UP Murder Case : बाहुबली विधायक अभय सिंह समेत 4 आरोपी हुए दोषमुक्त, 23 साल पुराने दोहरे हत्याकांड में कोर्ट का फैसला
News India Live, Digital Desk: उत्तर प्रदेश की सियासत और अपराध जगत से जुड़ी एक बड़ी खबर सामने आई है। लखनऊ की विशेष एमपी-एमएलए कोर्ट (MP-MLA Court) ने अयोध्या के गोसाईगंज से समाजवादी पार्टी के विधायक और बाहुबली नेता अभय सिंह (Abhay Singh) को दोहरे हत्याकांड के एक मामले में बाइज्जत बरी कर दिया है। करीब 23 साल पुराने इस मामले में साक्ष्यों के अभाव के चलते कोर्ट ने अभय सिंह समेत चार अन्य आरोपियों को दोषमुक्त करार दिया है।
क्या था 23 साल पुराना यह खूनी खेल?
यह मामला साल 2001 का है, जब लखनऊ के पॉश इलाके में स्थित जेल रोड पर ताबड़तोड़ फायरिंग हुई थी। इस हमले में मुख्तार अंसारी के करीबी माने जाने वाले अखिलेश सिंह और उनके एक साथी की सरेआम हत्या कर दी गई थी। इस दोहरे हत्याकांड ने उस समय यूपी की कानून-व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए थे। पुलिस ने इस मामले में अभय सिंह, विकास सिंह और अन्य लोगों के खिलाफ नामजद एफआईआर दर्ज की थी।
कोर्ट ने क्यों किया बरी?
एमपी-एमएलए कोर्ट के विशेष न्यायाधीश के समक्ष इस मामले की लंबी सुनवाई चली। अभियोजन पक्ष (Prosecution) इस मामले में आरोपियों के खिलाफ ठोस सबूत पेश करने में नाकाम रहा। सुनवाई के दौरान कई अहम गवाह अपने बयानों से मुकर गए (Hostile), जिसके कारण अभय सिंह के खिलाफ दोष सिद्ध नहीं हो सका। कोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि केवल संदेह के आधार पर किसी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता और पर्याप्त साक्ष्यों की कमी के कारण सभी आरोपियों को रिहा किया जाता है।
सियासी गलियारों में चर्चा तेज
अभय सिंह वर्तमान में सपा विधायक हैं और हाल ही में राज्यसभा चुनाव के दौरान उनकी 'क्रॉस वोटिंग' को लेकर काफी चर्चा हुई थी। इस कानूनी जीत को उनके और उनके समर्थकों के लिए एक बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है। फैसले के बाद अभय सिंह ने न्यायपालिका पर अपना भरोसा जताया और कहा कि उन्हें फंसाने की साजिश रची गई थी, लेकिन अंततः सत्य की जीत हुई है।
इन आरोपियों को भी मिली राहत
अभय सिंह के साथ-साथ इस मामले में नामजद विकास सिंह और दो अन्य लोगों को भी कोर्ट ने बरी कर दिया है। इस फैसले के बाद जेल रोड हत्याकांड की फाइल अब कानूनी तौर पर बंद होने के कगार पर है। हालांकि, कयास लगाए जा रहे हैं कि पीड़ित पक्ष या अभियोजन इस फैसले के खिलाफ उच्च न्यायालय (High Court) का दरवाजा खटखटा सकते हैं।