भारत के खिलाफ नहीं है चीन के साथ हुई पोर्ट डील: मालदीव की मुइज्जू सरकार ने दी सफाई और कूटनीतिक रिश्तों पर कही यह बड़ी बात
मालदीव की राजनीति और भारत के साथ उसके कूटनीतिक संबंधों को लेकर पिछले कुछ समय से अंतरराष्ट्रीय गलियारों में हलचल काफी तेज बनी हुई है, खासकर तब से जब वहां मोहम्मद मुइज्जू की सरकार सत्ता में आई है। हाल ही में मालदीव सरकार द्वारा चीन के साथ बंदरगाह यानी पोर्ट के विकास को लेकर एक नए समझौते पर हस्ताक्षर किए गए, जिसके बाद से सामरिक और कूटनीतिक हलकों में इस बात पर गंभीर चिंता जताई जाने लगी कि क्या यह कदम भारत की सुरक्षा हितों के खिलाफ है। इन तमाम कयासों और तीखी आलोचनाओं के बीच आखिरकार मालदीव की मुइज्जू सरकार की तरफ से एक आधिकारिक और स्पष्ट बयान सामने आया है, जिसमें सरकार ने पुरजोर तरीके से यह सफाई दी है कि उनका यह नया समझौता किसी भी सूरत में भारत के खिलाफ नहीं है और वे क्षेत्रीय शांति व स्थिरता के लिए पूरी तरह से प्रतिबद्ध हैं। मालदीव के प्रशासनिक और राजनीतिक नेतृत्व का यह भी कहना है कि वे अपनी अर्थव्यवस्था को मजबूत करने और बुनियादी ढांचे के विकास के लिए दुनिया के हर देश के साथ संतुलित और व्यावहारिक संबंध बनाए रखने की नीति पर काम कर रहे हैं, जिसमें भारत उनका सबसे पुराना और भरोसेमंद भागीदार बना हुआ है। इस सफाई के बाद से हिंद महासागर के इस रणनीतिक रूप से बेहद संवेदनशील द्वीप राष्ट्र में कूटनीतिक तनाव को कम करने और आपसी विश्वास को फिर से बहाल करने की दिशा में एक नई कशमकश शुरू हो गई है, जिस पर पूरी दुनिया की पैनी नजरें टिकी हुई हैं।
हिंद महासागर की भू-राजनीति और चीन के साथ हुए नए पोर्ट समझौते के कूटनीतिक मायने
हिंद महासागर सदियों से वैश्विक व्यापार, ऊर्जा आपूर्ति मार्गों और सामरिक प्रभुत्व का सबसे बड़ा केंद्र रहा है, और ऐसे में मालदीव जैसे छोटे द्वीप राष्ट्र का भू-राजनीतिक महत्व बहुत अधिक बढ़ जाता है। चीन लगातार अपनी बेल्ट एंड रोड पहल के तहत इस क्षेत्र में अपने पैर पसारने की कोशिश कर रहा है, और मालदीव में बंदरगाह विकास परियोजनाओं को अपने हाथ में लेना इसी बड़ी वैश्विक रणनीति का एक अहम हिस्सा माना जा रहा है। जब मालदीव सरकार ने चीन की किसी कंपनी के साथ इस नए पोर्ट प्रोजेक्ट को लेकर करार किया, तो भारत की सुरक्षा एजेंसियों और रक्षा विश्लेषकों के कान खड़े होना स्वाभाविक था, क्योंकि हिंद महासागर में किसी भी प्रतिद्वंद्वी देश की सैन्य या रणनीतिक मौजूदगी भारत की तटीय सुरक्षा के लिए सीधी चुनौती बन सकती है। इस नए समझौते के तहत जिन बुनियादी ढांचे के विकास की बात की जा रही है, वे न केवल व्यावसायिक गतिविधियों को बढ़ावा देंगे बल्कि भविष्य में इनका दोहरा उपयोग यानी रणनीतिक और सैन्य इस्तेमाल होने की आशंका से भी इनकार नहीं किया जा सकता है। यही वजह है कि विपक्षी दल और अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञ इस डील को लेकर मुइज्जू सरकार से लगातार तीखे सवाल पूछ रहे थे, जिसके जवाब में सरकार को सफाई देने के लिए मजबूर होना पड़ा ताकि क्षेत्रीय संतुलन और कूटनीतिक असहजता को किसी तरह से नियंत्रित किया जा सके।
'इंडिया फर्स्ट' से 'अमरेली' नीति तक: मालदीव सरकार के बदलते रुख की पूरी कहानी
जब से राष्ट्रपति मोहम्मद मुइज्जू ने मालदीव की कमान संभाली है, तब से उनकी नीतियों में भारत के प्रति एक अलग ही प्रकार का रुख देखने को मिला है, जिसे उन्होंने शुरुआत में 'इंडिया आउट' कैंपेन के रूप में हवा दी थी। हालांकि, सत्ता की बागडोर संभालने और देश की चरमराती अर्थव्यवस्था की वास्तविकताओं से रूबरू होने के बाद, मुइज्जू सरकार को यह अच्छी तरह समझ आ गया कि भारत को पूरी तरह से नजरअंदाज करके मालदीव का वित्तीय और बुनियादी ढांचागत विकास असंभव है। मालदीव अपनी दैनिक जरूरतों, खाद्य आपूर्ति, पर्यटन