शी चिनफिंग ने डोनाल्ड ट्रंप को दिया कड़ा संदेश, ओमान के सुल्तान से मुलाकात के बाद वैश्विक कूटनीति में हलचल
अंतरराष्ट्रीय राजनीति, वैश्विक कूटनीति और मध्य पूर्व (Middle East) के संवेदनशील घटनाक्रम से एक बहुत ही बड़ी और चौंकाने वाली खबर सामने आ रही है। ईरान पर अमेरिका और इजरायल द्वारा संभावित सैन्य हमलों की आशंकाओं और युद्ध के गहरे बादलों के बीच चीन ने पश्चिम एशिया में अपने रणनीतिक कदम तेज कर दिए हैं। हाल ही में चीन की आधिकारिक यात्रा पर पहुंचे ओमान के सुल्तान हैथम बिन तारिक अल-सैद के साथ एक उच्चस्तरीय बैठक के दौरान चीनी राष्ट्रपति शी चिनफिंग (Xi Jinping) ने एक बेहद कड़ा और स्पष्ट संदेश दिया है। चिनफिंग ने दो टूक शब्दों में कहा है कि पश्चिम एशिया और खाड़ी क्षेत्र किसी भी कीमत पर बड़ी ताकतों या महाशक्तियों की आपसी प्रतिद्वंदिता और वर्चस्व का अखाड़ा नहीं बनना चाहिए। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के प्रशासन के संभावित आक्रामक कदमों के बीच चीन का यह बयान अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में एक बड़ा मोड़ माना जा रहा है, क्योंकि चीन अब आधिकारिक रूप से अमेरिका और ईरान के बीच शांति वार्ता में एक मजबूत 'गारंटर' की भूमिका निभाने की तैयारी कर रहा है। आइए विस्तार से जानते हैं कि पश्चिम एशिया के इस भू-राजनीतिक घटनाक्रम के पीछे चीन की क्या रणनीति है और ओमान के साथ हुई इस ऐतिहासिक बैठक के क्या मायने हैं।
ओमान के सुल्तान की ऐतिहासिक चीन यात्रा और शी चिनफिंग का कड़ा संदेश
अंतरराष्ट्रीय मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, ओमान के सुल्तान हैथम बिन तारिक अल-सैद अपनी पहली आधिकारिक यात्रा पर बीजिंग पहुंचे थे। वर्ष 1978 में चीन और ओमान के बीच राजनयिक संबंध स्थापित होने के बाद यह पहला मौका है जब ओमान के किसी राष्ट्राध्यक्ष ने चीन की यात्रा की है। इस ऐतिहासिक मुलाकात के दौरान चीनी राष्ट्रपति शी चिनफिंग ने पश्चिम एशिया की वर्तमान सुलगती स्थिति पर गहरी चिंता व्यक्त की।
शी चिनफिंग ने ओमान के सुल्तान से बातचीत करते हुए कहा कि वर्तमान समय में पूरी दुनिया बहुत तेजी से बड़े बदलावों के दौर से गुजर रही है। ऐसे में क्षेत्रीय शांति और स्थिरता को बनाए रखने के लिए यह अत्यंत आवश्यक है कि खाड़ी देशों को बाहरी महाशक्तियों की सैन्य और राजनीतिक खींचतान का केंद्र न बनाया जाए। चिनफिंग ने यह भी घोषणा की कि चीन क्षेत्र में युद्ध रोकने, तनाव कम करने और सुरक्षा संबंधी गंभीर चुनौतियों का कूटनीतिक समाधान निकालने के लिए सभी अरब देशों के साथ मिलकर काम करने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है। अमेरिकी नीतियों के प्रभाव वाले पश्चिम एशिया में चीन का इस तरह से दखल देना ट्रंप प्रशासन के लिए एक सीधा भू-राजनीतिक संदेश माना जा रहा है।
अमेरिका-ईरान शांति वार्ता में गारंटर की भूमिका में उतर रहा है ड्रैगन
पश्चिम एशिया में शांति स्थापित करने के दावों के साथ चीन अब पर्दे के पीछे से निकलकर सीधे तौर पर मध्यस्थ की भूमिका में आ गया है। कूटनीतिक गलियारों से आ रही खबरों के मुताबिक, अमेरिका और ईरान के बीच चल रहे गतिरोध को खत्म करने के लिए होने वाली शांति वार्ता में चीन एक मुख्य 'गारंटर' के रूप में अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहा है।
