आखिरी वक्त में जुबां क्यों हो जाती है पत्थर? जानिए गरुड़ पुराण की वो बातें जो कोई नहीं बताता
News India Live, Digital Desk : मौत एक ऐसा सच है जिससे हम सब कहीं न कहीं डरते भी हैं और जिसके बारे में और अधिक जानने की जिज्ञासा भी रखते हैं। हिंदू धर्म में 'गरुड़ पुराण' को एक ऐसा ग्रंथ माना गया है जो इंसान की मौत, उसके बाद के सफर और आत्मा के रहस्यों को बड़ी बारीकी से बताता है। अक्सर हमने सुना है या फिल्मों और असल जिंदगी में देखा है कि जब कोई व्यक्ति अपने आखिरी वक्त में होता है, तो वह बहुत कुछ कहना चाहता है, लेकिन चाहकर भी उसके गले से आवाज़ नहीं निकल पाती।
कभी आपने सोचा है कि ऐसा क्यों होता है? क्या यह सिर्फ शारीरिक कमजोरी है या इसके पीछे कोई गहरा आध्यात्मिक रहस्य है? गरुड़ पुराण के अनुसार, इसके पीछे कई बड़े कारण बताए गए हैं।
जब इंद्रियां अपना साथ छोड़ने लगती हैं
गरुड़ पुराण कहता है कि जैसे-जैसे प्राण (जीवन शक्ति) शरीर को छोड़ने की तैयारी करते हैं, शरीर की तमाम ज्ञानेंद्रियां और कर्मेंद्रियां सुस्त पड़ने लगती हैं। बोलना भी एक कर्म है जिसके लिए काफी ऊर्जा की ज़रूरत होती है। जब आत्मा शरीर के अलग-अलग केंद्रों से सिमटकर हृदय या सिर की तरफ बढ़ने लगती है, तो जुबां पर इसका असर सबसे पहले पड़ता है।
वो खौफ और वो अहसास
शास्त्रों के अनुसार, मृत्यु के करीब पहुँचते ही इंसान को कुछ ऐसी दिव्य अनुभूतियाँ या अजीबोगरीब दृश्य दिखने लगते हैं जिन्हें वह सामान्य जीवन में नहीं देख सकता। गरुड़ पुराण में उल्लेख है कि अंतिम क्षणों में जब 'यमदूत' आत्मा को लेने आते हैं, तो उन्हें देखकर व्यक्ति भयभीत हो जाता है। उस समय होने वाली घबराहट और शरीर के पंचतत्वों (क्षिति, जल, पावक, गगन, समीरा) का संतुलन बिगड़ने से कंठ अवरुद्ध हो जाता है।
कफ और वायु का बढ़ना
आध्यात्मिक पहलुओं के अलावा, गरुड़ पुराण में शरीर के भीतर होने वाले भौतिक बदलावों का भी जिक्र मिलता है। अंतिम समय में शरीर में 'कफ' की मात्रा बढ़ जाती है जो गले के रास्ते को बंद करने लगती है। सांस लेने में होने वाली तकलीफ और शरीर में बढ़ने वाली वायु की वजह से स्वर तंत्रियाँ (vocal cords) काम करना बंद कर देती हैं। यही वजह है कि मरते हुए इंसान की आंखों से आँसू तो गिर सकते हैं, इशारे तो हो सकते हैं, पर शब्दों का उच्चारण लगभग नामुमकिन हो जाता है।
जीवन भर की स्मृतियों का बोझ
एक मान्यता यह भी है कि उस अंतिम समय में इंसान के पूरे जीवन की फिल्म उसकी आंखों के सामने से गुज़रती है। वह अपने अधूरे कामों और अपनों की यादों में इतना उलझा होता है कि मानसिक रूप से बोलने की शक्ति खो देता है।
अजीब बात है न, जो जुबां जिंदगी भर दुनिया भर की बातें करती रही, वह उस एक सबसे ज़रूरी बात को कहने के समय चुप हो जाती है। शायद कुदरत हमें सिखाना चाहती है कि अंतिम सत्य केवल 'मौन' ही है। इसीलिए हिंदू परंपरा में कहा जाता है कि अगर संभव हो, तो अंतिम समय में केवल 'ईश्वर' का नाम सुनाना चाहिए, क्योंकि उस वक्त सुनने की शक्ति बाकी रहने की संभावना सबसे ज्यादा होती है।