बांग्लादेश में हिंदुओं के दर्द पर अशोक गहलोत ने पीएम मोदी को क्यों लिख दी ऐसी भावुक चिट्ठी

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News India Live, Digital Desk: जब पड़ोस के घर में आग लगी हो, तो उसकी तपिश अपने घर तक आना लाज़मी है। पिछले कुछ समय से बांग्लादेश से जो खबरें और तस्वीरें आ रही हैं, वे किसी को भी विचलित कर सकती हैं। खासकर वहां रह रहे हिंदू समुदाय और अल्पसंख्यकों पर हो रहे हमलों ने भारत में गहरी चिंता पैदा कर दी है। इसी गंभीर मुद्दे पर राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने अब सीधा मोर्चा संभाला है और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को एक पत्र लिखकर कड़ा हस्तक्षेप करने की मांग की है।

आखिर गहलोत ने अपनी चिट्ठी में क्या लिखा?

अशोक गहलोत ने इस पत्र के जरिए पीएम मोदी से आग्रह किया है कि वे अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अपने प्रभाव का इस्तेमाल करें। उन्होंने लिखा है कि बांग्लादेश में जिस तरह से निर्दोष हिंदुओं को निशाना बनाया जा रहा है, उनकी हत्याएं हो रही हैं और उनके घर जलाए जा रहे हैं, वह न केवल मानवाधिकारों का उल्लंघन है बल्कि भारत के लिए भी एक भावनात्मक मुद्दा है।

गहलोत का मानना है कि केंद्र सरकार को इस मामले को संयुक्त राष्ट्र (UN) और अन्य अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर उठाना चाहिए ताकि बांग्लादेश सरकार पर वहां के नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने का दबाव बन सके।

ये सिर्फ राजनीति नहीं, अपनों की सुरक्षा की बात है

गहलोत ने इस बात पर ज़ोर दिया कि भारत हमेशा से ही अपने पड़ोसी देशों में शांति का पक्षधर रहा है। लेकिन जब वहां रह रहे अल्पसंख्यकों, जिनके रिश्तेदार भारत में रहते हैं, उनकी जान-माल पर खतरा बढ़ जाता है, तो देश का शांत रहना मुश्किल होता है। राजस्थान जैसे सीमावर्ती राज्य के लिए यह फिक्र और भी बड़ी हो जाती है क्योंकि सामाजिक और सांस्कृतिक रूप से लोग आपस में जुड़े हुए हैं।

क्यों ज़रूरी है केंद्र का सख्त स्टैंड?

जानकारों की मानें तो बांग्लादेश में हाल के तख्तापलट के बाद से अराजकता बढ़ी है। अशोक गहलोत ने प्रधानमंत्री से कहा कि वे स्वयं इस पर संज्ञान लें और वहां के मौजूदा नेतृत्व से बातचीत कर एक स्थायी समाधान की मांग करें। जब भारत का प्रधानमंत्री किसी मुद्दे पर कड़ाई से बोलता है, तो उसका असर पूरी दुनिया पर होता है।

एक उम्मीद और एक सवाल...

अशोक गहलोत की यह पहल दिखाती है कि कुछ मुद्दे पार्टी की विचारधारा से बहुत ऊपर होते हैं। अब सबकी नजरें इस बात पर टिकी हैं कि क्या भारत सरकार इस दिशा में कोई नया और बड़ा कूटनीतिक कदम उठाएगी? सरहद पार फंसे उन हजारों लोगों को अब सिर्फ भारत से ही उम्मीद है।

आपका क्या मानना है? क्या वाकई अब वक्त आ गया है कि भारत को पड़ोसी देशों में अल्पसंख्यकों की सुरक्षा के लिए और ज्यादा सख्त भूमिका निभानी चाहिए? हमें अपनी राय जरूर बताएं।