आर्कटिक में बनेंगे नए अमेरिकी सैन्य बेस, ड्रैगन और रूस की घेराबंदी तेज
दुनिया के सबसे संवेदनशील और रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण आर्कटिक क्षेत्र में चल रहे लंबे भू-राजनीतिक गतिरोध को समाप्त करने की दिशा में एक अत्यंत युगांतरकारी घटनाक्रम सामने आया है। संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) के उच्चस्तरीय सत्र के इतर न्यूयॉर्क में आयोजित एक औपचारिक समारोह में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने डेनमार्क और उसके स्वायत्त क्षेत्र ग्रीनलैंड के साथ एक ऐतिहासिक त्रिपक्षीय सुरक्षा समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं। इस समझौते का प्राथमिक उद्देश्य आर्कटिक वृत्त में तेजी से बढ़ते सैन्यीकरण, चीनी जहाजों की आवाजाही और रूसी रणनीतिक दबाव को निष्प्रभावी करना है। न्यूज एजेंसी एएफपी (AFP) के अनुसार, इस समझौते पर मुहर लगाने के बाद राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने बेहद आत्मविश्वास भरे लहजे में कहा कि यह अमेरिका, डेनमार्क और ग्रीनलैंड के बीच दशकों तक चलने वाली एक अत्यंत मजबूत, ऐतिहासिक और शानदार सुरक्षा साझेदारी की शुरुआत है।
इस समझौते का सीधा अर्थ यह है कि अमेरिका को अब रणनीतिक रूप से बेहद अहम और प्राकृतिक रूप से बेहद संवेदनशील ग्रीनलैंड द्वीप की सुरक्षा और रक्षा मामलों में निर्णायक और प्रत्यक्ष भूमिका प्राप्त हो गई है। राष्ट्रपति ट्रंप पूर्व में भी सार्वजनिक मंचों से यह रेखांकित करते रहे हैं कि पश्चिमी गोलार्ध की संपूर्ण सुरक्षा के लिए ग्रीनलैंड पर अमेरिका का रणनीतिक नियंत्रण होना बेहद आवश्यक है। इस त्रिपक्षीय समझौते के जरिए अमेरिका ने बिना किसी औपचारिक संप्रभुता विवाद के उस स्थायी रक्षा उपस्थिति को सुनिश्चित कर लिया है, जिसकी रूपरेखा को लेकर पिछले कई वर्षों से नाटो (NATO) सहयोगियों के बीच मतभेद सुलग रहे थे।
'विरोधियों को करीब नहीं आने देंगे': डेनमार्क की प्रधानमंत्री मेटे फ्रेडरिकसेन ने दिया ट्रंप की नीति को खुला समर्थन
न्यूयॉर्क में हस्ताक्षर समारोह से ठीक पहले डेनमार्क की प्रधानमंत्री मेटे फ्रेडरिकसेन ने बेहद स्पष्ट और मुखर शब्दों में अंतरराष्ट्रीय समुदाय को संदेश दिया। अमेरिकी राष्ट्रपति की ओर मुखातिब होते हुए उन्होंने कहा कि राष्ट्रपति ट्रंप ने अपनी सामरिक प्राथमिकताओं को दुनिया के सामने पूरी पारदर्शिता से रखा है कि वे किसी भी सूरत में पश्चिमी विरोधियों को अपनी सुरक्षा परिधि के करीब फटकने नहीं देना चाहते। डेनिश प्रधानमंत्री ने कहा कि वे ट्रंप की इस चिंता से पूरी तरह सहमत हैं और यह नया त्रिपक्षीय समझौता ठीक वही काम करेगा जिसकी इस नाजुक वक्त में जरूरत थी।
फ्रेडरिकसेन ने वैश्विक मंच से चेतावनी भरे लहजे में कहा कि यह समझौता इस बात की पक्की गारंटी देता है कि किसी भी प्रतिकूल शक्ति या प्रतिद्वंद्वी देश को आर्कटिक के विशाल खनिज संपदा वाले भूभाग पर नियंत्रण करने या अपना रणनीतिक प्रभुत्व स्थापित करने की कतई अनुमति नहीं दी जाएगी। यह बयान सीधे तौर पर रूस की आर्कटिक में बढ़ती सबमरीन गश्त और चीन द्वारा शुरू किए गए 'पोलर सिल्क रोड' के मंसूबों पर करारा राजनयिक प्रहार माना जा रहा है। डेनमार्क के इस कड़े रुख से यह साबित हो गया है कि लंबे मतभेदों के बाद अब कोपेनहेगन और वाशिंगटन डीसी की सुरक्षा प्राथमिकताओं में पूर्ण सामंजस्य स्थापित हो चुका है।
