झारखंड में हलचल चंपई सोरेन अचानक क्यों हुए हिमंत बिस्वा सरमा के मुरीद? वजह जानकर आप भी करेंगे तारीफ
News India Live, Digital Desk : राजनीति में अक्सर हम देखते हैं कि एक पार्टी का नेता दूसरे पार्टी के नेता की आलोचना ही करता है। लेकिन जब मामला 'अपनो' के भले का हो, तो तारीफ करने में कंजूसी नहीं करनी चाहिए। ऐसा ही कुछ देखने को मिला है झारखंड के दिग्गज नेता और 'कोल्हान टाइगर' के नाम से मशहूर चंपई सोरेन (Champai Soren) के व्यवहार में।
चंपई सोरेन ने असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा (Himanta Biswa Sarma) की खुले दिल से तारीफ की है। आखिर इसकी वजह क्या है? क्या यह सिर्फ राजनीति है या इसके पीछे कोई गहरा भावात्मक जुड़ाव है? आइए, आपको आसान भाषा में पूरा माजरा समझाते हैं।
झारखंड का असम से 150 साल पुराना रिश्ता
कहानी आज की नहीं, बल्कि अंग्रेजों के जमाने की है। करीब 100-150 साल पहले, झारखंड के आदिवासी भाई-बहनों को अंग्रेजों ने चाय की खेती के लिए असम (Assam Tea Gardens) ले जाकर बसाया था। ये लोग वहां पीढ़ियों से रह रहे हैं, खून-पसीना बहा रहे हैं और असम की अर्थव्यवस्था को खड़ा कर रहे हैं। इन्हें वहां 'टी-ट्राइब्स' (Tea Tribes) कहा जाता है।
समस्या यह थी कि दशकों से वहां रहने के बावजूद, इन लोगों के पास अपनी जमीन का कोई कागज या मालिकाना हक (Land Rights) नहीं था। वे वहां 'मजदूर' बनकर ही रह गए थे।
हिमंत बिस्वा सरमा का बड़ा फैसला
अब खबर यह है कि असम की हिमंत बिस्वा सरमा सरकार ने इन चाय बागान श्रमिकों को उनकी जमीन का मालिकाना हक देने की मुहिम शुरू की है। तिनसुकिया जिले में एक बड़े कार्यक्रम के दौरान हज़ारों लोगों को जमीन के पट्टे (Land Pattas) बांटे गए।
क्यों गदगद हुए चंपई सोरेन?
बस, यही वह फैसला है जिसने चंपई सोरेन का दिल जीत लिया। चंपई सोरेन ने सोशल मीडिया पर लिखा कि असम के सीएम ने झारखंडी मूल के आदिवासियों के आंसू पोंछने का काम किया है। उन्होंने कहा कि "झारखंड के लोग जहां भी रहें, उनकी खुशी में हमारी खुशी है।"
सोचिए, किसी के पास 100 साल से घर हो, लेकिन कागज न हो, और अचानक उसे उस जमीन का मालिक बना दिया जाए तो खुशी का क्या ठिकाना होगा? चंपई सोरेन का कहना है कि यह कदम उन लाखों झारखंडी परिवारों को एक नई पहचान और सुरक्षा देगा जो इतने सालों से वहां संघर्ष कर रहे थे।
राजनीति के भी अपने मायने
वैसे तो यह एक समाजिक न्याय का मुद्दा है, लेकिन जानकार इसमें सियासी रंग भी देख रहे हैं। चंपई सोरेन का यह बयान यह भी दिखाता है कि आदिवासी कल्याण के मुद्दे पर जो भी अच्छा काम करेगा, उसे समर्थन मिलेगा, चाहे पार्टी कोई भी हो। झारखंड और असम के बीच का यह 'आदिवासी कनेक्शन' आने वाले दिनों में और गहरा हो सकता है।
कुल मिलाकर, असम में रहने वाले हमारे झारखंडी भाइयों के लिए यह वाकई एक ऐतिहासिक पल है। घर मिल जाने की खुशी से बड़ी कोई खुशी नहीं होती!