हैदराबाद के निजाम ने आखिर क्यों और किस खास मौके पर क्वीन एलिजाबेथ द्वितीय को भेजा था यह नायाब तोहफा
इतिहास के पन्नों में जब भी दुनिया के सबसे अमीर और रईस शासकों की बात होती है, तो हैदराबाद के आखिरी निजाम 'मीर उस्मान अली खान' का नाम सबसे ऊपर लिया जाता है, जिनकी दौलत के किस्से आज भी पूरी दुनिया में मशहूर हैं। साल 1947 में जब ब्रिटेन की तत्कालीन राजकुमारी एलिजाबेथ (जो बाद में महारानी एलिजाबेथ द्वितीय बनीं) का विवाह प्रिंस फिलिप के साथ तय हुआ, तो पूरी दुनिया के शाही घरानों से उन्हें अनमोल उपहार भेजे जा रहे थे। इसी कड़ी में दुनिया के सबसे अमीर शख्स माने जाने वाले हैदराबाद के निजाम ने भी अपनी दरियादिली और शाही शान का परिचय देते हुए होने वाली ब्रिटिश महारानी के लिए एक ऐसा तोहफा तैयार करवाया जो अपनी चमक और ऐतिहासिक महत्व के कारण आज भी अजूबा माना जाता है। निजाम ने इस तोहफे को भेजने के पीछे ब्रिटिश शाही परिवार के साथ अपने कूटनीतिक और गहरे संबंधों को मजबूत करने का उद्देश्य रखा था, लेकिन वे शायद यह नहीं जानते थे कि उनका यह उपहार आगे चलकर ब्रिटिश राजशाही के सबसे पसंदीदा और ऐतिहासिक गहनों में से एक बन जाएगा। इस बेशकीमती तोहफे की गूंज उस समय अंतरराष्ट्रीय मीडिया में भी छा गई थी और आज भी जब ब्रिटेन की महारानी के गहनों की नुमाइश होती है, तो हैदराबाद के निजाम के इस हार का जिक्र सबसे पहले किया जाता है।
इस ऐतिहासिक नेक्लेस में जड़े थे 300 से अधिक बेशकीमती हीरे और क्या थी इस शाही हार की असली खासियत?
निजाम द्वारा भेजे गए इस शानदार और ऐतिहासिक हार की कारीगरी और भव्यता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इसमें कुल 300 से भी अधिक अनमोल और शुद्ध हीरों का इस्तेमाल किया गया था। इस नेक्लेस को उस दौर के सबसे बेहतरीन और नामी आभूषण डिजाइनरों की देखरेख में तैयार किया गया था, जिसमें हीरों के साथ-साथ प्लेटिनम और अन्य दुर्लभ कीमती धातुओं का बेहद शानदार तरीके से काम किया गया था। इस हार की सबसे बड़ी खासियत यह थी कि इसके बीचों-बीच एक बहुत बड़ा लटकन (Pendant) लगा हुआ था, जिसे अलग करके एक शानदार ब्रोच (Brooch) के रूप में भी पहना जा सकता था, जो इसे एक आधुनिक और बहुपयोगी डिजाइन बनाता था। निजाम ने इस उपहार के साथ महारानी एलिजाबेथ के नाम एक व्यक्तिगत पत्र भी भेजा था जिसमें उनके सुखी और समृद्ध वैवाहिक जीवन की शुभकामनाएं दी गई थीं। जब यह नेक्लेस लंदन के शाही खजाने में पहुँचा, तो वहां के कारीगर और शाही परिवार के सदस्य इसकी चमक, शुद्धता और कलात्मकता को देखकर हैरान रह गए क्योंकि उस समय भी इसकी कीमत करोड़ों रुपये आंकी गई थी, जो आज के समय में अरबों रुपये से भी कहीं अधिक मूल्यवान बन चुकी है।
ब्रिटिश शाही परिवार के बीच इस निजामी नेक्लेस को लेकर क्यों रही है हमेशा से इतनी दीवानगी?
