शाकाहारी छवि के पीछे छिपा खूंखार शिकारी: कब और क्यों मांस के भूखे हो जाते हैं बंदर? शिकार का दिमाग और आंतें पहले चट करने की खौफनाक वैज्ञानिक वजह जान उड़ जाएंगे होश

शाकाहारी छवि के पीछे छिपा खूंखार शिकारी: कब और क्यों मांस के भूखे हो जाते हैं बंदर? शिकार का दिमाग और आंतें पहले चट करने की खौफनाक वैज्ञानिक वजह जान उड़ जाएंगे होश

आमतौर पर इंसानी सोच में बंदरों की छवि एक ऐसे चंचल और मासूम जीव की बनी हुई है जो पेड़ों पर रहता है, केले, फल, फूल, ताजी पत्तियां और मेवे खाकर अपनी भूख मिटाता है। धार्मिक और सांस्कृतिक मान्यताओं के चलते भी भारत समेत कई समाजों में बंदरों को पूरी तरह शाकाहारी प्राणी समझा जाता है। लेकिन वन्यजीव विज्ञान और प्राणी व्यवहार (Primatology) का अध्ययन करने वाले वैज्ञानिकों ने इस छवि के पीछे का एक बेहद खौफनाक और हैरान कर देने वाला सच उजागर किया है। हकीकत यह है कि बंदर, चिम्पांजी, लंगूर और बबून जैसे कई प्राइमेट्स पूरी तरह शाकाहारी नहीं, बल्कि अवसरवादी सर्वाहारी (Opportunistic Omnivores) होते हैं।

जंगलों के भीतर जब अनुकूल परिस्थितियां बदलती हैं या शरीर को किसी खास पोषक तत्व की सख्त दरकार होती है, तो ये सीधे-सादे दिखने वाले बंदर किसी खूंखार भेड़िए या तेंदुए की तरह क्रूर शिकारी में तब्दील हो जाते हैं। वे न केवल छोटे पक्षियों, गिलहरियों, खरगोशों और हिरण के बच्चों का शिकार करते हैं, बल्कि अपनी ही प्रजाति या अन्य छोटे बंदरों (जैसे रेड कोलोबस) को जिंदा दबोचकर उनका मांस नोच-नोच कर खा जाते हैं। यह कोई दुर्घटनावश होने वाली घटना नहीं है, बल्कि जंगलों में यह उनके जीवन चक्र और अस्तित्व रक्षा की एक नियमित और बेहद सुनियोजित रणनीति का हिस्सा है।

दिमाग और आंतें ही क्यों? शिकार के सबसे खास अंगों पर टूट पड़ने का वैज्ञानिक रहस्य

जब बंदर या चिम्पांजी किसी जीव का शिकार करते हैं, तो उनके खाने का तरीका अन्य मांसाहारी जानवरों से काफी अलग और रोंगटे खड़े कर देने वाला होता है। एक बाघ या शेर अमूमन अपने शिकार के पिछले हिस्से, जांघों या मांसल मांसपेशियों को खाना पसंद करता है, लेकिन बंदर सबसे पहले शिकार की खोपड़ी तोड़कर उसका भेजा (दिमाग) और पेट चीरकर उसकी आंतें बाहर निकालते हैं और उन्हें बड़े चाव से चट कर जाते हैं। प्राइमेटोलॉजिस्ट जेन गुडॉल और क्रेग स्टैनफोर्ड जैसे अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिकों ने अपने दशकों के शोध में इसके पीछे के गहरे जैव-रासायनिक कारणों को समझाया है।

जंगल में पत्तियां और फल खाकर जिंदा रहने वाले जीवों के शरीर में उच्च गुणवत्ता वाले वसा (Fat), लिपिड्स और आवश्यक फैटी एसिड्स की भारी कमी हो जाती है। स्तनधारी जीवों का दिमाग वसा और कैलोरी का सबसे सघन भंडार होता है। यह मुलायम होता है, जिसे चबाना आसान होता है और इसे खाने से तत्काल भारी मात्रा में ऊर्जा प्राप्त होती है।

