B.Tech की डिग्री या रद्दी का कागज? एआईसीटीई से मंजूरी मिलने के बाद भी छात्रों को किसने रोका?

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News India Live, Digital Desk: जरा सोचिए कि आपने 4 साल तक इंजीनियरिंग की पढ़ाई की हो, लाखों रुपये फीस भरी हो, रातों को जागकर तैयारी की हो, और जब फाइनल एग्जाम का दिन आए, तो आपको परीक्षा हॉल के गेट से ही भगा दिया जाए। कहा जाए कि "तुम्हारा एडमिशन या तुम्हारा कॉलेज तो वैध ही नहीं है।"

झारखंड के दुमका में इंजीनियरिंग के छात्रों के साथ कुछ ऐसा ही भद्दा मजाक हुआ है। लेकिन अच्छी खबर यह है कि अब मामला झारखंड हाईकोर्ट (Jharkhand High Court) के पास पहुँच चुका है और कोर्ट ने वो किया है, जिसकी उम्मीद शायद सिस्टम को नहीं थी। कोर्ट ने सीधे CBI जांच के आदेश दे दिए हैं।

चलिए, पूरा मामला आसान भाषा में समझते हैं।

कॉलेज को 'हां', यूनिवर्सिटी को 'ना'? आखिर पेंच कहां फंसा?

मामला दुमका इंजीनियरिंग कॉलेज (Dumka Engineering College) से जुड़ा है। यहाँ के सेकंड सेमेस्टर के सैकड़ों छात्र जब परीक्षा देने पहुंचे, तो सिदो कान्हू मुर्मू विश्वविद्यालय (SKMU) ने उन्हें परीक्षा में बैठने से रोक दिया।

विश्वविद्यालय का कहना था कि कॉलेज के पास इस सत्र के लिए मान्यता (Affiliation) ही नहीं है। वहीं दूसरी तरफ, छात्रों और कॉलेज का कहना था कि देश की सबसे बड़ी संस्था AICTE (All India Council for Technical Education) ने कॉलेज को मान्यता दे रखी है। उनकी वेबसाइट पर कॉलेज का नाम है।

अब सवाल यह है कि जब दिल्ली में बैठी AICTE कह रही है कि "सब ठीक है", तो यूनिवर्सिटी को क्या परेशानी थी? बस इसी कन्फ्यूजन (या शायद करप्शन) के चक्कर में पिस गए वो मासूम छात्र, जिनका भविष्य दांव पर लग गया।

हाईकोर्ट ने जब लगाई 'क्लास'

जब छात्र रोते-बिलखते कोर्ट पहुंचे, तो जज साहब ने पूरी कहानी सुनी। झारखंड हाईकोर्ट ने इस मामले को बहुत गंभीरता से लिया। कोर्ट को यह समझते देर नहीं लगी कि यह सिर्फ़ कागज़ी गलती नहीं है, बल्कि इसके पीछे छात्रों के भविष्य के साथ खिलवाड़ करने की कोई बड़ी साजिश या भारी लापरवाही हो सकती है।

कोर्ट ने तल्ख़ टिप्पणी करते हुए कहा कि जब एआईसीटीई ने सीटों को मंजूरी दी थी, तो छात्रों को रोकने का हक यूनिवर्सिटी को किसने दिया? यह मामला इतना संदिग्ध लगा कि हाईकोर्ट ने पुलिस या स्थानीय जांच एजेंसी के बजाय सीधे CBI (केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो) को जांच सौंप दी।

CBI अब क्या करेगी?

कोर्ट का मकसद साफ़ है— "दूध का दूध और पानी का पानी होना चाहिए।" अब सीबीआई यह पता लगाएगी कि:

  1. क्या यूनिवर्सिटी के अधिकारियों ने जानबूझकर छात्रों को परेशान किया?
  2. क्या कॉलेज ने धोखे में रखकर एडमिशन लिए थे?
  3. कहीं इसके पीछे पैसों का कोई लेन-देन या 'बदला' तो नहीं है?

कोर्ट ने साफ कह दिया है कि छात्रों का एक साल बर्बाद होना छोटी बात नहीं है। इसके लिए जो भी जिम्मेदार होगा, उसे बख्शा नहीं जाएगा।

छात्रों के लिए उम्मीद की किरण

फिलहाल, सीबीआई की जांच शुरू होने के आदेश ने छात्रों को एक उम्मीद दी है। यह फैसला उन तमाम कॉलेजों और यूनिवर्सिटीज के लिए भी एक सबक है जो आपसी खींचतान में छात्रों के करियर की बलि चढ़ा देते हैं। इंजीनियरिंग जैसे प्रोफेशनल कोर्स में जहां बच्चों के मां-बाप अपनी जीवनभर की कमाई लगा देते हैं, वहां ऐसा सिस्टम होना शर्मनाक है।

उम्मीद है कि सीबीआई जल्द ही रिपोर्ट सौंपेगी और इन भावी इंजीनियर्स को इंसाफ मिलेगा। लेकिन सवाल वही है— आखिर छात्रों को हर बार इंसाफ के लिए कोर्ट का दरवाजा क्यों खटखटाना पड़ता है?