भूटान के गेलेफू में 108 पवित्र स्तूपों के निर्माण से गूंजी वादियां, ऐतिहासिक समारोह में भारत का प्रतिनिधित्व करने पहुंचे केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू

भूटान के गेलेफू में 108 पवित्र स्तूपों के निर्माण से गूंजी वादियां, ऐतिहासिक समारोह में भारत का प्रतिनिधित्व करने पहुंचे केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू

एशियाई कूटनीति, आध्यात्मिक जुड़ाव और बौद्ध संस्कृति के इतिहास में इस वक्त एक बेहद पवित्र, भव्य और ऐतिहासिक पल सामने आ रहा है। भारत के पड़ोसी और मित्र देश भूटान में बौद्ध परंपरा से जुड़ा एक बेहद अद्भुत और महात्वाकांक्षी आयोजन शुरू हो चुका है। भूटान के उभरते और रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण शहर गेलेफू माइंडफुलनेस सिटी (Glephu Mindfulness City) में एक साथ 108 जंगचूब चोर्टेन (पवित्र स्तूपों) के निर्माण का ऐतिहासिक कार्य रविवार से आधिकारिक रूप से आरंभ हो गया है। इस अत्यंत पावन और आध्यात्मिक अनुष्ठान में भारत सरकार की ओर से आधिकारिक रूप से प्रतिनिधित्व करने के लिए केंद्रीय संसदीय कार्य और अल्पसंख्यक कार्य मंत्री किरेन रिजिजू (Kiren Rijiju) विशेष रूप से भूटान पहुंचे हैं। पारंपरिक तुरहियों की गूंज, बौद्ध मंत्रों के उच्चारण और सांस्कृतिक गरिमा के साथ शुरू हुआ यह आयोजन न केवल दोनों देशों के बीच के प्रगाढ़ संबंधों को दर्शाता है, बल्कि वैश्विक स्तर पर बौद्ध धर्म की आध्यात्मिक चेतना को भी एक नई ऊर्जा प्रदान कर रहा है। आइए विस्तार से जानते हैं कि भूटान के इस महान आयोजन की खासियत क्या है और इसमें किरेन रिजिजू की क्या भूमिका रही है।

पारंपरिक तुरहियों की गूंज और 'ओम मणि पद्मे हुम' के महामंत्र के साथ हुआ शुभारंभ

भूटान में आयोजित हो रहे इस ऐतिहासिक समारोह की शुरुआत बेहद अनूठे और पारंपरिक तरीके से की गई है। गेलेफू में आयोजित इस भव्य अनुष्ठान की शुरुआत 58 पारंपरिक तुरहियों (ट्रम्पेट्स) की सुरीली और गूंजती हुई आवाज के साथ हुई, जिन्हें तिब्बती बौद्ध परंपरा में देवताओं और सकारात्मक ऊर्जा के आह्वान के लिए बजाया जाता है। इन पवित्र वाद्यों की गूंज के साथ ही वहां मौजूद सभी लामाओं, संतों और गणमान्य लोगों ने सामूहिक रूप से बौद्ध धर्म के सबसे प्रसिद्ध और शक्तिशाली मंत्र 'ओम मणि पद्मे हुम' का जाप किया।

इस मंत्र का गूंजना पूरे वातावरण को पूरी तरह से आध्यात्मिक और शांत ऊर्जा से भर देता है। इस समारोह में भारत की ओर से नेतृत्व कर रहे केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू ने इस पल को अपने जीवन का एक अत्यंत गौरवशाली और ऐतिहासिक क्षण बताया है। पारो अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर उतरने के बाद भूटान के प्रधानमंत्री महामहिम दाशो शेरिंग तोबगे (Dasho Tshering Tobgay) और विदेश मंत्री ल्योंपो डी. एन. ढुंगेल ने किरेन रिजिजू का बेहद गर्मजोशी के साथ स्वागत किया। यहाँ तक कि जब रिजिजू समारोह के स्थल गेलेफू की तरफ रवाना हो रहे थे, तब भूटान के प्रधानमंत्री ने खुद गाड़ी ड्राइव करके एक अनूठा और आत्मीय उदाहरण पेश किया, जिस पर भारतीय मंत्री ने गहरा सम्मान व्यक्त किया।

एक ही स्थान पर 108 स्तूपों की स्थापना, बन सकता है गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड

भूटान के इस सबसे बड़े और आध्यात्मिक आयोजनों में से एक में, दुनिया में पहली बार एक ही स्थान पर एक साथ 108 पवित्र स्तूपों (जंगचूब चोर्टेन) की स्थापना की जा रही है और उनके पूर्ण अभिषेक की प्रक्रिया पूरी की जाएगी। इस आयोजन के भव्य पैमाने को देखते हुए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर यह चर्चा तेज हो गई है कि यह अनूठा अनुष्ठान अपने आप में एक गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड (Guinness World Record) भी दर्ज करा सकता है।

भूटान के आधिकारिक राज्य मठ निकाय यानी 'सेंट्रल मोनास्टिक बॉडी' के प्रधान सचिव चोटेन दोरजी ने इस पूरी प्रक्रिया की महत्ता पर प्रकाश डालते हुए बताया कि यह वज्रयान (Vajrayana) बौद्ध धर्म का एक बेहद पवित्र और गूढ़ समारोह है। इसे स्वयं भगवान बुद्ध के जागृत होने और उनकी करुणा के विस्तार के रूप में देखा जाता है। बौद्ध दर्शन के अनुसार, किसी भी साधारण वास्तुकला के स्मारक को एक दिव्य शक्ति से संपन्न पवित्र स्तूप बनने के लिए एक लंबी आध्यात्मिक प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है। यह पूरी प्रक्रिया रविवार को स्तूपों की स्थापना की आधारशिला रखने के साथ शुरू हुई है, जो आगे चलकर इन सभी स्मारकों के पूर्ण निर्माण और उनके भव्य धार्मिक अभिषेक के साथ संपन्न होगी।

बौद्ध वास्तुकला और इतिहास में स्तूपों का क्या है गहरा महत्व

स्तूपों के निर्माण की यह प्राचीन परंपरा बौद्ध धर्म की सबसे पवित्र और मूल प्रथाओं में से एक मानी जाती है। इतिहास के पन्नों को पलटें तो ऐसे वास्तुशिल्प स्मारक सीधे तौर पर गौतम बुद्ध के प्रबुद्ध मन, उनके भौतिक शरीर और उनकी असीम चेतना के सर्वोच्च प्रतीक माने जाते हैं। इस परंपरा की शुरुआत ईसा पूर्व 5वीं शताब्दी में महान गौतम बुद्ध के महापरिनिर्वाण (निधन) के तुरंत बाद हुई थी।

पौराणिक और ऐतिहासिक साक्ष्यों के अनुसार, जब भगवान बुद्ध का अंतिम संस्कार संपन्न हुआ, तो उनके पवित्र अवशेषों को आठ अलग-आठ हिस्सों में विभाजित किया गया और उन्हें शुरुआती दौर में मिट्टी के टीलों के नीचे संरक्षित किया गया था। इसके सदियों बाद, मौर्य वंश के महान सम्राट अशोक ने इन मूल अवशेष वाले टीलों को खुलवाया, बुद्ध के उन पवित्र अवशेषों को 84,000 अलग-अलग हिस्सों में विभाजित किया और अपने विशाल साम्राज्य के कोने-कोने में बड़े पैमाने पर भव्य स्तूपों के निर्माण का ऐतिहासिक कार्य शुरू करवाया था। आज उसी प्राचीन और पवित्र बौद्ध परंपरा को भूटान के गेलेफू में आधुनिक और शांतिपूर्ण परिवेश में पुनर्जीवित किया जा रहा है।

भारत और भूटान के अटूट सांस्कृतिक व आध्यात्मिक रिश्ते

केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू की इस यात्रा और इस भव्य आयोजन में भारत की भागीदारी यह साबित करती है कि भारत और भूटान के कूटनीतिक संबंध केवल राजनीतिक समझौतों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि ये सदियों पुरानी साझा आध्यात्मिक और सांस्कृतिक विरासत पर टिके हुए हैं। भूटान के महामहिम राजा की परिकल्पना से तैयार हो रहा यह 'गेलेफू माइंडफुलनेस सिटी' प्रोजेक्ट पूरी दुनिया के लिए शांति, मानसिक स्वास्थ्य और प्रकृति के साथ तालमेल बिठाकर जीने का एक अनूठा केंद्र बनने जा रहा है। 108 स्तूपों का यह निर्माण भारत और भूटान के बीच मैत्री के धागों को और अधिक मजबूत करने के साथ-साथ दुनिया भर के बौद्ध अनुयायियों के लिए एक मुख्य तीर्थ स्थल के रूप में उभरेगा।