वहीं दूसरी तरफ, आंतों को खाने के पीछे दो बड़े वैज्ञानिक कारण हैं। पहला यह कि आंतों के भीतर शाकाहारी शिकार द्वारा पहले से पचाया जा रहा अर्ध-पचा हरा भोजन मौजूद होता है, जिसमें भरपूर विटामिन्स और खनिज होते हैं। दूसरा और सबसे महत्वपूर्ण कारण नमक यानी सोडियम और सूक्ष्म पोषक तत्वों की आपूर्ति है। जंगलों में प्राइमेट्स के लिए नमक एक दुर्लभ चीज होती है, और शिकार की आंतों तथा रक्त वाहिकाओं से उन्हें यह जरूरी खनिज प्रचुर मात्रा में मिल जाता है। शिकार का मस्तिष्क और आंतें उनके लिए सबसे पौष्टिक 'सुपरफूड' की तरह काम करती हैं।

सेना की तरह हमला: पेड़ों की डालियों पर रची जाती है रूह कंपाने वाली चक्रव्यूह नीति

शिकार करते समय बंदरों का व्यवहार किसी गुरिल्ला सेना से कम नहीं होता। खासकर पश्चिमी और मध्य अफ्रीका के जंगलों में रहने वाले चिम्पांजी और बबून जब शिकार पर निकलते हैं, तो वे एक संगठित गिरोह की तरह संवाद करते हैं। वे बिना आवाज किए एक-दूसरे को आंखों और शारीरिक संकेतों से निर्देश देते हैं। पेड़ों की सबसे ऊंची शाखाओं पर जब वे रेड कोलोबस बंदरों के झुंड को घेरते हैं, तो उनका काम बंटा हुआ होता है।

झुंड के कुछ फुर्तीले युवा नर बंदर नीचे से शिकार को भगाते हैं, कुछ अगल-बगल की डालियों को घेरकर उनका भागने का रास्ता बंद करते हैं, जिसे 'ब्लॉकर' कहा जाता है। अंत में झुंड का सबसे ताकतवर और अनुभवी अल्फा मेल छलांग लगाकर शिकार को हवा में ही दबोच लेता है। पकड़े गए जीव को तुरंत मारा नहीं जाता; अक्सर वे जीवित अवस्था में ही उसके अंग-अंग अलग करना शुरू कर देते हैं। इस दौरान शिकार की चीखें पूरे जंगल में गूंजती हैं, लेकिन शिकारी बंदरों के चेहरे पर केवल आक्रामकता और रक्तपिपासा दिखाई देती है। यह संगठित रणनीति साबित करती है कि उनके भीतर उच्च स्तर की योजना बनाने और सामूहिक बुद्धिमत्ता का इस्तेमाल करने की क्षमता मौजूद है।

भूख से ज्यादा ताकत का खेल: मांस के जरिए तय होती है कबीले की राजनीति

वैज्ञानिकों ने एक बेहद दिलचस्प और चौंकाने वाला सामाजिक पहलू यह देखा है कि बंदरों में शिकार केवल पेट भरने का साधन नहीं है, बल्कि यह उनकी सामाजिक राजनीति (Social Politics) और प्रभुत्व स्थापित करने का सबसे बड़ा हथियार है। जब कोई ताकतवर नर बंदर शिकार करने में सफल होता है, तो पूरा झुंड उसके इर्द-गिर्द हाथ फैलाकर भीख मांगने की मुद्रा में बैठ जाता है।

