मध्यावधि चुनावों से ठीक पहले नस्लवादी विवाद में घिरी ट्रंप सरकार, भारतीय वोटर्स खिसकने के डर से हटाया गया कंट्रोवर्शियल एड

मध्यावधि चुनावों से ठीक पहले नस्लवादी विवाद में घिरी ट्रंप सरकार, भारतीय वोटर्स खिसकने के डर से हटाया गया कंट्रोवर्शियल एड

अमेरिकी राजनीतिक गलियारों और प्रवासी समुदायों के बीच इन दिनों एक ऐसा विज्ञापन भारी भूचाल लेकर आया है, जिसने सत्ताधारी डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन को अपने कदम पीछे खींचने पर मजबूर कर दिया है। अमेरिका में आगामी मध्यावधि चुनावों (Midterm Elections) की सुगबुगाहट के बीच होमलैंड सिक्योरिटी डिपार्टमेंट यानी गृह सुरक्षा विभाग द्वारा सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'एक्स' पर जारी किया गया एक विवादित विज्ञापन अमेरिकी राजनीति के केंद्र में आ गया है। इस विज्ञापन में 'मिस्टर सिंह' नाम के एक सिख पात्र को आधार बनाकर बिना लाइसेंस वाले वाणिज्यिक चालकों के खिलाफ सख्त अभियान चलाया जा रहा था और उसे स्वेच्छा से देश छोड़ने का संदेश दिया जा रहा था। एआई (AI) तकनीक की मदद से तैयार की गई इस तस्वीर और उसके साथ लिखे गए आपत्तिजनक कैप्शन को लेकर मानवाधिकार समूहों, सिख संगठनों और विभिन्न अमेरिकी-भारतीय समुदायों की तरफ से तीखी प्रतिक्रियाएं सामने आईं। चौतरफा आलोचनाओं से घिरने और चुनावी मौसम में भारतीय मूल के मतदाताओं की नाराजगी का कड़ा जोखिम भांपते हुए आखिरकार ट्रंप प्रशासन को झुकना पड़ा और विवाद बढ़ने के बाद उस नस्लवादी विज्ञापन को सोशल मीडिया से तुरंत हटा लिया गया। इस घटना ने एक बार फिर अमेरिकी राजनीति में प्रवासियों की भूमिका और उनके चुनावी महत्व को उजागर कर दिया है।

एआई से तैयार 'मिस्टर सिंह' विज्ञापन पर मचा बवाल और मानवाधिकार संगठनों का तीखा विरोध

पूरा विवाद तब शुरू हुआ जब अमेरिकी गृह सुरक्षा विभाग (DHS) ने अपने 'सीबीपी होम' कार्यक्रम के व्यापक प्रचार अभियान के तहत सोशल मीडिया पर एआई जनित तस्वीरों का एक विज्ञापन साझा किया। इस विज्ञापन में एक सिख समुदाय के व्यक्ति को ट्रक चलाते हुए दर्शाया गया था, जिसके साथ अपमानजनक लहजे में लिखा गया था कि 'हमारी सड़कों से दफा हो जाओ, मिस्टर सिंह, आपको वाहन चलाना नहीं आता।' इस विज्ञापन के सामने आते ही अमेरिकी समाज के उदारवादी तबके और विभिन्न मानवाधिकार संगठनों ने इसे खुले तौर पर नस्लवादी, भेदभावपूर्ण और अमेरिका-विरोधी करार दिया। सिख संगठनों और नागरिक अधिकारों के लिए लड़ने वाले समूहों का कहना था कि अमेरिका में लाखों की संख्या में सिख नागरिक निवास करते हैं, जिनके उपनाम में 'सिंह' जुड़ा होता है, जिसका शाब्दिक अर्थ 'शेर' होता है। संगठनों ने कड़ा ऐतराज जताते हुए कहा कि सिख समुदाय अपनी अनूठी पहचान, पगड़ी और संस्कृति पर गर्व करता है, और यदि देश की अपनी संघीय एजेंसियां ही एक विशेष समुदाय को निशाना बनाकर उनका उपहास उड़ाएंगी, तो इससे समाज में नफरत और विभाजन को बढ़ावा मिलेगा। हिंदू अमेरिकन फाउंडेशन (HAF) ने इस मामले पर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए सोशल मीडिया पर लिखा कि 'सिंह' केवल एक नाम नहीं है, बल्कि इस देश में रहने वाले हिंदू, सिख और तमाम अमेरिकी नागरिक गर्व से गाड़ी चलाते हैं और देश के विकास में योगदान देते हैं। फाउंडेशन ने इस मामले की उच्च स्तरीय संघीय जांच की मांग करते हुए प्रशासन के रवैये की कड़ी निंदा की।

