नेतन्याहू और आइसेनकोट के पास बचे ये 5 सियासी विकल्प

नेतन्याहू और आइसेनकोट के पास बचे ये 5 सियासी विकल्प

इजराइल में आम चुनाव के नतीजों और शुरुआती रुझानों ने देश की राजनीति को एक बार फिर बड़े मोड़ पर लाकर खड़ा कर दिया है। 120 सीटों वाली नेसेट (Knesset) में सरकार बनाने के लिए आवश्यक 61 सीटों का जादुई आंकड़ा किसी भी गुट को आसानी से मिलता नहीं दिख रहा है, जिससे देश में त्रिशंकु संसद (Hung Parliament) जैसी स्थिति बन गई है। मौजूदा प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू (Likud Party) और विपक्षी गठबंधन का चेहरा बने पूर्व सेना प्रमुख गादी आइसेनकोट (Gadi Eisenkot) दोनों ही दावे ठोक रहे हैं, लेकिन स्पष्ट बहुमत न होने से चाबी अब छोटे दलों और निर्दलीय गुटों के हाथ में आ गई है। इस गंभीर राजनीतिक गतिरोध के बीच इजराइल की भावी सरकार को लेकर 5 मुख्य सियासी विकल्प उभरकर सामने आ रहे हैं।

1. विपक्षी गठबंधन की सरकार: आइसेनकोट का 61 सीटों का जादुई आंकड़ा जुटाने का प्रयास

विपक्षी दलों के नेता गादी आइसेनकोट ने चुनाव में बदलाव की लहर का दावा करते हुए नई सरकार बनाने की वकालत की है। यदि आइसेनकोट अपने साथ याशार (Yashar), यायर लापिड और नफ्ताली बेनेट की बी-याहाद (B'Yachad), एविगडोर लिबरमैन की यिसराइल बेतेनु और द डेमोक्रेट्स जैसे गैर-नेतन्याहू दलों को एक मंच पर लाते हैं, तो उन्हें सरकार बनाने का पहला मजबूत अवसर मिल सकता है। हालांकि, इस गुट के पास भी खुद की दम पर 61 सीटें पूरी करना एक कड़ी चुनौती बना हुआ है, जिसके लिए उन्हें अन्य छोटे और कट्टरपंथी राजनीतिक धड़ों से मान-मनौव्वल करनी होगी।

2. नेतन्याहू का पारंपरिक दक्षिणपंथी और धार्मिक दलों के साथ पुनर्गठन

लंबे समय तक इजराइल की सत्ता संभालने वाले बेंजामिन नेतन्याहू के पास अपनी लिकुड पार्टी को केंद्र में रखकर सरकार बनाने का विकल्प खुला हुआ है। नेतन्याहू अपने पुराने सहयोगियों—जैसे अल्ट्रा-ऑर्थोडॉक्स (शास और यूनाइटेड टोराह जुदेविज्म) तथा कट्टर-दक्षिणपंथी गुटों (इतामार बेन-गवीर और बेज़ालेल स्मोट्रिच की पार्टियां) को एकजुट करके बहुमत का आंकड़ा हासिल करने की फिराक में हैं। परंतु, यदि उनके इस गुट की कुल सीटें 61 से कम रह जाती हैं, तो नेतन्याहू के लिए दोबारा प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठना काफी मुश्किल साबित होगा।

3. अल्पसंख्यक सरकार: अरब दलों के बाहरी समर्थन से आइसेनकोट का दांव

इजराइली संसदीय प्रणाली के तहत सरकार बनाने के लिए हमेशा 61 सीटों के पूर्ण बहुमत की शर्त नहीं होती, बल्कि केवल संसद में विश्वास मत जीतना होता है। यदि आइसेनकोट के नेतृत्व वाला विपक्षी गठबंधन सबसे बड़ा गुट बनता है, तो वह एक 'माइनॉरिटी गवर्नमेंट' (अल्पसंख्यक सरकार) का गठन कर सकते हैं। इस स्थिति में 20 सीटों का बड़ा वोट बैंक रखने वाली अरब-नेतृत्व वाली पार्टियां (रा-आम और जॉइंट लिस्ट) सरकार का सीधे हिस्सा बने बिना बाहर से समर्थन या वोटिंग के दौरान अनुपस्थित (Abstain) रहकर आइसेनकोट को सत्ता में ला सकती हैं। हालांकि, इस तरह की सरकार के टिकाऊ होने पर हमेशा अनिश्चितता के बादल मंडराते रहेंगे।

4. नेशनल यूनिटी गवर्नमेंट: नेतन्याहू और आइसेनकोट के बीच पावर शेयरिंग डील

जब भी इजराइल में राजनीतिक गतिरोध गहराता है, तब राष्ट्रीय एकता सरकार (National Unity Government) का विचार सबसे प्रमुख विकल्प बनकर उभरता है। इस मॉडल के तहत नेतन्याहू की लिकुड और आइसेनकोट का मुख्य विपक्षी धड़ा एक साथ मिलकर सरकार बना सकते हैं। इसमें दोनों नेताओं के बीच प्रधानमंत्री पद के लिए रोटेशन डील (उदा. 2 साल नेतन्याहू और 2 साल आइसेनकोट) पर सहमति बन सकती है। हालांकि, चुनाव प्रचार के दौरान दोनों पक्षों द्वारा एक-दूसरे के खिलाफ किए गए तीखे हमलों के कारण इस गठबंधन की राह में वैचारिक और व्यक्तिगत मतभेद सबसे बड़ी रुकावट हैं।

5. फिर से चुनाव की नौबत: डेडलॉग न टूटने पर फिर मतदान के लिए जाएगी जनता

यदि राष्ट्रपति इसाक हर्ज़ोग (Isaac Herzog) द्वारा दी गई समय-सीमा में न तो नेतन्याहू और न ही आइसेनकोट 61 सीटों का समर्थन हासिल कर पाते हैं, तो इजराइल एक बार फिर भारी राजनीतिक संकट में फंस जाएगा। ऐसी स्थिति में संसद भंग हो जाएगी और देश को अगले कुछ महीनों में फिर से नए चुनाव कराने पड़ेंगे। जब तक नई सरकार का गठन नहीं हो जाता, तब तक बेंजामिन नेतन्याहू ही कार्यवाहक (Caretaker) प्रधानमंत्री के रूप में अपनी जिम्मेदारियां संभालते रहेंगे।