससे न केवल संवैधानिक ढाँचे पर असर पड़ता है, बल्कि आम लोगों में भ्रम भी फैलता है कि आख़िर उन्हें पैसे कौन दे रहा है।
क्रेडिट वॉर का असर क्या होगा?
6 जनवरी 2026 की ताज़ा रिपोर्ट्स को देखें, तो यह लड़ाई महज़ कागजों तक सीमित नहीं है। अब भाजपा इस मुद्दे को लेकर गांव-गांव तक जाने की तैयारी में है। पार्टी कार्यकर्ताओं को टास्क दिया गया है कि वे लोगों को समझाएं कि यह प्रधानमंत्री की ओर से भेजा गया पैसा है। दूसरी ओर, सरकार इसे अपनी संप्रभुता और स्थानीय अधिकारों से जोड़कर देख रही है।
राजनीति अपनी जगह है, लेकिन सवाल वही बना हुआ है कि— आख़िर नाम की इस जंग में विकास कहीं पीछे तो नहीं छूट रहा? झारखंड के मज़दूरों के लिए शायद नाम उतना मायने नहीं रखता जितना समय पर भुगतान, लेकिन नेताओं के लिए यह आगामी चुनावों का एक मज़बूत हथियार ज़रूर बन गया है।