'डर के साये में जी रही हूं': पाकिस्तान में 15 लाख मासूम ऑनलाइन यौन शोषण के शिकार
पाकिस्तान में इंटरनेट और स्मार्टफोन के बढ़ते प्रसार के बीच मासूम बच्चों की सुरक्षा को लेकर एक बेहद रूह कंपा देने वाला और गंभीर संकट सामने आया है। संयुक्त राष्ट्र बाल कोष यानी यूनिसेफ (UNICEF) की हालिया रिपोर्ट ने पाकिस्तान के सामाजिक और डिजिटल ताने-बाने की पोल खोलकर रख दी है। इस विस्तृत अध्ययन के अनुसार, देश के भीतर एक ही साल के भीतर लगभग 15 लाख मासूम बच्चे ऑनलाइन यौन शोषण और भयावह डिजिटल उत्पीड़न की चपेट में आ चुके हैं। साइबर अपराधी अब केवल पारंपरिक रास्तों से नहीं, बल्कि ऑनलाइन मल्टीप्लेयर वीडियो गेम्स, मैसेजिंग ऐप्स और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स के जरिए बच्चों तक अपनी पहुंच बना रहे हैं। यह स्थिति कितनी चिंताजनक है, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इस दलदल में फंसी किशोरियां और मासूम बच्चे भयानक मानसिक आघात, अवसाद और सामाजिक बदनामी के खौफ के साये में अपनी जिंदगी काटने को मजबूर हैं।
ऑनलाइन वीडियो गेमिंग से शुरू हुआ खतरनाक जाल: जारा शाह की आपबीती बयां करती है कड़वी हकीकत
इस भयावह डिजिटल शोषण का शिकार बनी 17 वर्षीय पाकिस्तानी किशोरी जारा शाह (पहचान छिपाने के उद्देश्य से बदला हुआ नाम) की दास्तान इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण है कि इंटरनेट की आभासी दुनिया में मासूमों के लिए कितना बड़ा खतरा छिपा है। जारा को एक अज्ञात शख्स ने उस वक्त अपना शिकार बनाया जब वह एक लोकप्रिय कंप्यूटर गेम खेल रही थी। गेमिंग के दौरान इन-गेम चैट के माध्यम से बातचीत शुरू हुई, जो धीरे-धीरे निजी संदेशों में तब्दील हो गई। पीड़िता के अनुसार, सामने वाले व्यक्ति ने पहले खुद को एक सच्चा और हमदर्द दोस्त दिखाया। उसने कई हफ्तों तक सामान्य बातें करके जारा का अटूट भरोसा जीता। इसके बाद उसने व्यक्तिगत रूप से मिलने का दबाव बनाना शुरू किया और धीरे-धीरे अपनी गंदी नीयत दिखाते हुए न्यूड तस्वीरों की मांग कर डाली। जब जारा ने उसकी इस अनुचित मांग को सिरे से ठुकरा दिया, तो उस अजनबी का असली रूप सामने आ गया। उसने जारा को धमकाना शुरू कर दिया कि वह इंटरनेट के जरिए उसके पूरे परिवार और रिश्तेदारों को ढूंढ निकालेगा और उन्हें उनकी निजी बातचीत के स्क्रीनशॉट भेजकर बदनाम कर देगा।
85 प्रतिशत अपराधी निकले पीड़ितों के परिचित: यूनिसेफ रिपोर्ट के मुख्य लेखक डोनियल कार्डफेल्ट का विश्लेषण
यूनिसेफ के इस जमीनी सर्वेक्षण में जो सबसे हैरान करने वाला और चिंताजनक तथ्य उभरकर सामने आया है, वह यह है कि बच्चों का ऑनलाइन शोषण करने वाले अधिकांश लोग कोई पूरी तरह से अनजान हैकर्स नहीं, बल्कि उनके अपने परिचित हैं। रिपोर्ट के अनुसार, लगभग 85 प्रतिशत मामलों में अपराधी पीड़िता या उसके परिवार के पहले से ही परिचित पाए गए। रिपोर्ट के मुख्य लेखक डोनियल कार्डफेल्ट ने इस सिंडिकेट और साइबर अपराधियों के काम करने के तरीके (Modus Operandi) का विश्लेषण करते हुए बताया कि इन अपराधों की शुरुआत अक्सर बेहद दोस्ताना बातचीत, गेमिंग कम्युनिटीज, उपहार देने, जेब खर्च के लिए पैसे भेजने या झूठे प्रेम प्रसंगों के वादों से होती है। साइबर शिकारी बच्चों की सोशल मीडिया प्रोफाइल्स पर उपलब्ध व्यक्तिगत जानकारी, शौक और परिवार की कमजोरियों का महीनों तक अध्ययन करते हैं। वे बच्चों को यह विश्वास दिलाते हैं कि वे उनके सबसे बड़े शुभचिंतक हैं, और जब एक बार बच्चा भावनात्मक रूप से उन पर निर्भर हो जाता है, तब ब्लैकमेलिंग और डिजिटल यौन शोषण का क्रूर चक्र शुरू किया जाता है।
