दून मेडिकल कॉलेज में आखिर ऐसा क्या हुआ कि छात्रों को सीधे NMC तक लगानी पड़ी गुहार?

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News India Live, Digital Desk: डॉक्टर बनने का सपना लेकर जब कोई छात्र मेडिकल कॉलेज पहुँचता है, तो उसके मन में भविष्य के लिए बड़े अरमान होते हैं। लेकिन कल्पना कीजिए कि वहां जाने के बाद अगर किसी एक इंसान की वजह से आपका सुकून छिन जाए और कॉलेज प्रशासन भी आपकी बात न सुन रहा हो, तो आप क्या करेंगे? कुछ ऐसा ही हुआ उत्तराखंड के नामी दून मेडिकल कॉलेज में।

मामला क्या है? सीधे और सरल शब्दों में समझिए
दून मेडिकल कॉलेज के एक या दो नहीं, बल्कि पूरे 150 MBBS छात्रों ने मिलकर अपने एक सीनियर के खिलाफ बगावत कर दी है। आरोप है कि वह सीनियर छात्र उन्हें मानसिक और शारीरिक रूप से परेशान (Ragging and Harassment) कर रहा था। आम तौर पर ऐसी शिकायतों के लिए छात्र कॉलेज के प्रिंसिपल या एंटी-रॉगिंग कमेटी के पास जाते हैं। लेकिन इन छात्रों ने एक अलग ही रास्ता चुना—इन्होनें कॉलेज को बायपास किया और सीधे नेशनल मेडिकल कमीशन (NMC) को ईमेल भेजकर अपनी शिकायत दर्ज करा दी।

क्यों खौफ में थे 150 छात्र?
शिकायत में छात्रों ने अपनी आपबीती सुनाई है कि किस तरह एक ही सीनियर की वजह से उनका जीना मुश्किल हो गया था। यह मामला सिर्फ हसीं-मजाक तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह उनकी पढ़ाई और मानसिक स्वास्थ्य पर भारी पड़ने लगा। जब एक पूरा बैच (150 लोग) किसी एक के खिलाफ शिकायत कर रहा है, तो समझ जाइये कि पानी सिर के ऊपर से बह चुका होगा।

कॉलेज प्रशासन से विश्वास क्यों उठा?
ये सबसे बड़ा सवाल है। क्या इन छात्रों को डर था कि कॉलेज में बात दबा दी जाएगी? या क्या कॉलेज की रॉगिंग विरोधी टीम इतनी सक्रिय नहीं थी? जब दिल्ली में बैठे NMC के पास ये शिकायत पहुँची, तो वहां से फ़ौरन कार्रवाई के निर्देश आए। तब जाकर कॉलेज प्रशासन की नींद खुली और जांच की प्रक्रिया शुरू हुई।

अब क्या हो रहा है?
NMC की सख्ती के बाद दून मेडिकल कॉलेज में जांच शुरू कर दी गई है। दोषी पाए जाने वाले सीनियर छात्र पर कड़ी कार्रवाई की जा सकती है, जिसमें कॉलेज से निलंबन (Suspension) तक शामिल है। इस घटना ने एक बात साफ़ कर दी है कि आज के छात्र अपनी चुप्पी तोड़ने के लिए तैयार हैं और वे 'सिस्टम' की लंबी कानूनी प्रक्रिया के बजाय सीधे उस दरवाजे पर दस्तक दे रहे हैं, जहाँ से फैसला फ़ौरन आता है।

हमें क्या सोचना चाहिए?
रॉगिंग जैसी प्रथाओं को खत्म करने के लिए सख्त कानून हैं, लेकिन जमीनी हकीकत आज भी चिंताजनक है। क्या सिर्फ छात्र को सजा देना काफी है? शायद नहीं। मेडिकल कॉलेजों में ऐसा माहौल बनना चाहिए जहाँ जूनियर खुद को सुरक्षित महसूस करें।

अगर 150 छात्र आज एक साथ खड़े नहीं होते, तो शायद यह मामला किसी बंद कमरे में ही रह जाता। यह उन सभी छात्रों के लिए प्रेरणा है जो चुप्पी साध कर ऐसी ज्यादतियों को झेलते रहते हैं।