शिकार का मांस किसके साथ बांटा जाएगा, यह पूरी तरह कबीले की सत्ता पर निर्भर करता है। अल्फा नर मांस का एक-एक टुकड़ा अपने वफादार साथियों को इनाम के तौर पर देता है ताकि भविष्य में उसकी सत्ता को कोई चुनौती न दे सके। इसके अलावा, मादा बंदरों को आकर्षित करने और उनके साथ संभोग (Mating Rights) की अनुमति पाने के लिए भी नर बंदर मांस के टुकड़ों को 'रिश्वत' या उपहार के रूप में इस्तेमाल करते हैं। अध्ययनों से साबित हुआ है कि जो नर बंदर ज्यादा शिकार करते हैं और मांस बांटते हैं, झुंड में उनका रुतबा सबसे ऊंचा होता है और उनकी संतानों के बचने की संभावना भी अधिक होती है।

इंसानी बस्तियों के बंदरों में क्यों बढ़ रही है हिंसक और मांसाहारी प्रवृत्ति?

जंगलों के अलावा अब शहरों, कस्बों और धार्मिक स्थलों के आसपास रहने वाले रीसस मैकाक (लाल मुंह वाले बंदर) और लंगूरों के स्वभाव में भी खौफनाक बदलाव दर्ज किए जा रहे हैं। जंगलों की कटाई और प्राकृतिक आवास के विनाश के चलते जब बंदर इंसानी इलाकों का रुख करते हैं, तो उनका खान-पान पूरी तरह अप्राकृतिक हो जाता है।

कूड़ेदानों से निकलने वाला जंक फूड, तला-भुना खाना, प्रोसेस्ड खाद्य पदार्थ और कभी-कभार मांस के अवशेष खाने से उनकी आंतों के माइक्रोबायोम और हार्मोनल संतुलन में गहरा असंतुलन पैदा हो जाता है। चीनी और वसा की अधिकता से उनके शरीर में टेस्टोस्टेरोन और कोर्टिसोल (तनाव हार्मोन) का स्तर बढ़ जाता है, जिससे वे अत्यधिक आक्रामक और चिड़चिड़े हो जाते हैं। यही वजह है कि आज कई शहरों में बंदरों द्वारा कबूतरों, चूहे-गिलहरियों, मुर्गियों और यहां तक कि पालतू कुत्तों व बिल्लियों के नवजात बच्चों पर हमला करके उन्हें मार डालने और खा जाने की घटनाएं लगातार सामने आ रही हैं। इंसानी दखल ने उनके प्राकृतिक संतुलन को बिगाड़कर उनकी हिंसक शिकार प्रवृत्ति को अनियंत्रित रूप से सक्रिय कर दिया है।

विकासवादी इतिहास का आईना: क्या बंदरों की इस आदत से ही इंसान बना शिकारी?

मानव विज्ञानी (Anthropologists) मानते हैं कि बंदरों का यह शिकारी रूप वास्तव में हमारे अपने विकासवादी इतिहास (Evolutionary History) की एक खिड़की है। लाखों साल पहले मानव के पूर्वज भी पेड़ों पर रहने वाले शाकाहारी प्राइमेट्स ही थे। लेकिन जब जलवायु परिवर्तन के कारण घने जंगल सिमटने लगे और खुले घास के मैदान बने, तो जीवित रहने के लिए हमारे पूर्वजों ने भी कीड़े-मकोड़े, मज्जा और मांस खाना शुरू किया।

मांस से मिलने वाले उच्च वसा और प्रोटीन ने ही इंसानी मस्तिष्क के आकार को बड़ा और अत्यधिक बुद्धिमान बनाने में सबसे अहम भूमिका निभाई। आज जब हम किसी बंदर को शिकार का सिर फोड़कर उसका भेजा खाते हुए देखते हैं, तो यह दृश्य हमें क्रूर और अस्वाभाविक लग सकता है, लेकिन प्रकृति के कठोर नियमों में यह केवल 'अस्तित्व के संघर्ष' (Survival of the Fittest) का नग्न रूप है। जब प्रकृति में जिंदा रहने की चुनौती सामने आती है, तो शाकाहार और मांसाहार की सीमाएं मिट जाती हैं और केवल भूख व पोषण का कानून लागू होता है।

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