अमेरिकी एआई कंपनी एंथ्रोपिक के क्लाउड मॉडल से मिसाइल और गाइडेड रॉकेट बना रहे ईरान के दोस्त हूती विद्रोही

अमेरिकी एआई कंपनी एंथ्रोपिक के क्लाउड मॉडल से मिसाइल और गाइडेड रॉकेट बना रहे ईरान के दोस्त हूती विद्रोही

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी एआई की दुनिया में अमेरिका अपने तकनीकी वर्चस्व और सुरक्षा मानकों का दम भरता आया है, लेकिन हाल ही में सामने आई एक रिपोर्ट ने अमेरिकी खुफिया और तकनीकी गलियारों में हड़कंप मचा दिया है। दुनिया की दिग्गज अमेरिकी एआई कंपनियों में शुमार 'एंथ्रोपिक' (Anthropic) की एक चौंकाने वाली रिपोर्ट ने इस बात का पर्दाफाश किया है कि यमन में सक्रिय ईरान समर्थित हूती विद्रोही अमेरिका में बने आधुनिक एआई मॉडल का इस्तेमाल खतरनाक हथियार और मिसाइलें बनाने के लिए कर रहे हैं। रिपोर्ट के अनुसार, हूतियों की एक गुप्त हथियार इंजीनियरिंग सेल ने एंथ्रोपिक के लोकप्रिय एआई मॉडल 'क्लाउड' (Claude) का उपयोग करके लंबी दूरी की मिसाइलों और गाइडेड रॉकेट के लिए उन्नत गाइडेंस सॉफ्टवेयर विकसित करने का काम किया है। अमेरिका के अपने ही अत्याधुनिक सॉफ्टवेयर का इस्तेमाल उसके कट्टर विरोधियों द्वारा हथियार निर्माण में किए जाने की इस घटना ने तकनीकी जगत में सुरक्षा और दुरुपयोग के खतरों को लेकर एक नई बहस छेड़ दी है, जिससे पूरी दुनिया में यह सवाल उठने लगा है कि क्या एआई तकनीक अब आतंकवादियों और विद्रोही संगठनों के हाथ का खिलौना बनती जा रही है।

एंथ्रोपिक की रिपोर्ट का बड़ा खुलासा: क्लाउड एआई से बना मिसाइल सॉफ्टवेयर

प्रसिद्ध एआई कंपनी एंथ्रोपिक द्वारा गुरुवार को जारी की गई अपनी एक विस्तृत जांच रिपोर्ट में यह सनसनीखेज दावा किया गया है कि उसने चीन, रूस और यमन में चल रहे ऐसे छह बड़े ऑपरेशनों को समय रहते बाधित किया है, जहां उसके 'क्लाउड' मॉडल का गलत इस्तेमाल पारंपरिक हथियारों के विकास, खुफिया जानकारी जुटाने और सैन्य हार्डवेयर की खरीद के लिए किया जा रहा था। रिपोर्ट के मुताबिक, यमन के युद्धग्रस्त इलाके में सक्रिय हूतियों की एक तकनीकी सेल ने क्लाउड का इस्तेमाल मानव सॉफ्टवेयर इंजीनियरों के विकल्प के रूप में किया। इस समूह ने उड़ने वाले सैन्य वाहनों और मिसाइलों के लिए गाइडेंस, नेविगेशन और कंट्रोल सॉफ्टवेयर को डिजाइन करने में एआई की मदद ली। एआई का यह दुरुपयोग इस बात का प्रमाण है कि कैसे जटिल प्रोग्रामिंग और कोडिंग की जो क्षमता पहले केवल उच्च प्रशिक्षित इंजीनियरों के पास होती थी, उसे अब अत्याधुनिक एआई टूल्स की मदद से बेहद आसानी से हासिल किया जा रहा है। हूती विद्रोही, जिन्हें ईरान से हर प्रकार की सामरिक और कूटनीतिक सहायता मिलती रही है, इस तकनीक का उपयोग करके अपनी सैन्य मारक क्षमता को कई गुना बढ़ाने की फिराक में थे, ताकि वे लाल सागर और खाड़ी देशों में अपने रणनीतिक प्रभुत्व को और अधिक मजबूत कर सकें।