बदनामी और रूढ़िवादिता के खौफ से 71 फीसदी पीड़ितों ने साधी चुप्पी: हेल्पलाइन और पुलिस से शून्य संपर्क
इस गंभीर अपराध का शिकार होने के बावजूद बच्चे अपने साथ हुए जुल्म की जानकारी किसी से साझा नहीं कर पाते। सर्वेक्षण के अनुसार, रूढ़िवादी और मुस्लिम-बहुल देश पाकिस्तान में 71 प्रतिशत बच्चों ने अपने साथ हुए शोषण की बात अपने माता-पिता तक को नहीं बताई। इससे भी ज्यादा चौंकाने वाला तथ्य यह है कि सर्वे में शामिल एक भी बच्चे ने स्थानीय पुलिस, बाल अधिकार हेल्पलाइन या किसी पेशेवर सोशल वर्कर के पास जाकर औपचारिक रूप से अपनी शिकायत दर्ज नहीं कराई। समाजशास्त्रियों का मानना है कि बच्चों की इस भारी चुप्पी के पीछे मुख्य कारण सामाजिक बदनामी, पारिवारिक तिरस्कार का भय और यह आशंका है कि रूढ़िवादी समाज उल्टे पीड़िता को ही दोषी ठहरा देगा। पीड़ित बच्चों को डर रहता है कि बात उजागर होने पर उनके चरित्र पर उंगली उठाई जाएगी और उन्हें इंसाफ मिलने के बजाय घर में ही कैद कर दिया जाएगा।
स्नैपचैट और व्हाट्सएप बने साइबर शिकारियों के बड़े हथियार: 'पहचान' संस्था की डायरेक्टर महक नईम की चेतावनी
पाकिस्तान के पूर्वी महानगर लाहौर में बाल अधिकारों और बाल संरक्षण के क्षेत्र में जमीनी स्तर पर कार्यरत प्रमुख गैर-सरकारी संस्था 'पहचान' (PAHCHAAN) की डायरेक्टर महक नईम ने इस संकट पर गंभीर चेतावनी जारी की है। महक नईम के मुताबिक, उनके पास दर्ज होने वाले बाल शोषण के कुल मामलों में से लगभग 44 प्रतिशत मामले पूरी तरह से ऑनलाइन माध्यमों से संचालित पाए गए हैं। उन्होंने खुलासा किया कि किशोरों और बच्चों को फांसने तथा उन्हें ब्लैकमेल करने के लिए स्नैपचैट और व्हाट्सएप जैसे मैसेजिंग प्लेटफॉर्म्स का सबसे अधिक दुरुपयोग किया जा रहा है। स्नैपचैट के 'डिसअपीयरिंग मैसेजेस' (गायब होने वाले संदेश) फीचर का फायदा उठाकर अपराधी पहले आपत्तिजनक बातचीत करते हैं और फिर गुप्त तरीकों से स्क्रीनशॉट या स्क्रीन रिकॉर्डिंग लेकर बच्चों को ब्लैकमेल करना शुरू कर देते हैं।
'घबराहट मुझे हर दिन मार रही है': रूढ़िवादी बंदिशों और पढ़ाई छूटने के डर ने छीनी मासूमों की मुस्कान
पाकिस्तान जैसे पारंपरिक और पितृसत्तात्मक समाज में बालिकाओं के लिए साइबर ब्लैकमेलिंग का खतरा लड़कों की तुलना में कहीं अधिक विनाशकारी साबित होता है। यदि किसी लड़की के ऑनलाइन शोषण या बातचीत का मामला सामने आता है, तो परिवार अक्सर लड़की के चरित्र पर सवाल उठाते हुए उसकी पढ़ाई बंद करवा देता है और उसके घर से बाहर निकलने पर कड़े प्रतिबंध लगा देता है। कई मामलों में तो लड़कियों की कम उम्र में जबरन शादी तक कर दी जाती है। जारा शाह ने अपनी दर्दनाक स्थिति बयां करते हुए कहा कि उसके लिए परिवार के सामने राज खुलने का डर ही इस असहनीय दर्द को चुपचाप सहने के लिए काफी था। जारा ने रुंधे गले से कहा कि अगर वह घर में कुछ भी बताती, तो शायद उसका स्कूल जाना हमेशा के लिए बंद कर दिया जाता और उसे चारदीवारी में कैद कर दिया जाता। उसने अपने दर्द को बयां करते हुए कहा कि उसे अपनी जुबान बंद रखना ही ज्यादा सुरक्षित लगा, लेकिन यह घबराहट और अनजाना खौफ उसे हर दिन अंदर ही अंदर मार रहा है। वह कल भी खौफ में जी रही थी और आज भी लगातार डर के भयानक साये में अपनी सांसें गिन रही है। बाल सुरक्षा विशेषज्ञों का स्पष्ट कहना है कि यदि पाकिस्तान सरकार, साइबर क्राइम विंग और अभिभावकों ने समय रहते डिजिटल निगरानी, सख्त कानून और बच्चों के मानसिक सहयोग के लिए कदम नहीं उठाए, तो यह साइबर जाल आने वाली पीढ़ियों के भविष्य को पूरी तरह अंधकार में धकेल देगा।