मध्यावधि चुनावों के मुहाने पर खड़े ट्रंप प्रशासन को सता रहा भारतीय वोटर्स के खिसकने का डर

अमेरिकी राजनीति के विश्लेषकों का मानना है कि इस विवादित विज्ञापन को आनन-फानन में हटाए जाने के पीछे विशुद्ध रूप से राजनीतिक दूरदर्शिता और आगामी मध्यावधि चुनावों का डर काम कर रहा है। अमेरिका में जल्द ही मध्यावधि चुनाव होने वाले हैं, और वहां की राजनीतिक पार्टियों के लिए हर एक मतदाता समूह का समर्थन बेहद कीमती है। हालिया चुनावी सर्वेक्षणों और आंकड़ों पर नजर डालें तो अमेरिका में रहने वाले एशियाई-अमेरिकी और विशेष तौर पर भारतीय मूल के मतदाताओं का पारंपरिक झुकाव काफी हद तक डेमोक्रेटिक पार्टी की ओर रहा है। हाल ही में किए गए एक प्रतिष्ठित सर्वे के अनुसार, पंजीकृत एशियाई-अमेरिकी और एएपीआई (AAPI) मतदाताओं में से 90 प्रतिशत से अधिक लोगों ने इस बार मतदान प्रक्रिया में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेने की इच्छा जताई है। हालांकि सर्वे में यह बात भी सामने आई थी कि रिपब्लिकन और डेमोक्रेट्स दोनों ही दलों ने इन मतदाताओं तक पूरी तरह से पहुंच नहीं बनाई है, लेकिन जब बात वोटिंग पैटर्न की आती है, तो भारतीय-अमेरिकी मतदाताओं में से लगभग 66 प्रतिशत लोगों ने यह स्पष्ट किया है कि वे प्रतिनिधि सभा और सीनेट दोनों के चुनावों में डेमोक्रेटिक पार्टी के उम्मीदवारों के पक्ष में अपना मतदान करेंगे। ऐसे संवेदनशील समय में जब भारतीय मूल का समुदाय अमेरिकी अर्थव्यवस्था और तकनीक के क्षेत्र में एक शक्तिशाली स्तंभ बन चुका है, गृह सुरक्षा विभाग द्वारा इस प्रकार का नस्लीय विज्ञापन जारी किया जाना ट्रंप सरकार के लिए एक बड़ा राजनीतिक आत्मघाती कदम साबित हो सकता था। इसी बड़े खतरे को भांपते हुए व्हाइट हाउस ने डैमेज कंट्रोल करते हुए उस विज्ञापन को फौरन डिलीट करवा दिया।

सिख संगठनों और संघों का कड़ा रुख, फेडरल एजेंसियों की कार्यप्रणाली पर उठे गंभीर सवाल

