करवा चौथ व्रत कथा की प्राचीन कथा, सात भाईयों की बहन वीरवती की कहानी
सुहागिनों के सबसे बड़े और पवित्र पावन पर्व करवा चौथ (Karwa Chauth) का भारतीय संस्कृति और दांपत्य जीवन में एक अत्यंत विशिष्ट स्थान है। कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को मनाया जाने वाला यह व्रत हर सुहागन महिला के लिए उसके पति की लंबी उम्र, अखंड सौभाग्य, अच्छे स्वास्थ्य और उज्ज्वल भविष्य की कामना का प्रतीक होता है। इस दिन महिलाएं पूरे दिन निर्जला उपवास रखती हैं और रात के समय चंद्रमा को अर्घ्य देने के बाद ही अपना व्रत खोलती हैं। इस व्रत की पूजा-अर्चना तब तक अधूरी मानी जाती है जब तक इसकी प्राचीन और पावन कथा का श्रवण या पठन न किया जाए। हर साल इस व्रत के दौरान सुनाई जाने वाली 'वीरवती और सात भाइयों की कहानी' हमें न केवल प्रेम और अटूट विश्वास का पाठ पढ़ाती है, बल्कि यह भी सिखाती है कि धर्म और परंपराओं का पालन कितनी सच्ची निष्ठा के साथ किया जाना चाहिए। आइए विस्तार से जानते हैं करवा चौथ से जुड़ी इस पौराणिक और प्राचीन कथा के हर एक अनछुए पहलू को।
करवा चौथ व्रत की प्राचीन पौराणिक कथा और सात भाइयों की इकलौती लाड़ली बहन वीरवती
पौराणिक कथाओं के अनुसार, प्राचीन काल में एक साहूकार के घर में सात वीर और प्रतापी भाई थे और उनकी एक इकलौती लाड़ली बहन थी, जिसका नाम वीरवती था। अपने सातों भाइयों और माता-पिता की बहुत लाड़ली होने के कारण वीरवती का विवाह अत्यंत धूमधाम से एक योग्य और संभ्रांत राजा के साथ संपन्न हुआ था। विवाह के कुछ समय बाद जब कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि आई, तो रानी वीरवती ने अपने मायके में रहकर ही विधि-विधान के साथ अपने पहले करवा चौथ का निर्जला व्रत रखा। सुबह से ही वीरवती ने बिना अन्न और जल ग्रहण किए अत्यंत कठिन उपवास शुरू किया। दिन ढलते-ढलते महल और मायके के सभी लोग उसके स्वास्थ्य को लेकर चिंतित होने लगे क्योंकि वीरवती स्वभाव से बेहद सुकुमार और कोमल थी। उसके सातों भाई अपनी बहन से अथाह प्रेम करते थे और उससे अपनी यह भूख-प्यास सहन नहीं हो रही थी, यह बात भाइयों से देखी नहीं जा रही थी।
भाइयों का प्रेम और एक बड़ी भूल: चंद्रोदय से पहले ही कृत्रिम चांद दिखाकर व्रत तुड़वाना
जब शाम का समय नजदीक आया और रात होने में अभी काफी समय बाकी था, तो वीरवती के सातों भाई अपनी बहन के पास पहुंचे और उससे आग्रह किया कि वह कुछ खा-पी ले क्योंकि उसका कमजोर शरीर अब उपवास की कठिनाई सहन नहीं कर पा रहा है। लेकिन वीरवती ने अपने दृढ़ संकल्प का परिचय देते हुए साफ इंकार कर दिया और कहा कि आज करवा चौथ का व्रत है और वह चंद्रमा को अर्घ्य देने के बाद ही जल ग्रहण करेगी। भाइयों ने अपनी बहन की इस दशा को देखने के बाद एक अनूठी और बड़ी भूल भरी युक्ति निकाली। उन्होंने गांव के बाहर पीपल के एक घने पेड़ की आड़ में एक बड़ी छलनी जलाई और उसके आगे रोशनी का एक ऐसा पर्दा कर दिया जिससे दूर से देखने पर ऐसा आभास होने लगा मानो आकाश में वास्तविक चंद्रोदय हो गया हो। भाइयों ने अपनी बहन को दौड़कर बुलाया और कहा, "देखो वीरवती, चंद्रमा निकल आया है, अब तुम अर्घ्य देकर अपना व्रत खोल सकती हो।"
व्रत खंडित होने का भयंकर परिणाम: पति की अचानक गंभीर तबीयत और राजा की अचेत अवस्था
अपनी सगी भाइयों की बातों पर अटूट विश्वास करते हुए भोली-भाली वीरवती ने बिना किसी संशय के उस कृत्रिम चंद्रमा को अर्क दिया और हर्षोल्लास के साथ भोजन ग्रहण कर लिया। लेकिन जैसे ही उसका व्रत खंडित हुआ, वैसे ही प्रकृति के नियम के विरुद्ध किए गए इस कृत्य का भयंकर दुष्परिणाम सामने आ गया। भोजन का एक ग्रास मुंह में लेते ही उसके पास एक भयानक मनहूसियत भरी खबर पहुंची कि उसके पति की तबियत अचानक अत्यधिक बिगड़ गई है और वे अचेत अवस्था में गिर पड़े हैं। जब तक वीरवती बदहवास होकर अपने ससुराल पहुंचती, तब तक उसके पति की सांसें थम चुकी थीं और उनका मृत शरीर सामने रखा हुआ था। इस दुखद और आकास्मिक घटना से पूरे राज्य में शोक की लहर दौड़ गई और वीरवती का सुहाग उजड़ गया।
वीरवती का कठिन विलाप, माता करवा की प्रकट होती शक्ति और अखंड सौभाग्य का वरदान
अपने पति की अकाल मृत्यु से पूरी तरह टूट चुकी वीरवती ने शव के पास बैठकर विलाप करना शुरू कर दिया और भगवान से अपनी भूल की क्षमा मांगने लगी। उसके इस निश्छल प्रेम, करुण पुकार और पश्चाताप को देखकर स्वर्ग से माता करवा (चौथी माता) प्रत्यक्ष रूप से प्रकट हुईं। माता ने वीरवती को सांत्वना देते हुए कहा, "हे पुत्री! तुमने अपने भाइयों के बहकावे में आकर चंद्रोदय से पहले ही छलनी की ओट से कृत्रिम चांद देखकर अपना निर्जला व्रत तोड़ लिया था, जिसके कारण गणेश जी और चंद्रमा के कोप से तुम्हारे पति के प्राण चले गए। यदि तुम पूरे साल विधि-विधान से हर महीने आने वाली संकष्टी चतुर्थी का व्रत और इस करवा चौथ के व्रत को पूर्ण निष्ठा से दोबारा करोगी, तो तुम्हारे पति को पुनर्जीवन प्राप्त होगा और तुम्हें कभी वैधव्य का सामना नहीं करना पड़ेगा।" वीरवती ने माता के वचनों को गांठ बांध लिया और साल भर तक हर नियम का पालन करते हुए पुनः पूरे समर्पण के साथ करवा चौथ का व्रत रखा। उसकी इस अटूट तपस्या और धर्मनिष्ठा से प्रसन्न होकर माता करवा ने उसके पति को पुनर्जीवन प्रदान किया और तब से ही यह प्राचीन व्रत सनातन धर्म में सुहागिनों के लिए अखंड सौभाग्य का सबसे बड़ा विधान बन गया।