इस शांति पहल को जमीन पर उतारने और कूटनीतिक संवाद को मजबूत करने के लिए चीन के विशेष दूत झाई जून (Zhai Jun) इसी महीने ईरान, ओमान और सऊदी अरब का आधिकारिक दौरा करने वाले हैं। चीनी दूत का यह दौरा इस बात का संकेत है कि बीजिंग मध्य पूर्व के देशों को एकजुट करके अमेरिकी दबाव को संतुलित करने की एक बड़ी रणनीति पर काम कर रहा है। हाल ही में ईरान के उप सुरक्षा प्रमुख अली बाघेरी कानी ने भी बीजिंग का दौरा किया था, जहां चीनी विदेश मंत्री वांग यी से उनकी मुलाकात हुई थी। इस बैठक में चीन ने ईरान की संप्रभुता, क्षेत्रीय अखंडता और सुरक्षा का पूर्ण समर्थन करने का आश्वासन दिया था और सभी पक्षों से सैन्य टकराव छोड़कर राजनीतिक समाधान खोजने की अपील की थी।
चीन और ओमान का 20 सूत्रीय संयुक्त बयान: होर्मुज स्ट्रेट की सुरक्षा पर जोर
ओमान के सुल्तान और चीनी राष्ट्रपति के बीच हुई इस ऐतिहासिक द्विपक्षीय बैठक के बाद दोनों देशों ने एक विस्तृत 20 बिंदुओं वाला संयुक्त बयान जारी किया है। इस संयुक्त बयान के केंद्र में पश्चिम एशिया की सुरक्षा और वैश्विक व्यापार का सबसे संवेदनशील मार्ग माना जाने वाला होर्मुज स्ट्रेट (Strait of Hormuz) रहा है।
दोनों देशों के शीर्ष नेताओं ने इस बात पर पूरी सहमति जताई कि होर्मुज स्ट्रेट से कच्चे तेल और अन्य वस्तुओं की आवाजाही पूरी तरह सामान्य और सुरक्षित होनी चाहिए, क्योंकि इसमें जरा भी व्यवधान वैश्विक अर्थव्यवस्था को हिला सकता है। इसके साथ ही, चीन और ओमान ने अमेरिका और ईरान से यह पुरजोर अपील की है कि वे युद्ध और टकराव का रास्ता छोड़कर शांतिपूर्ण मार्ग अपनाएं। दोनों देशों ने यह भी मांग की कि ईरान और अन्य पक्षों को इस साल जून के महीने में हुए समझौतों पर वापस लौटना चाहिए और बंद पड़े शांति वार्ताओं के दौर को तुरंत फिर से शुरू करना चाहिए, ताकि पश्चिम एशिया को एक और विनाशकारी युद्ध से बचाया जा सके।
पश्चिम एशिया की बदलती भू-राजनीति और अमेरिका के लिए चुनौती
विश्लेषकों का मानना है कि जिस तरह से चीन लगातार पश्चिम एशिया के मामलों में अपनी कूटनीतिक पैठ मजबूत कर रहा है, वह अमेरिकी प्रभाव के लिए एक बड़ी चुनौती बनता जा रहा है। पारंपरिक रूप से खाड़ी देशों की सुरक्षा में अमेरिका का दबदबा रहा है, लेकिन सऊदी अरब और ईरान के बीच कूटनीतिक संबंध बहाल कराने के बाद अब ओमान के साथ मिलकर चीन ने यह साबित कर दिया है कि वह मध्य
पूर्व में अमेरिका के मुकाबले एक बड़े शांति निर्माता और वैकल्पिक शक्ति के रूप में उभर रहा है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के लिए यह स्थिति इसलिए भी अहम है क्योंकि ईरान के साथ तनाव और इजरायल के सुरक्षा समीकरणों के बीच यदि चीन मध्य पूर्व की राजनीति का मुख्य संचालक बन जाता है, तो वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति और व्यापारिक रास्तों पर अमेरिकी नियंत्रण कमजोर हो सकता है। आने वाले दिनों में चीनी विशेष दूत झाई जून के खाड़ी देशों के दौरे से यह साफ हो जाएगा कि पश्चिम एशिया की कूटनीति किस करवट बैठती है।