इस पूरे घटनाक्रम के दौरान अमेरिका के प्रभावशाली सिख संगठनों ने एकजुट होकर अपनी आवाज बुलंद की और प्रशासनिक मशीनरी के नस्लीय रवैये को बेनकाब किया। 'सिख कोएलिशन' ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर अपनी तीखी प्रतिक्रिया देते हुए याद दिलाया कि ऐतिहासिक 9/11 की घटना के 25 साल बीत जाने के बाद भी आज के आधुनिक अमेरिका में सिखों को उनके विशिष्ट पहनावे, दाढ़ी और रूप-रंग के आधार पर निशाना बनाए जाने की प्रवृत्ति पूरी तरह से अस्वीकार्य है। इसके अलावा, हिंदू अमेरिकन फाउंडेशन ने इस भेदभावपूर्ण पोस्ट के खिलाफ देश भर के नागरिकों को एक साथ खड़े होने का आह्वान किया और इस मामले में देश की शीर्ष हस्तियों जैसे सहायक अटॉर्नी जनरल हरमीत के. ढिल्लों और एफबीआई निदेशक काश पटेल को टैग करते हुए इस बात पर जोर दिया कि यह केवल किसी साधारण कर्मचारी की गलती नहीं है, बल्कि एक संघीय एजेंसी की ओर से की गई सोची-समझी राजनीतिक संदेशबाजी और भेदभाव का गंभीर मामला है, जिसकी गहराई से जांच होनी चाहिए। गृह सुरक्षा विभाग अपने जिस 'सीबीपी होम' कार्यक्रम का प्रचार कर रहा था, उसका उद्देश्य असल में उन प्रवासियों को स्वेच्छा से देश छोड़ने के लिए प्रोत्साहित करना था जिनके पास वैध दस्तावेज नहीं हैं, और इसके लिए स्वैच्छिक पंजीकरण कराने वालों को यात्रा सहायता के साथ-साथ 2,600 अमेरिकी डॉलर की प्रोत्साहन राशि देने का प्रावधान भी किया गया था। लेकिन उस अभियान के प्रचार के लिए जिस भद्दे और नस्लीय तरीके का इस्तेमाल किया गया, उसने पूरी योजना की नीयत पर ही पानी फेर दिया और प्रशासनिक अधिकारियों की संकीर्ण मानसिकता को उजागर कर दिया।

चुनावी समीकरणों पर पड़ता असर और अमेरिका की बहुसांस्कृतिक पहचान की रक्षा

राजनीतिक जानकारों का यह भी मानना है कि अमेरिका जैसे बहुसांस्कृतिक देश में जहां दुनिया भर के विभिन्न संस्कृतियों और धर्मों के लोग एक साथ मिलकर देश के निर्माण में अपना योगदान देते हैं, वहां इस तरह की नीतियां या विज्ञापन समाज में ध्रुवीकरण को बढ़ावा देते हैं। ट्रंप प्रशासन के शुरुआती दौर से ही आव्रजन नीतियों को लेकर कड़ा रुख रहा है, और अवैध प्रवासियों पर लगाम कसना उनकी प्राथमिकताओं में शामिल रहा है, लेकिन उस नीति को लागू करने के लिए किसी एक धार्मिक या सांस्कृतिक पहचान को निशाना बनाना प्रशासनिक विफलता को दर्शाता है। जब सोशल मीडिया पर इस विज्ञापन के खिलाफ विरोध के स्वर तेज हुए और डेमोक्रेटिक पार्टी के नेताओं ने इसे एक बड़ा चुनावी मुद्दा बनाना शुरू किया, तब जाकर रिपब्लिकन नेतृत्व को अपनी गलती का अहसास हुआ। अमेरिका में प्रवासी भारतीय और एशियाई समुदाय अब केवल एक छोटा समूह नहीं रह गया है, बल्कि अमेरिकी राजनीति, वित्त, स्वास्थ्य सेवाओं और तकनीकी क्षेत्रों के सर्वोच्च पदों पर उनकी मजबूत पकड़ है। वे हर चुनाव में एक निर्णायक भूमिका निभाते हैं। यही वजह है कि जब बात उनके सम्मान और पहचान पर आई, तो प्रशासन को तुरंत बैकफुट पर आना पड़ा। इस पूरे घटनाक्रम ने यह साबित कर दिया है कि वैचारिक और राजनीतिक लड़ाइयों के बीच अब अमेरिकी मतदाता अपनी गरिमा और अधिकारों को लेकर बेहद जागरूक हो चुके हैं, और कोई भी सरकार जनभावनाओं की कीमत पर अपनी मनमानी नहीं चला सकती है।