2000 किलोमीटर से अधिक रेंज वाली बैलिस्टिक मिसाइल और हाइपरसोनिक तकनीक पर काम

एंथ्रोपिक की इस चौंकाने वाली जांच रिपोर्ट में यह भी सामने आया है कि यमन में सक्रिय इस हूती हथियार सेल का दायरा कितना बड़ा और खतरनाक था। यह समूह केवल छोटे-मोटे हथियारों तक सीमित नहीं था, बल्कि यह कई अत्यंत जटिल मिसाइल कार्यक्रमों पर एक साथ काम कर रहा था। इनमें एक मल्टी-स्टेज बैलिस्टिक मिसाइल भी शामिल थी, जिसकी लक्षित मारक क्षमता या रेंज 2,000 किलोमीटर से अधिक आंकी गई थी। इसके अतिरिक्त, यह समूह एक अन्य उन्नत मिसाइल प्रणाली पर भी शोध कर रहा था, जिसे 'R2000' सेट के नाम से जाना जाता है, और इसमें अत्याधुनिक हाइपरसोनिक ग्लाइड व्हीकल का एक विशेष वेरिएंट भी शामिल था। हालांकि, एंथ्रोपिक ने अपनी रिपोर्ट में यह स्पष्ट किया है कि भले ही इस समूह ने एआई की मदद से डिजाइनिंग और कोडिंग का काम तेजी से किया हो, लेकिन कंपनी को ऐसा कोई ठोस सबूत नहीं मिला है कि इस सेल ने इन डिज़ाइनों के आधार पर सफलतापूर्वक कोई पूरी तरह से ऑपरेशनल और विनाशकारी हथियार मैदान में उतार लिया हो। इसके बावजूद, इतनी लंबी रेंज की मिसाइल प्रणालियों और हाइपरसोनिक तकनीक के विकास में एआई का यह उपयोग इस बात की ओर साफ इशारा करता है कि पारंपरिक युद्धक तकनीक अब किस तेजी से गैर-राज्य अभिनेताओं (Non-state actors) के हाथों तक पहुंचने का प्रयास कर रही है।

एआई की सुरक्षा व्यवस्था को चकमा देने की शातिर तकनीक और कोडिंग का अनूठा तरीका

हूती विद्रोहियों की इस तकनीकी सेल ने अमेरिकी कंपनी के एआई मॉडल से काम निकलवाने के लिए बेहद शातिर और सुनियोजित तरीके अपनाए। रिपोर्ट के अनुसार, इस समूह ने एंथ्रोपिक की सुरक्षा प्रणालियों (Safety Guardrails) और फिल्टर को बार-बार चकमा देने की कोशिश की। उन्होंने अपने खतरनाक इरादों और हथियारों के विकास के असली उद्देश्य को पूरी तरह से छिपाकर रखा। अपनी बातचीत और प्रॉम्प्ट्स को कई अलग-अलग छोटे सत्रों (Sessions) में बांटा ताकि किसी भी एक सिंगल चैट से उनके पूरे हथियार कार्यक्रम की मंशा स्पष्ट रूप से सामने न आ सके। हालांकि एंथ्रोपिक की सुरक्षा व्यवस्था ने इनमें से कई संदिग्ध अनुरोधों को बीच में ही ब्लॉक कर दिया, लेकिन इसके बावजूद वे कई सुरक्षा दीवारों को पार करने में सफल रहे। हैरानी की बात यह है कि यह समूह एक साथ 'क्लाउड' के कई अलग-अलग इंस्टेंस का इस्तेमाल कर रहा था, जिन्हें अलग-अलग जिम्मेदारियां सौंपी गई थीं। उदाहरण के लिए, एक इंस्टेंस का उपयोग मुख्य कोडिंग लिखने के लिए किया जाता था, दूसरे का तकनीकी रिसर्च के लिए, और तीसरे का पहले इंस्टेंस द्वारा तैयार किए गए कोड की सटीकता की समीक्षा करने के लिए किया जाता था। इस तरह वे एआई को ही अपना वर्चुअल सॉफ्टवेयर इंजीनियर बनाकर अपनी कमियों को दूर कर रहे थे।

