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March 27 2026 10:24 am

US Dollar Big Change: अमेरिकी डॉलर पर अब होंगे डोनाल्ड ट्रंप के हस्ताक्षर, 165 साल पुरानी परंपरा खत्म; जानें क्या है पूरा मामला

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संयुक्त राज्य अमेरिका की मुद्रा यानी 'ग्रीनबैक' (US Dollar) एक बड़े ऐतिहासिक बदलाव की दहलीज पर खड़ी है। अमेरिकी ट्रेजरी विभाग ने एक चौंकाने वाली घोषणा की है कि अब डॉलर के नोटों पर किसी ट्रेजरर के नहीं, बल्कि देश के मौजूदा राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के हस्ताक्षर होंगे। यह अमेरिकी इतिहास में पहली बार होगा जब किसी पदस्थ राष्ट्रपति (Sitting President) के सिग्नेचर देश की आधिकारिक पेपर करेंसी पर दिखाई देंगे। इस फैसले के साथ ही 165 सालों से चली आ रही उस परंपरा का भी अंत हो जाएगा, जिसमें अमेरिकी ट्रेजरर के हस्ताक्षर नोटों की प्रमाणिकता की मुहर होते थे।

जून 2026 से छपेंगे $100 के नए नोट

ट्रेजरी विभाग के अनुसार, इस नए बदलाव की शुरुआत जून 2026 से होगी। सबसे पहले 100 डॉलर के नोट छापे जाएंगे, जिन पर राष्ट्रपति ट्रंप और ट्रेजरी सेक्रेटरी स्कॉट बेसेंट के हस्ताक्षर होंगे। इसके बाद धीरे-धीरे अन्य मूल्यवर्ग (Denominations) के नोटों में भी यही बदलाव लागू किया जाएगा। यह समय इसलिए चुना गया है क्योंकि अमेरिका अपनी स्वतंत्रता की 250वीं वर्षगांठ (Semiquincentennial) की तैयारी कर रहा है और प्रशासन इसे एक यादगार मील का पत्थर बनाना चाहता है।

165 साल पुरानी परंपरा का अंत

साल 1861 से चली आ रही परंपरा के तहत अमेरिकी नोटों पर ट्रेजरी सेक्रेटरी और अमेरिकी ट्रेजरर के हस्ताक्षर होते रहे हैं। लिन मलरबा इस लंबी कतार की आखिरी ट्रेजरर होंगी, जिनका नाम डॉलर पर अंकित होगा। अब ट्रेजरर की जगह सीधे राष्ट्रपति के हस्ताक्षर लेकर ट्रेजरी विभाग ने एक बड़ा संस्थागत बदलाव किया है। ट्रेजरी सेक्रेटरी स्कॉट बेसेंट ने इसे "अमेरिकी आर्थिक मजबूती और ट्रंप के नेतृत्व के प्रति सम्मान" का प्रतीक बताया है।

क्या नोटों का डिजाइन भी बदलेगा?

अधिकारियों ने स्पष्ट किया है कि नोटों के मूल डिजाइन, रंग या सुरक्षा फीचर्स में कोई बड़ा बदलाव नहीं किया जाएगा। केवल हस्ताक्षर वाले हिस्से में फेरबदल होगा। कानूनन, किसी भी जीवित व्यक्ति की तस्वीर अमेरिकी नोटों या सिक्कों पर नहीं लगाई जा सकती (यही कारण है कि ट्रंप की तस्वीर वाले $1 के सिक्के का प्रस्ताव कानूनी बाधाओं में फंसा रहा), लेकिन हस्ताक्षर को लेकर कानून में ऐसी कोई स्पष्ट पाबंदी नहीं है, जिसका लाभ उठाते हुए यह फैसला लिया गया है।

ऐतिहासिक बदलाव या 'ईगो मूव'?

इस फैसले ने अमेरिका में एक नई बहस छेड़ दी है। जहां समर्थकों का कहना है कि यह देश की 'स्वर्ण युग' की ओर वापसी और आर्थिक स्थिरता का प्रतीक है, वहीं आलोचक इसे 'व्यक्तिगत ब्रांडिंग' और संस्थानों के राजनीतिकरण के तौर पर देख रहे हैं। बहरहाल, ट्रंप प्रशासन पहले भी कई सरकारी इमारतों और योजनाओं के साथ अपना नाम जोड़ने के लिए चर्चा में रहा है, लेकिन मुद्रा पर हस्ताक्षर का यह कदम अब तक का सबसे बड़ा प्रभाव डालने वाला फैसला माना जा रहा है।