मुजरिम साबित होने से पहले उसकी फोटो फेसबुक पर क्यों? राजस्थान हाई कोर्ट ने पुलिस पर लगा दी लगाम
News India Live, Digital Desk: आपने अक्सर फेसबुक, ट्विटर या इंस्टाग्राम पर पुलिस के ऐसे पोस्ट देखे होंगे जहाँ पुलिस किसी 'आरोपी' के साथ खड़ी होकर फोटो खिंचवाती है। हाथ में पिस्टल, चेहरा थका हुआ और पीछे पुलिस टीम का मुस्कुराता चेहरा—इसे आमतौर पर पुलिस की कामयाबी का सर्टिफिकेट माना जाता है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि अगर वही इंसान आगे चलकर निर्दोष साबित हो जाए, तो क्या समाज उसे वही पुरानी इज्जत वापस देगा?
यही वह गंभीर सवाल है जिसे लेकर राजस्थान हाई कोर्ट ने अब पुलिस के काम करने के तरीके पर गहरी नाराजगी जताई है।
मामला क्या है?
दरअसल, राजस्थान हाई कोर्ट ने पुलिस को एक साफ़ और कड़ा संदेश दिया है कि किसी भी गिरफ्तार व्यक्ति (Accused) की तस्वीर सोशल मीडिया या मीडिया पर सार्वजनिक करना उसके मौलिक अधिकारों का हनन है। कोर्ट ने कहा कि जब तक कोई दोषी करार नहीं दिया जाता, तब तक वह महज़ एक 'आरोपी' है, 'मुजरिम' नहीं। उसे सरेआम बेइज्जत करना एक तरह का 'मीडिया ट्रायल' है, जिसे बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
कोर्ट ने क्यों उठाया यह कदम?
आजकल हर विभाग 'सोशल मीडिया की दौड़' में लगा है। जैसे ही किसी की गिरफ्तारी होती है, उसकी तस्वीरें और वीडियो इंटरनेट पर वायरल कर दिए जाते हैं। कोर्ट का कहना है कि यह भारतीय संविधान के आर्टिकल 21 (जीने का अधिकार और प्राइवेसी) के खिलाफ है। कई मामलों में देखा गया है कि सोशल मीडिया पर हुई बदनामी की वजह से लोगों का घर से निकलना मुश्किल हो गया, और सालों बाद जब वो कोर्ट से बरी हुए, तब तक उनकी साख पूरी तरह मिट्टी में मिल चुकी थी।
क्या पुलिस अब कभी फोटो नहीं दिखाएगी?
कोर्ट के निर्देश के अनुसार, अब पुलिस अपनी 'महारत' दिखाने के लिए यूं ही फोटो पब्लिश नहीं कर सकती। हालांकि, कुछ खास मामलों में जैसे—पहचान की ज़रूरत हो, फरार अपराधी का सुराग लगाना हो या पुलिस को जनता की मदद चाहिए हो तभी ऐसी तस्वीरें दिखाई जा सकती हैं। बिना किसी ठोस कानूनी कारण के 'फेसबुक वाही-वाही' के लिए अब थानों में फोटो सेशन नहीं चलेगा।
समाज और पुलिस के लिए एक सीख
हाई कोर्ट का यह रुख हमें भी यह सोचने पर मजबूर करता है कि किसी के खिलाफ डिजिटल माहौल (Media Trial) बनाने से पहले हकीकत जानना कितना ज़रूरी है। यह फैसला उन लोगों के लिए एक बड़ी जीत है जो प्राइवेसी और सम्मान के साथ जीने की लड़ाई लड़ रहे थे। अब राजस्थान के पुलिस महकमे को अपने पुराने ढर्रे को बदलकर प्रोफेशनल जांच की दिशा में आगे बढ़ना होगा।