क्वीन एलिजाबेथ द्वितीय को दुनिया भर के शाही परिवारों और राष्ट्राध्यक्षों से अनगिनत उपहार मिले थे, लेकिन उनके पूरे जीवनकाल में हैदराबाद के निजाम द्वारा दिया गया यह नेक्लेस उनका सबसे पसंदीदा और दिल के बेहद करीब रहने वाला आभूषण रहा है। महारानी एलिजाबेथ को कई ऐतिहासिक और राष्ट्रीय कार्यक्रमों, शाही पोर्ट्रेट्स और गाला डिनर के दौरान इसी नेक्लेस को बड़े गर्व के साथ पहने हुए देखा गया है, जो इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि उन्हें यह भारतीय कलाकृति कितनी पसंद थी। ब्रिटिश राजशाही की परंपरा के अनुसार, रानी अपने खास और चुनिंदा गहनों को ही सार्वजनिक मौकों पर पहनती थीं, और निजाम का यह हार उनकी प्राथमिक सूची में हमेशा सबसे ऊपर रहता था। इतना ही नहीं, आधुनिक दौर में भी जब ब्रिटिश शाही परिवार की नई पीढ़ियों की बात आती है, तो इस हार के प्रति उनका आकर्षण कभी कम नहीं हुआ। जानकारों का मानना है कि यह नेक्लेस केवल एक जड़ाऊ हार नहीं बल्कि भारत और ब्रिटेन के बीच के उस ऐतिहासिक और राजनीतिक अतीत का एक ऐसा जीवंत प्रतीक है जो दोनों देशों के बीच की पुरानी यादों को आज भी ताजा रखता है।
हैदराबाद के निजाम की अपार संपत्ति, उनकी दरियादिली और दुनिया भर में उनके रईसी के अनोखे किस्से क्या हैं?
हैदराबाद के अंतिम निजाम मीर उस्मान अली खान अपने समय में दुनिया के सबसे अमीर व्यक्ति थे, जिनकी कुल संपत्ति आज के अरबपतियों को भी पीछे छोड़ देती है। उनकी संपत्ति और खजाने की चर्चा उस समय दुनिया भर के अखबारों की सुर्खियां हुआ करती थी, और उनके पास सोने-चांदी के साथ-साथ दुनिया के सबसे बड़े और दुर्लभ हीरों का अकूत भंडार था। वे अपनी आय का एक बड़ा हिस्सा सार्वजनिक कार्यों, स्कूलों, अस्पतालों, सिंचाई परियोजनाओं और धार्मिक संस्थानों के निर्माण के दान के रूप में दिया करते थे, जिससे उनकी दरियादिली के किस्से इतिहास में अमर हो गए। जब भारत को आजादी मिली और रियासतों के विलय का दौर आया, तो भी निजाम ने देश की रक्षा कोष में बड़े पैमाने पर सोना दान करके अपनी देशभक्ति और उदारता का परिचय दिया था। क्वीन एलिजाबेथ को दिया गया यह 300 हीरों का नेक्लेस उसी बेमिसाल और ऐतिहासिक रईसी का एक छोटा सा हिस्सा था, जो आज भी भारत के पुराने शाही वैभव और उसकी बेजोड़ कारीगरी की गवाही पूरी दुनिया के सामने शान से दे रहा है।
आधुनिक समय में इस अनमोल निजामी हार का वर्तमान स्टेटस क्या है और इसका ऐतिहासिक महत्व क्यों है?
आज के समय में जब क्वीन एलिजाबेथ द्वितीय इस दुनिया में नहीं हैं, तब भी उनके खजाने में मौजूद हैदराबाद के निजाम का यह नेक्लेस ब्रिटिश शाही परिवार की सबसे मूल्यवान और सुरक्षित धरोहरों में शुमार है। शाही परंपराओं के अनुसार, इस तरह के ऐतिहासिक और व्यक्तिगत रूप से महत्वपूर्ण गहनों को ब्रिटिश राजशाही के मुख्य खजाने (Royal Collection) में पूरी सुरक्षा के साथ सहेज कर रखा जाता है ताकि आने वाली पीढ़ियां भी इस इतिहास से जुड़ी रहें। वर्तमान समय में ब्रिटेन के शाही परिवार की अन्य महिला सदस्य या रानियां भी कभी-कभार विशेष राजकीय आयोजनों में इस हार को पहनकर अपनी शाही परंपरा को आगे बढ़ाती नजर आती हैं। इतिहास के पन्नों में रुचि रखने वाले शोधकर्ताओं और पर्यटकों के लिए यह नेक्लेस हमेशा से एक बड़ा आकर्षण का केंद्र रहा है जो यह याद दिलाता है कि कभी भारतीय रियासतें अपनी भव्यता और समृद्धि के मामले में पूरी दुनिया में सिरमौर हुआ करती थीं। हैदराबाद के निजाम का यह तोहफा आज केवल एक आभूषण नहीं बल्कि भारत के गौरवशाली अतीत और अंतरराष्ट्रीय कूटनीति का एक ऐसा अनमोल दस्तावेज बन चुका है जिसकी चमक समय बीतने के साथ और अधिक तेज होती जा रही है।