क्षेत्र और आपातकालीन चिकित्सा सेवाओं के लिए आज भी बहुत बड़े पैमाने पर भारत पर ही निर्भर करता है, और भारतीय पर्यटकों की संख्या में उतार-चढ़ाव सीधे तौर पर वहां के रिजॉर्ट्स और होटल व्यवसाय को प्रभावित करता है। यही कारण है कि जब भारत के साथ संबंधों में अत्यधिक खटास आने लगी और मालदीव की अर्थव्यवस्था को भारी नुकसान उठाना पड़ा, तो राष्ट्रपति मुइज्जू ने अपनी कूटनीति में नरमी बरतते हुए भारत की यात्रा की और रिश्तों को पटरी पर लाने की कोशिश की। इसके बावजूद, चीन के प्रति उनका विशेष झुकाव और नए पोर्ट समझौतों पर हस्ताक्षर करना यह साबित करता है कि वे भारत और चीन के बीच एक कठिन संतुलन साधने की रस्सी पर चलने की कोशिश कर रहे हैं, जो उनके अपने राजनीतिक भविष्य और देश की अर्थव्यवस्था के लिए एक बहुत बड़ी परीक्षा साबित हो रही है।
भारत की रणनीतिक चिंताएं और मालदीव द्वारा सफाई दिए जाने के पीछे के असली कारण
भारत के लिए मालदीव केवल एक पड़ोसी देश नहीं है, बल्कि 'नेबरहुड फर्स्ट' नीति के तहत उसकी सुरक्षा और स्थिरता भारत के राष्ट्रीय हितों की रक्षा के लिए बेहद अहम मानी जाती है। भारतीय नौसेना और सुरक्षा रणनीतिकार इस बात को बहुत अच्छी तरह समझते हैं कि मालदीव के किसी भी बंदरगाह या सामरिक द्वीप पर यदि चीन का स्थायी या अत्यधिक प्रभाव स्थापित हो जाता है, तो यह भारत के दक्षिणी समुद्री तटों के लिए एक बड़ा सुरक्षा खतरा बन सकता है। जब भारत की ओर से इस मामले में अपनी गंभीर चिंताओं को कूटनीतिक चैनलों के माध्यम से मालदीव के समक्ष रखा गया, और साथ ही आर्थिक सहयोग के मोर्चे पर स्थिति को संतुलित करने के प्रयास शुरू हुए, तब जाकर मुइज्जू प्रशासन को यह अहसास हुआ कि भारत को पूरी तरह से नजरअंदाज करना उनके देश के लिए भारी पड़ सकता है। अपनी सफाई में यह कहना कि चीन के साथ हुए समझौते पूरी तरह से आर्थिक विकास के लिए हैं और इनसे भारत की सुरक्षा को कोई आंच नहीं आएगी, इसी कूटनीतिक दबाव का सीधा परिणाम माना जा रहा है। मालदीव सरकार यह अच्छी तरह जानती है कि भारत के साथ कड़वाहट बढ़ाकर वह अपनी घरेलू जनता की बुनियादी जरूरतों को पूरा नहीं कर सकती है, क्योंकि भारत ने हमेशा संकट के समय मालदीव को सबसे पहले और सबसे तेजी से मदद पहुंचाई है, चाहे वह पानी का संकट हो या फिर कोरोना महामारी का दौर।
भविष्य के कूटनीतिक समीकरण और हिंद महासागर में शांति बनाए रखने की बड़ी चुनौती
आने वाले समय में भारत और मालदीव के बीच के रिश्ते किस दिशा में आगे बढ़ेंगे, यह इस बात पर पूरी तरह से निर्भर करेगा कि मुइज्जू सरकार अपने बरी करने वाले बयानों को जमीन पर कितना उतारती है और चीन के साथ होने वाले समझौतों में पारदर्शिता कितनी रखती है। हिंद महासागर में वर्चस्व की इस लड़ाई में छोटे देशों के लिए यह बहुत जरूरी हो जाता है कि वे किसी एक महाशक्ति के पाले में पूरी तरह से झुकने के बजाय अपनी रणनीतिक स्वायत्तता को बनाए रखें, क्योंकि इससे क्षेत्रीय अस्थिरता बढ़ने का खतरा हमेशा बना रहता है। मालदीव के नागरिकों और वहां के व्यापारी वर्ग का एक बड़ा हिस्सा भी यह चाहता है कि भारत के साथ उनके ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और व्यावसायिक संबंध हमेशा मधुर बने रहें, क्योंकि इससे दोनों देशों के आम लोगों को सीधा फायदा मिलता है। मुइज्जू सरकार द्वारा दी गई यह हालिया सफाई भले ही फिलहाल कूटनीतिक तनाव को कुछ हद तक कम करने का काम कर रही हो, लेकिन आने वाले दिनों में चीन की तरफ से मिलने वाले फंड और पोर्ट के वास्तविक इस्तेमाल पर सबकी नजरें गड़ी रहेंगी। भारत अपनी सामरिक सतर्कता को किसी भी कीमत पर कम नहीं करेगा और क्षेत्र में शांति बनाए रखने के लिए हर संभव कूटनीतिक और सामरिक कदम उठाता रहेगा, ताकि हिंद महासागर को अशांति से बचाया जा सके और दक्षिण एशिया में स्थिरता का माहौल कायम रहे।