Uproar over India-Israel Investment Agreement : केरल के मुख्यमंत्री ने केंद्र पर साधा निशाना, कहा- फिलिस्तीन के साथ धोखा

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News India Live, Digital Desk: Uproar over India-Israel Investment Agreement : केंद्र सरकार ने जब से इज़राइल के साथ एक नए निवेश समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं, देश की राजनीति में एक नया विवाद खड़ा हो गया है. एक तरफ जहां सरकार इसे आर्थिक तरक्की और दोनों देशों के बीच मजबूत होते रिश्तों के तौर पर देख रही है, वहीं विपक्ष इसे भारत की पारंपरिक विदेश नीति से भटकाव बता रहा है. इस विरोध की सबसे मुखर आवाज़ केरल से आई है, जहां के मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन ने इसे "फिलिस्तीन के साथ ऐतिहासिक एकजुटता को धोखा" करार दिया है.

क्या है पूरा मामला?

हाल ही में, भारत की वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण और इज़राइल के वित्त मंत्री बेजलेल स्मोत्रिच ने नई दिल्ली में एक द्विपक्षीय निवेश समझौते पर हस्ताक्षर किए इस समझौते का मकसद दोनों देशों के बीच व्यापार और निवेश को बढ़ावा देना है. सरकार का कहना है कि इससे निवेशकों को ज्यादा सुरक्षा मिलेगी और दोनों देशों की अर्थव्यवस्था मजबूत होगी.

लेकिन जैसे ही यह खबर सामने आई, केरल के मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन ने केंद्र सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया. उन्होंने सोशल मीडिया पर अपनी नाराजगी जाहिर करते हुए कहा कि ऐसे समय में जब गाजा में "नरसंहार" हो रहा है, इज़राइली प्रतिनिधियों के साथ समझौता करना बिल्कुल गलत है

विजयन ने इज़राइली वित्त मंत्री को "चरमपंथी" और इज़राइल की "क्रूर कब्जे और विस्तारवादी एजेंडे" का मुख्य वास्तुकार बताया उन्होंने कहा, "इज़राइल के साथ सैन्य, सुरक्षा और आर्थिक संबंध बनाए रखना निंदनीय है, जबकि फिलिस्तीन के लिए एक न्यायपूर्ण और स्थायी शांति का रास्ता बंद है.

भारत की पुरानी दोस्ती का वास्ता

पिनाराई विजयन का यह गुस्सा बेवजह नहीं है. भारत का इतिहास फिलिस्तीन के साथ मजबूत दोस्ती का रहा है.भारत उन पहले गैर-अरब देशों में से एक था, जिसने 1974 में फिलिस्तीन लिबरेशन ऑर्गनाइजेशन (PLO) को फिलिस्तीनी लोगों का एकमात्र प्रतिनिधि माना था और 1988 में फिलिस्तीन को एक देश के रूप में मान्यता दी थी. लंबे समय तक भारत की विदेश नीति का यह एक अहम हिस्सा रहा है.

हालांकि, पिछले कुछ सालों में भारत और इज़राइल के रिश्ते भी काफी मजबूत हुए हैं, खासकर रक्षा और तकनीक के क्षेत्र में इसी बदलाव को लेकर आलोचकों का मानना है कि केंद्र सरकार अपनी पुरानी दोस्ती को भूलकर नए रणनीतिक साझेदार बना रही है, जो कि भारत की गुटनिरपेक्षता की नीति के खिलाफ है. मुख्यमंत्री विजयन का बयान इसी बहस को एक बार फिर सामने ले आया है, जहां देश की आर्थिक जरूरतों और ऐतिहासिक जिम्मेदारियों के बीच एक लकीर खिंच गई है.