नारसारसुआक और मेस्टर्सविग में बनेंगे नए अमेरिकी सैन्य बेस: 10 पन्नों के समझौते में खुले बड़े राज
समाचार एजेंसी रॉयटर्स द्वारा हासिल किए गए 10 पन्नों के विस्तृत गोपनीय समझौते के आधिकारिक दस्तावेजों से कई चौंकाने वाले रणनीतिक खुलासे हुए हैं। इस ऐतिहासिक रक्षा समझौते के तहत ग्रीनलैंड सरकार और डेनमार्क ने अमेरिकी सेना को द्वीप के दो सबसे महत्वपूर्ण और संवेदनशील भौगोलिक बिंदुओं पर नए अत्याधुनिक मिलिट्री बेस स्थापित करने की औपचारिक अनुमति दे दी है। इसके तहत दक्षिण में रणनीतिक एयरफील्ड वाले नारसारसुआक (Narsarsuaq) और आर्कटिक द्वीप के सुदूर पूर्वी तट पर स्थित मेस्टर्सविग (Mestersvig) में अमेरिकी नौसेना और वायुसेना अपने उन्नत निगरानी केंद्र, रडार सिस्टम और फॉरवर्ड मिलिट्री बेस विकसित करेंगी।
ग्रीनलैंड के प्रधानमंत्री जेन्स-फ्रेडरिक निल्सन ने समझौते के महत्व को रेखांकित करते हुए कहा कि ग्रीनलैंड केवल एक बर्फ का टुकड़ा नहीं है, बल्कि यह उत्तरी अमेरिका महाद्वीप की सुरक्षा और ट्रांस-अटलांटिक रक्षा संरचना का केंद्रीय स्तंभ है। उन्होंने कहा कि यह समझौता यह साबित करता है कि ग्रीनलैंड अपनी भू-राजनीतिक जिम्मेदारियों को पूरी परिपक्वता के साथ समझता है और अपने सहयोगियों के साथ मिलकर वैश्विक स्थिरता के लिए काम कर रहा है। इन नए सैन्य अड्डों के सक्रिय होने से अमेरिका न केवल नॉर्थ अटलांटिक और जीआईयूके (GIUK) गैप पर पूरी तरह हावी हो सकेगा, बल्कि उत्तर ध्रुवीय मार्ग से गुजरने वाले हर विदेशी जलपोत और परमाणु पनडुब्बी की गतिविधियों पर चौबीसों घंटे रियल-टाइम नजर रखने में सक्षम हो जाएगा।
नाटो के भीतर पैदा हुए तनाव और ग्रीनलैंड के 56 हजार नागरिकों की चिंताओं का हुआ समाधान
उल्लेखनीय है कि इस समझौते तक पहुंचने का सफर कूटनीतिक रूप से बेहद कांटेदार और तनावपूर्ण रहा है। अपने पिछले कार्यकालों और बयानों में डोनाल्ड ट्रंप द्वारा ग्रीनलैंड को "खरीदने" की अप्रत्याशित इच्छा जाहिर किए जाने के बाद नाटो गठबंधन के भीतर भीषण भूचाल आ गया था। उस समय डेनमार्क की प्रधानमंत्री मेटे फ्रेडरिकसेन ने तीखी प्रतिक्रिया देते हुए दो टूक शब्दों में चेतावनी दी थी कि अगर अमेरिका किसी संप्रभु क्षेत्र पर कब्जा करने की मानसिकता से आगे बढ़ता है, तो इससे ट्रांस-अटलांटिक सैन्य गठबंधन हमेशा के लिए बिखर सकता है। इस कूटनीतिक तल्खी के कारण ग्रीनलैंड में रहने वाले करीब 56,000 स्थानीय निवासियों में भी अपनी सांस्कृतिक पहचान, संप्रभुता और पर्यावरण को लेकर गहरी बेचैनी और असंतोष फैल गया था।
अमेरिका, डेनमार्क और यूरोपीय संघ के बीच बढ़ती इस दरार का फायदा उठाने के लिए विरोधी ताकतों ने उस क्षेत्र में आर्थिक निवेश बढ़ाने की कोशिशें शुरू कर दी थीं, जिसके जवाब में यूरोपीय सहयोगियों ने द्वीप पर संयुक्त सुरक्षा अभ्यास और वित्तीय अनुदान तेज कर दिए थे। महीनों तक चली उच्चस्तरीय राजनयिक वार्ताओं के बाद आखिरकार तीनों पक्षों ने एक ऐसा संतुलित रास्ता खोज निकाला जिसमें ग्रीनलैंड की स्वायत्तता, डेनमार्क की संप्रभुता और अमेरिका की सुरक्षा चिंताओं—तीनों का सम्मान सुरक्षित रखा गया है। नए समझौते के साथ अब न केवल नाटो के उत्तरी मोर्चे पर छाई अनिश्चितता पूरी तरह छंट गई है, बल्कि यह भी तय हो गया है कि भविष्य के आर्कटिक संसाधन युद्ध में पश्चिमी गठबंधन पूरी तरह एकजुट होकर अपनी जमीन पर डटा रहेगा।