गाइडेड रॉकेट का विफल परीक्षण और एंथ्रोपिक द्वारा की गई सख्त कार्रवाई

जांच में यह भी खुलासा हुआ कि इस हूती सेल ने एआई की मदद से तैयार किए गए साजो-सामान के आधार पर एक गाइडेड रॉकेट का प्रायोगिक परीक्षण (Test) भी किया था, हालांकि वह परीक्षण सफल होता हुआ दिखाई नहीं दिया और असफल हो गया। तकनीक और विज्ञान की दुनिया की विडंबना देखिए कि उस परीक्षण के विफल होने के कुछ ही घंटों बाद, वह समूह दोबारा एंथ्रोपिक के 'क्लाउड' मॉडल के पास पहुंचा और उससे यह पता लगाने की कोशिश की कि आखिर उनके द्वारा किए गए प्रयोग में तकनीकी रूप से क्या गलती रह गई थी, जिसके कारण रॉकेट फेल हो गया। जैसे ही एंथ्रोपिक को अपनी प्रणाली के इस तरह के खतरनाक और अनधिकृत इस्तेमाल की भनक लगी, कंपनी ने तुरंत त्वरित कार्रवाई करते हुए इस ऑपरेशन से जुड़े सभी यूजर अकाउंट्स को हमेशा के लिए प्रतिबंधित (Ban) कर दिया। इसके साथ ही, कंपनी ने इस पूरी घटना से जुड़ी संवेदनशील तकनीकी जानकारियां और डिजिटल सबूत तुरंत सार्वजनिक और निजी क्षेत्र के अपने सुरक्षा साझेदारों के साथ साझा किए। कंपनी की आंतरिक जांच में यह भी पता चला कि इस समूह ने अपने पास पहले से ही एक ऐसा ऑफलाइन सिमुलेशन टूलकिट भी तैयार कर रखा था, जो क्लाउड या अन्य इंजीनियरिंग सॉफ्टवेयर जैसे कि एम MATLAB पर पूरी तरह निर्भर नहीं था, जिससे यह साबित होता है कि वे अपनी तकनीक को स्वतंत्र रूप से भी विकसित करने की क्षमता जुटा रहे थे।

हथियारों के विकास से आगे जैविक अनुसंधान और भविष्य के गंभीर खतरे

यह पूरा मामला केवल पारंपरिक मिसाइलों और हथियारों के विकास तक ही सीमित नहीं है, बल्कि एंथ्रोपिक ने अपनी इस व्यापक जांच के दौरान संभावित रूप से खतरनाक और संवेदनशील जैविक अनुसंधान (Biological Research) से जुड़े कई अन्य मामलों की भी गंभीर पहचान की है। कंपनी की सुरक्षा टीमों ने पाया कि इसी अवधि के दौरान बर्ड फ्लू, चिकनगुनिया, ऑर्थोपॉक्सवायरस और विभिन्न प्रकार के घातक टॉक्सिन से संबंधित गतिविधियों पर भी एआई के माध्यम से शोध करने के प्रयास किए गए थे। कंपनी ने महज 30 दिनों की एक छोटी अवधि में ऐसे करीब 35 अलग-अलग शोध प्रयासों की पहचान की, जो संभावित रूप से वैश्विक जैव-सुरक्षा के लिए चिंता का विषय बन सकते थे। हालांकि, एंथ्रोपिक ने यह स्पष्ट किया कि वह यह पूरी तरह से निश्चित नहीं कर सकी कि इन मामलों में शामिल लोगों का उद्देश्य स्पष्ट रूप से कोई जैविक नुकसान पहुंचाना था या वे किसी वैध चिकित्सा वैज्ञानिक शोध का हिस्सा थे। फिर भी, एक मामले में चिकनगुनिया वायरस की संक्रमण क्षमता और मानव इम्यून सिस्टम से बचने की उसकी ताकत पर 'गेन-ऑफ-फंक्शन' रिसर्च के लिए ग्रांट आवेदन तैयार करने में मदद ली जा रही थी, तो दूसरे मामले में यह अध्ययन किया जा रहा था कि बर्ड फ्लू वायरस स्तनधारियों के शरीर के अनुकूल कैसे ढलते हैं। इन तमाम घटनाओं ने यह साबित कर दिया है कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की अभूतपूर्व ताकत जहां एक तरफ मानवता के लिए वरदान साबित हो रही है, वहीं दूसरी तरफ इसका गलत हाथों में पड़ना दुनिया की सबसे बड़ी सुरक्षा चुनौती बनता जा रहा है, जिससे निपटने के लिए वैश्विक स्तर पर सख्त और अचूक नियमों की बेहद सख्त जरूरत है।